रेलगाड़ी पर कविता, Poem on Train in Hindi

Poem on Train in Hindi – दोस्तों इस पोस्ट में कुछ रेलगाड़ी पर कविता का संग्रह दिया गया हैं. हमें उम्मीद हैं की यह सभी कविता आपको पसंद आएगी. इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें.

रेलगाड़ी पर कविता, Poem on Train in Hindi

Poem on Train in Hindi

1. रेलगाड़ी पर कविता

राजू है हैरान रेल के डिब्बे में
पूरा हिंदुस्तान रेल के डिब्बे में

एक सीट पर पंडित जी है और बगल में मुल्ला
दूजी सीट पर सरदार महाशय खाते हैं रसगुल्ला
जैन बौद्ध क्रिस्तान रेल के डिब्बे में
पूरा हिंदुस्तान रेल के डिब्बे में

कोई बोले हिंदी कोई ऊर्दू में बतलाता
अंग्रेजी कन्नड़ मलयालम कोई तमिल सुनाता
सबका है सम्मान रेल के डिब्बे में
पूरा हिंदुस्तान रेल के डिब्बे में

दो क्षण के इस हेल मेल में जुड़ जाते जो नाते
वही बिछड़ने पर आँखों में दो आंसू दे जाते
बना एकता धाम रेल के डिब्बे में
पूरा हिंदुस्तान रेल के डिब्बे में

2. Poem on Train in Hindi

इस रेल ने कितनी कहानियाँ छिपायी होंगी,
कितने सफर खूबसूरत बने होंगे,
कितने मुसाफिरों की मंजिलें मिलायी होंगी,
इस रेल ने कितनी कहानियाँ छिपायी होंगी,
उस चायवाले नें कितनों को चाय की आदत लगायी होंगी,
उन चुस्कियों ने कितनी मुलाक़ातें यादगार बनायी होंगी,
कितने किस्से बने होंगे स्टेशन में इंतेज़ार के वक़्त,
फिर इस रेल की आवाज़ ने कितनी यादें दोहरायी होंगी,
इस रेल ने कितनी कहानियाँ छिपायी होंगी…
कितनों को घर मिले होंगे, कितने बेघर हुए होंगे,
इन दरवाजों ने कितने अजनबियों को अपनायी होंगी,
कितने मुसाफ़िर गुम हुए होंगे इस भीड़ में,
कितनों को नई मंज़िलें दिलायी होंगी,
इस रेल ने कितनी कहानियाँ छिपायी होंगी ।
– जया पाण्डेय।

3. एक दिन हम भारी भीड़-भरी

एक दिन हम भारी भीड़-भरी
भारतीय रेल में चढ़े
चढ़े क्या, चढ़ाए गए
कई कन्धों पर धरकर
भीतर सरकाए गए।

भीड़ का ये हाल था
मत पूछिए, कमाल था
सीट पर भी आदमी थे
बर्थ पर भी आदमी थे
और तो और
छत पर भी आदमी थे
वो तो रेल वालों ने
उससे ऊपर कोई जगह ही नहीं बनाई
वरना आदमी वहां भी होते भाई।

4. लंबी लंबी रेलगाड़ी

लंबी लंबी रेलगाड़ी,
धड़धड़ाती आती,
लगती है यमदूत सी,
पहुचाए गंतव्य तक,
लंबी लंबी रेलगाड़ी,
झांका अंदर,
लगे अतिथि कक्ष सी,
सीटें लगें सोफा सेट सी,
चाय,काफी आती रहती
स्वागत करे टिकटधारी यात्री का,
लंबी लंबी रेलगाड़ी,
बांधे विश्व को एक सूत्र में,
शिशु उकता गया बिस्कुट , केक से
राजस्थानी दंपत्ति ने अचार पूड़ी का डब्बा खोला
बच्चे ने हाथ पसारे
खाकर ,हुआ बहुत खुश,
मुस्लिम दंपत्ति हुआ कृतार्थ
कांजी बरम की साड़ी पहनी महिला ,
पर आंख टिकी सब महिलाओं की,
एक विदेशी महिला चिल्लाए,
कैसा नियम है बच्चा खड़ा है दो घंटे से,
सीट दो इसे बैठने को,
रेलगाड़ी लगे सर्वधर्म गृह सी,
लंबी लंबी रेलगाड़ी,
धड़ धड़ाती जाती देश के एक कोने दूसरे कोने,
पड़ें स्टेशन बीच बीच में,
स्टेशन पर भीड़ लगे मेले सी,
कोई बेचे कचौड़ी पकौड़ी,फल,
कहीं चूड़ियां,कहीं किताबे,
स्टेशन पर कोई भाग रहा है,
कोई बैठा इंतजार कर रहा है अपनी गाड़ी का,
लंबी लंबी रेलगाड़ी,
धड़ धड़ाती आती।

5. रेल चली भई

रेल चली भई
रेल चली
छुक छुक छुक छुक

रेल चली
बिन पटरी के
दौड़ चली
छुक छुक छुक छुक
रेल चली
रेल चली भई
रेल चली …1

इंजिन गोलू
औ’ डिब्बे हैं
रामू श्यामू

कालू मामू
लालू राधू
दौड़ रहे हैं

पूंछ पकड़ के
बिना धुएं के
दौड़ चली
रेल चली भई
रेल चली …2

सीधी चलती
दाएं-बाएं
मुड़कर चलती
शोर मचाती
सीटी देती
स्टेशन पर
रुकती जाती
लहराती यह
रेल चली
रेल चली भई
रेल चली …3

यात्री इसमें
नहीं बैठते
वे खुद डिब्बे
बन जाते हैं
स्टेशन के आ जाने पर
हट जाते कुछ
और नए कुछ
जुड़ जाते हैं।
बच्चों की यह
रेल चली
रेल चली भई
रेल चली …4

छुक छुक छुक छुक
रेल चली
बिन पटरी के
दौड़ चली
रेल चली भई
रेल चली …5

6. धूप से जलते मैदानों के रास्ते एक रेल गुज़रती है

धूप से जलते मैदानों के रास्ते एक रेल गुज़रती है

एक सवारी गाड़ी जितनी जैसी वह

भभके में भभका छोड़ती

लोग ही लोग होते हैं

गठरियों पर गठरियाँ

बीड़ी और तंबाकू

और पसीना छोड़ती देहों की गंध

में लिपटी रहती एक समूची यात्रा

बातों का अंबार

और जीवन की कथाएँ अनंत

चुप्पी और ठहाके में

ग़ोता लगाती हर रोज़ एक रेल

इस तरह गुज़रती है

मैं इन्हें नहीं जानता हूँ

कि ये कहाँ के होंगे रहने वाले

क्या होगा इनका नाम

मैं इस देश को जानता हूँ

जहाँ कठपुतलियाँ हैं ये बनाई गईं

डोरियों से बाँध नचाए गए हैं ये सारे

एक कथा के अभिशप्त जीवन-चरित्र

छितराए गए हैं ठौर दर ठौर

इनमें बहुत से लौट रहे हैं देवी को मत्था टेककर

पोटलियों में राख लिए

बहुत सँभाल कर रखी गँठियाई हुई

माता का प्रसाद बताई गई

हर स्टेशन पर रेल रुकती है

पाँच, सात, दस, बीस का टिकट ले

धकियाती, गुर्राती, गरियाती भीड़ चढ़ती है

एक रेल इस तरह हर रोज़ गुजरती है।

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