नज़ीर अकबराबादी की प्रसिद्ध कविताएँ, Nazeer Akbarabadi Poem in Hindi

Nazeer Akbarabadi Poem in Hindi : यहाँ पर आपको Nazeer Akbarabadi ki Kavita in Hindi का संग्रह दिया गया हैं. नज़ीर अकबराबादी का जन्म 1735 ईसवी में हुआ था. इनका असली नाम वली मुहम्मद था. यह आम लोगों के कवि थे. इन्होने आम जीवन, त्योहारों, ऋतुओं, सब्जियों, फलों आदि विषयों पर लिखा हैं. मान्यता हैं की इन्होने करीब को लाख रचनाएँ लिखी हैं. लेकिन उनकी करीब 6 हजार रचनाएँ मिली हैं. जिनमे 600 के करीब गजलें शामिल हैं. नज़ीर अकबराबादी का निधन 1830 में हुआ था.

नज़ीर अकबराबादी की प्रसिद्ध कविताएँ

Nazeer Akbarabadi Poem in Hindi

कविताएं : नज़ीर अकबराबादी (Poetry in Hindi : Nazeer Akbarabadi)

1. आदमी नामा

दुनिया में पादशह है सो है वह भी आदमी
और मुफ़्लिसो-गदा है सो है वह भी आदमी
ज़रदार, बे-नवा है सो है वह भी आदमी
नेअमत जो खा रहा है सो है वह भी आदमी
टुकड़े चबा रहा है सो है वह भी आदमी॥1॥

अब्दाल, कुत्ब, ग़ौस, वली आदमी हुए
मुनकिर भी आदमी हुए और कुफ़्र के भरे
क्या-क्या करिश्मे कश्फ़ो-करामात के लिए
हत्ता कि अपने जुहदो-रियाज़त के ज़ोर से
ख़ालिक से जा मिला है सो है वह भी आदमी॥2॥

फ़रऔन ने किया था जो दावा खुदाई का
शद्दाद भी बिहिश्त बनाकर खुदा हुआ
नमरूद भी खुदा ही कहाता था बरमला
यह बात है समझने की आगे कहूं मैं कया
यां तक जो हो चुका है सो है वह भी आदमी॥3॥

यां आदमी ही नार है और आदमी ही नूर
यां आदमी ही पास है और आदमी ही दूर
कुल आदमी का हुस्नो-कबह में है यां ज़हूर
शैतां भी आदमी है जो करता है मक़्रो-ज़ोर
और हादी रहनुमा है सो है वह भी आदमी॥4॥

मसजिद भी आदमी ने बनायी है यां मियां
बनते हैं आदमी ही इमाम और खुत्बा-ख़्वां
पढ़ते हैं आदमी ही कुरान और नमाज़ यां
और आदमी ही उनकी चुराते हैं जूतियां
जो उनको ताड़ता है सो है वह भी आदमी॥5॥

यां आदमी पे जान को वारे है आदमी
और आदमी पे तेग़ को मारे है आदमी
पगड़ी भी आदमी की उतारे है आदमी
चिल्ला के आदमी को पुकारे है आदमी
और सुन के दौड़ता है सो है वह भी आदमी॥6॥

नाचे है आदमी ही बजा तालियों को यार।
और आदमी ही डाले है अपने इज़ार उतार॥
नंगा खड़ा उछलता है होकर जलीलो ख़्वार।
सब आदमी ही हंसते हैं देख उसको बार-बार॥
और वह जो मसखरा है सो है वह भी आदमी॥7॥

चलता है आदमी ही मुसाफ़िर हो, ले के माल
और आदमी ही मारे है फांसी गले में डाल
यां आदमी ही सैद है और आदमी ही जाल
सच्चा भी आदमी ही निकलता है, मेरे लाल !
और झूठ का भरा है सो है वह भी आदमी॥8॥

यां आदमी ही शादी है और आदमी विवाह
काज़ी, वकील आदमी और आदमी गवाह
ताशे बजाते आदमी चलते हैं ख़ामख़ाह
दोड़े है आदमी ही तो मशअल जला के राह
और ब्याहने चढ़ा है सो है वह भी आदमी॥9॥

और आदमी नक़ीब सो बोले है बार-बार
और आदमी ही प्यादे है और आदमी सवार
हुक्का, सुराही, जूतियां दौड़ें बग़ल में मार
कांधे पे रख के पालकी हैं दौड़ते कहार
और उसमें जो पड़ा है सो है वह भी आदमी॥10॥

बैठे हैं आदमी ही दुकानें लगा-लगा
और आदमी ही फिरते हैं रख सर पे ख़्वांचा
कहता है कोई ‘लो’, कोई कहता है ‘ला, रे ला’
किस-किस तरह की बेचें हैं चीज़ें बना-बना
और मोल ले रहा है सो है वह भी आदमी॥11॥

यां आदमी ही क़हर से लड़ते हैं घूर-घूर।
और आदमी ही देख उन्हें भागते हैं दूर॥
चाकर, गुलाम आदमी और आदमी मजूर।
यां तक कि आदमी ही उठाते हैं जा जरूर॥
और जिसने वह फिरा है सो है वह भी आदमी॥12॥

तबले, मजीरे, दायरे सारंगियां बजा
गाते हैं आदमी ही हर इक तरह जा-ब-जा
रंडी भी आदमी ही नचाते हैं गत लगा
और आदमी ही नाचे हैं और देख फिर मज़ा
जो नाच देखता है सो है वह भी आदमी॥13॥

यां आदमी ही लालो-जवाहर हैं बे-बहा
और आदमी ही ख़ाक से बदतर है हो गया
काला भी आदमी है कि उलटा है ज्यूं तवा
गोरा भी आदमी है कि टुकड़ा है चांद का
बदशक्ल बदनुमा है सो है वह भी आदमी॥14॥

इक आदमी हैं जिनके ये कुछ जर्क़-बर्क़ हैं
रूपे के जिनके पांव हैं सोने के फ़र्क हैं
झमके तमाम ग़र्ब से ले ता-ब-शर्क हैं
कमख़्वाब, ताश, शाल, दुशालों में ग़र्क हैं
और चीथड़ों लगा है सो है वह भी आदमी॥15॥

एक ऐसे हैं कि जिनके बिछे हैं नए पलंग।
फूलों की सेज उनपे झमकती है ताज़ा रंग॥
सोते हैं लिपटे छाती से माशूक शोखो संग।
सौ-सौ तरह से ऐश के करते हैं रंग ढंग॥
और ख़ाक में पड़ा है सो है वह भी आदमी॥16॥

हैरां हूं यारो देखो तो यह क्या सुआंग है
यां आदमी ही चोर है और आप ही थांग है
है छीना झपटी और कहीं बांग तांग है
देखा तो आदमी ही यहां मिस्ले-रांग है
फ़ौलाद से गढ़ा है सो है वह भी आदमी॥17॥

मरने पै आदमी ही क़फ़न करते हैं तैयार।
नहला धुला उठाते हैं कांधे पै कर सवार॥
कलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ार।
सब आदमी ही करते हैं, मुर्दे के कारोबार॥
और वह जो मर गया है सो है वह भी आदमी॥18॥

अशराफ़ और कमीने से ले शाह-ता-वज़ीर
यह आदमी ही करते हैं सब कारे-दिल-पिज़ीर
यां आदमी मुरीद हैं और आदमी ही पीर
अच्छा भी आदमी ही कहाता है ऐ ‘नज़ीर’
और सब में जो बुरा है सो है वह भी आदमी॥19॥

(पादशह=बादशाह, मुफ़्लिसो-गदा=फ़कीर और
निर्धन, ज़रदार=धनी, बे-नवा=निर्धन,
अब्दाल,कुत्ब,ग़ौस,वली= यह सभी सूफ़ियों के
ऊंचे दर्जे हैं, कश्फ़ो-करामात=चमत्कार,
हत्ता=यहाँ तक, जुहदो-रियाज़त=तपस्या,
बरमला=साफ़, नार=आग, हुस्नो-कबह=पाप-
पुण्य, ज़हूर=दिखाई देना, हादी,रहनुमा=
राह दिखाने वाला, इमाम=नमाज़ के नेता,
खुत्बा-ख़्वां=धार्मिक वक्ता, सैद=शिकार,
नक़ीब=’हटो बचो’ करने वाले प्यादे, जा-ब-जा=
हर जगह, बे-बहा=अमूल्य, जर्क़-बर्क़=भड़कीले
कपड़े, फ़र्क=माथे, ग़र्ब=पश्चिम, ता-ब-शर्क=पूर्व
तक, ग़र्क=डूबे हुए, थांग=चोरों को पता देने वाला,
अशराफ़=शरीफ़, कारे-दिल-पिज़ीर=अच्छे काम)

2. गुरू नानक शाह

हैं कहते नानक शाह जिन्हें वह पूरे हैं आगाह गुरू ।
वह कामिल रहबर जग में हैं यूँ रौशन जैसे माह गुरू ।
मक़्सूद मुराद, उम्मीद सभी, बर लाते हैं दिलख़्वाह गुरू ।
नित लुत्फ़ो करम से करते हैं हम लोगों का निरबाह गुरु ।
इस बख़्शिश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरू ।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरू ।।१।।

हर आन दिलों विच याँ अपने जो ध्यान गुरू का लाते हैं ।
और सेवक होकर उनके ही हर सूरत बीच कहाते हैं ।
गर अपनी लुत्फ़ो इनायत से सुख चैन उन्हें दिखलाते हैं ।
ख़ुश रखते हैं हर हाल उन्हें सब तन का काज बनाते हैं ।
इस बख़्शिश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरू ।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरू ।।२।।

जो आप गुरू ने बख़्शिश से इस ख़ूबी का इर्शाद किया ।
हर बात है वह इस ख़ूबी की तासीर ने जिस पर साद किया ।
याँ जिस-जिस ने उन बातों को है ध्यान लगाकर याद किया ।
हर आन गुरू ने दिल उनका ख़ुश वक़्त किया और शाद किया ।
इस बख़्शिश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरू ।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरू ।।३।।

दिन रात जिन्होंने याँ दिल बिच है यादे-गुरू से काम लिया ।
सब मनके मक़्सद भर पाए ख़ुश-वक़्ती का हंगाम लिया ।
दुख-दर्द में अपना ध्यान लगा जिस वक़्त गुरू का नाम लिया ।
पल बीच गुरू ने आन उन्हें ख़ुशहाल किया और थाम लिया ।
इस बख़्शिश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरू ।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरू ।।४।।

याँ जो-जो दिल की ख़्वाहिश की कुछ बात गुरू से कहते हैं ।
वह अपनी लुत्फ़ो शफ़क़त से नित हाथ उन्हीं के गहते हैं ।
अल्ताफ़ से उनके ख़ुश होकर सब ख़ूबी से यह कहते हैं ।
दुख दूर उन्हीं के होते हैं सौ सुख से जग में रहते हैं ।
इस बख़्शिश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरू ।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरू ।।५।।

जो हरदम उनसे ध्यान लगा उम्मीद करम की धरते हैं ।
वह उन पर लुत्फ़ो इनायत से हर आन तव्ज्जै करते हैं ।
असबाब ख़ुशी और ख़ूबी के घर बीच उन्हीं के भरते हैं ।
आनन्द इनायत करते हैं सब मन की चिन्ता हरते हैं ।
इस बख़्शिश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरू ।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरू ।।६।।

जो लुत्फ़ इनायत उनमें हैं कब वस्फ़ किसी से उनका हो ।
वह लुत्फ़ो करम जो करते हैं हर चार तरफ़ है ज़ाहिर वो ।
अल्ताफ़ जिन्हों पर हैं उनके सौ ख़ूबी हासिल हैं उनको ।
हर आन ’नज़ीर’ अब याँ तुम भी बाबा नानक शाह कहो ।
इस बख़्शिश के इस अज़मत के हैं बाबा नानक शाह गुरू ।
सब सीस नवा अरदास करो, और हरदम बोलो वाह गुरू ।।७।।

(कामिल=मुक्म्मिल,सम्पूर्ण, रहबर=रास्ता दिखाने वाले, माह=
चाँद, मक़्सूद मुराद=दिल चाही इच्छा, अज़मत=बढ़ाई,शान,
इर्शाद=उपदेश दिया, तासीर=प्रभाव, मक़्सद=मनोरथ,इच्छा,
हंगाम=समय पर, शफ़क़त=मेहरबानी, गहते=पकड़ते, अल्ताफ़=
मेहरबानी, तवज्जै=ध्यान देना, वस्फ़=गुणगान)

3. बंजारानामा

टुक हिर्सो-हवा को छोड़ मियां, मत देस-बिदेस फिरे मारा
क़ज़्ज़ाक अजल का लूटे है दिन-रात बजाकर नक़्क़ारा
क्या बधिया, भैंसा, बैल, शुतुर क्या गौनें पल्ला सर भारा
क्या गेहूं, चावल, मोठ, मटर, क्या आग, धुआं और अंगारा
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥1॥

ग़र तू है लक्खी बंजारा और खेप भी तेरी भारी है
ऐ ग़ाफ़िल तुझसे भी चढ़ता इक और बड़ा ब्योपारी है
क्या शक्कर, मिसरी, क़ंद, गरी क्या सांभर मीठा-खारी है
क्या दाख़, मुनक़्क़ा, सोंठ, मिरच क्या केसर, लौंग, सुपारी है
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥2॥

तू बधिया लादे बैल भरे जो पूरब पच्छिम जावेगा
या सूद बढ़ाकर लावेगा या टोटा घाटा पावेगा
क़ज़्ज़ाक़ अजल का रस्ते में जब भाला मार गिरावेगा
धन-दौलत नाती-पोता क्या इक कुनबा काम न आवेगा
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥3॥

हर मंजिल में अब साथ तेरे यह जितना डेरा डंडा है।
ज़र दाम दिरम का भांडा है, बन्दूक सिपर और खाँड़ा है।
जब नायक तन का निकल गया, जो मुल्कों मुल्कों हांडा है।
फिर हांडा है न भांडा है, न हलवा है न मांडा है।
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा, जब लाद चलेगा बंजारा॥4॥

जब चलते-चलते रस्ते में ये गौन तेरी रह जावेगी
इक बधिया तेरी मिट्टी पर फिर घास न चरने पावेगी
ये खेप जो तूने लादी है सब हिस्सों में बंट जावेगी
धी, पूत, जमाई, बेटा क्या, बंजारिन पास न आवेगी
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥5॥

ये खेप भरे जो जाता है, ये खेप मियां मत गिन अपनी
अब कोई घड़ी पल साअ़त में ये खेप बदन की है कफ़नी
क्या थाल कटोरी चांदी की क्या पीतल की डिबिया ढकनी
क्या बरतन सोने चांदी के क्या मिट्टी की हंडिया चपनी
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥6॥

ये धूम-धड़क्का साथ लिये क्यों फिरता है जंगल-जंगल
इक तिनका साथ न जावेगा मौक़ूफ़ हुआ जब अन्न और जल
घर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा, नैनसुख और मलमल
क्या चिलमन, परदे, फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महल
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥7॥

कुछ काम न आवेगा तेरे ये लालो-ज़मर्रुद सीमो-ज़र
जब पूंजी बाट में बिखरेगी हर आन बनेगी जान ऊपर
नौबत, नक़्क़ारे, बान, निशां, दौलत, हशमत, फ़ौजें, लशकर
क्या मसनद, तकिया, मुल्क मकां, क्या चौकी, कुर्सी, तख़्त, छतर
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥8॥

क्यों जी पर बोझ उठाता है इन गौनों भारी-भारी के
जब मौत का डेरा आन पड़ा फिर दूने हैं ब्योपारी के
क्या साज़ जड़ाऊ, ज़र ज़ेवर क्या गोटे थान किनारी के
क्या घोड़े ज़ीन सुनहरी के, क्या हाथी लाल अंबारी के
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥9॥

मग़रूर न हो तलवारों पर मत भूल भरोसे ढालों के
सब पत्ता तोड़ के भागेंगे मुंह देख अजल के भालों के
क्या डिब्बे मोती हीरों के क्या ढेर ख़जाने मालों के
क्या बुक़चे ताश, मुशज्जर के क्या तख़ते शाल दुशालों के
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥10॥

क्या सख़्त मकां बनवाता है खंभ तेरे तन का है पोला
तू ऊंचे कोट उठाता है, वां गोर गढ़े ने मुंह खोला
क्या रैनी, खंदक़, रंद बड़े, क्या बुर्ज, कंगूरा अनमोला
गढ़, कोट, रहकला, तोप, क़िला, क्या शीशा दारू और गोला
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥11॥

हर आन नफ़े और टोटे में क्यों मरता फिरता है बन-बन
टुक ग़ाफ़िल दिल में सोच जरा है साथ लगा तेरे दुश्मन
क्या लौंडी, बांदी, दाई, दिदा क्या बन्दा, चेला नेक-चलन
क्या मस्जिद, मंदिर, ताल, कुआं क्या खेतीबाड़ी, फूल, चमन
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥12॥

जब मर्ग फिराकर चाबुक को ये बैल बदन का हांकेगा
कोई ताज समेटेगा तेरा कोई गौन सिए और टांकेगा
हो ढेर अकेला जंगल में तू ख़ाक लहद की फांकेगा
उस जंगल में फिर आह ‘नज़ीर’ इक तिनका आन न झांकेगा
सब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा॥13॥

(हिर्सो-हवा=लालच, क़ज़्ज़ाक=डाकू, अजल=मौत,
लालो-ज़मर्रुद=लाल और पुखराज, सीमो-ज़र=चांदी,
सोना, मग़रूर=घमंडी, ताश=एक प्रकार का छपा
हुआ ज़री का रेशमी कपड़ा, मुशज्जर=वह कपड़ा
जिस पर पेड़ों के डिजाइन हो, गोर=क़ब्र, रैनी=किले
की छोटी दीवार, रंद=दीवारों के वह सूराख जिनमें
से बन्दूकों की मार की जाय, रहक़ला=गाड़ी जिस
पर रख कर तोप ले जाई जाती है, दाईदिदा=बूढ़ी
नौकरानी, मर्ग=मौत, लहद=क़ब्र, शुतुर=ऊंट,
ग़ाफ़िल=मूर्ख, क़ंद=खांड, सूद=ब्याज, नाती=दोहता)

4. ईद

यूँ लब से अपने निकले है अब बार-बार आह
करता है जिस तरह कि दिल-ए-बे-क़रार आह
हम ईद के भी दिन रहे उम्मीद-वार आह

हो जी में अपने ईद की फ़रहत से शाद-काम
ख़ूबाँ से अपने अपने लिए सब ने दिल के काम
दिल खोल खोल सब मिले आपस में ख़ास ओ आम
आग़ोश-ए-ख़ल्क़ गुल-बदनों से भरे तमाम
ख़ाली रहा पर एक हमारा कनार आह

क्या पूछते हो शोख़ से मिलने की अब ख़बर
कितना ही जुस्तुजू में फिरे हम इधर इधर
लेकिन मिला न हम से वो अय्यार फ़ित्नागर
मिलना तो इक तरफ़ है अज़ीज़ो कि भर-नज़र
पोशाक की भी हम ने न देखी बहार आह

रखते थे हम उमीद ये दिल में कि ईद को
क्या क्या गले लगावेंगे दिल-बर को शाद हो
सो तू वो आज भी न मिला शोख़-ए-हीला-जू
थी आस ईद की सो गई वो भी दोस्तो
अब देखें क्या करे दिल-ए-उम्मीद-वार आह

उस संग-दिल की हम ने ग़रज़ जब से चाह की
देखा न अपने दिल को कभी एक दम ख़ुशी
कुछ अब ही उस की जौर-ओ-तअद्दी नहीं नई
हर ईद में हमें तो सदा यास ही रही
काफ़िर कभी न हम से हुआ हम-कनार आह

इक़रार हम से था कई दिन आगे ईद से
यानी कि ईद-गाह को जावेंगे तुम को ले
आख़िर को हम को छोड़ गए साथ और के
हम हाथ मलते रह गए और राह देखते
हम हाथ मलते रह गए और राह देखते
क्या क्या ग़रज़ सहा सितम-ए-इंतिज़ार आह

क्यूँ कर लगें न दिल में मिरे हसरतों के तीर
दिन ईद के भी मुझ से हुआ वो कनारा-गीर
इस दर्द को वो समझे जो हो इश्क़ का असीर
जिस ईद में कि यार से मिलना न हो ‘नज़ीर’
उस के उपर तो हैफ़ है और सद-हज़ार आह

5. बचपन

क्या दिन थे यारो वह भी थे जबकि भोले भाले ।
निकले थी दाई लेकर फिरते कभी ददा ले ।।
चोटी कोई रखा ले बद्धी कोई पिन्हा ले ।
हँसली गले में डाले मिन्नत कोई बढ़ा ले ।।
मोटें हों या कि दुबले, गोरे हों या कि काले ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।1।।

दिल में किसी के हरगिज़ न शर्म न हया है ।
आगा भी खुल रहा है,पीछा भी खुल रहा है ।।
पहनें फिरे तो क्या है, नंगे फिरे तो क्या है ।
याँ यूँ भी वाह वा है और वूँ भी वाह वा है ।।
कुछ खाले इस तरह से कुछ उस तरह से खाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।2।।

मर जावे कोई तो भी कुछ उनका ग़म न करना ।
ने जाने कुछ बिगड़ना, ने जाने कुछ संवरना ।।
उनकी बला से घर में हो क़ैद या कि घिरना ।
जिस बात पर यह मचले फिर वो ही कर गुज़रना ।।
माँ ओढ़नी को, बाबा पगड़ी को बेच डाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।3।।

जो कोई चीज़ देवे नित हाथ ओटते हैं ।
गुड़, बेर, मूली, गाजर, ले मुँह में घोटते हैं ।।
बाबा की मूँछ माँ की चोटी खसोटते हैं ।
गर्दों में अट रहे हैं, ख़ाकों में लोटते हैं ।।
कुछ मिल गया सो पी लें, कुछ बन गया सो खालें ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।4।।

जो उनको दो सो खा लें, फीका हो या सलोना ।
हैं बादशाह से बेहतर जब मिल गया खिलौना ।।
जिस जा पे नींद आई फिर वां ही उनको सोना ।
परवा न कुछ पलंग की ने चाहिए बिछौना ।।
भोंपू कोई बजा ले, फिरकी कोई फिरा ले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।5।।

ये बालेपन का यारो, आलम अजब बना है ।
यह उम्र वो है इसमें जो है सो बादशाह है।।
और सच अगर ये पूछो तो बादशाह भी क्या है।
अब तो ‘‘नज़ीर’’ मेरी सबको यही दुआ है ।
जीते रहें सभी के आसो-मुराद वाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।6।।

(सलोना =नमकीन, आलम=दुनिया)

6. रोटियाँ

जब आदमी के पेट में आती हैं रोटियाँ ।
फूली नही बदन में समाती हैं रोटियाँ ।।
आँखें परीरुख़ों से लड़ाती हैं रोटियाँ ।
सीने ऊपर भी हाथ चलाती हैं रोटियाँ ।।
जितने मज़े हैं सब ये दिखाती हैं रोटियाँ ।।1।।

रोटी से जिनका नाक तलक पेट है भरा ।
करता फिरे है क्या वह उछल-कूद जा बजा ।।
दीवार फ़ाँद कर कोई कोठा उछल गया ।
ठट्ठा हँसी शराब, सनम साक़ी, उस सिवा ।।
सौ-सौ तरह की धूम मचाती हैं रोटियाँ ।।2।।

जिस जा पे हाँडी चूल्हा तवा और तनूर है ।
ख़ालिक़ के कुदरतों का उसी जा ज़हूर है ।।
चूल्हे के आगे आँच जो जलती हुज़ूर है ।
जितने हैं नूर सब में यही ख़ास नूर है ।।
इस नूर के सबब नज़र आती हैं रोटियाँ ।।3।।

आवे तवे तनूर का जिस जा ज़ुबाँ पे नाम ।
या चक्की चूल्हे के जहाँ गुलज़ार हो तमाम ।।
वां सर झुका के कीजे दण्डवत और सलाम ।
इस वास्ते कि ख़ास ये रोटी के हैं मुक़ाम ।।
पहले इन्हीं मकानों में आती हैं रोटियाँ ।।4।।

इन रोटियों के नूर से सब दिल हैं पूर-पूर ।
आटा नहीं है छलनी से छन-छन गिरे है नूर ।।
पेड़ा हर एक उस का है बर्फ़ी या मोती चूर ।
हरगिज़ किसी तरह न बुझे पेट का तनूर ।।
इस आग को मगर यह बुझाती हैं रोटियाँ ।।5।।

पूछा किसी ने यह किसी कामिल फक़ीर से ।
ये मेह्र-ओ-माह हक़ ने बनाए हैं काहे के ।।
वो सुन के बोला, बाबा ख़ुदा तुझ को ख़ैर दे ।
हम तो न चाँद समझें, न सूरज हैं जानते ।।
बाबा हमें तो ये नज़र आती हैं रोटियाँ ।।6।।

फिर पूछा उस ने कहिए यह है दिल का नूर क्या ?
इस के मुशाहिर्द में है ख़िलता ज़हूर क्या ?
वो बोला सुन के तेरा गया है शऊर क्या ?
कश्फ़-उल-क़ुलूब और ये कश्फ़-उल-कुबूर क्या ?
जितने हैं कश्फ़ सब ये दिखाती हैं रोटियाँ ।।7।।

रोटी जब आई पेट में सौ कन्द घुल गए ।
गुलज़ार फूले आँखों में और ऐश तुल गए ।।
दो तर निवाले पेट में जब आ के ढुल गए ।
चौदह तबक़ के जितने थे सब भेद खुल गए ।।
यह कश्फ़ यह कमाल दिखाती हैं रोटियाँ ।।8।।

रोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न हो ।
मेले की सैर ख़्वाहिश-ए-बाग़-ओ-चमन न हो ।।
भूके ग़रीब दिल की ख़ुदा से लगन न हो ।
सच है कहा किसी ने कि भूके भजन न हो ।।
अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियाँ ।।9।।

अब जिनके आगे मालपूए भर के थाल हैं ।
पूरे भगत उन्हें कहो, साहब के लाल हैं ।।
और जिन के आगे रोग़नी और शीरमाल हैं ।
आरिफ़ वही हैं और वही साहिब कमाल हैं ।।
पकी पकाई अब जिन्हें आती हैं रोटियाँ ।।10।।

कपड़े किसी के लाल हैं रोटी के वास्ते ।
लम्बे किसी के बाल हैं रोटी के वास्ते ।।
बाँधे कोई रुमाल है रोटी के वास्ते ।
सब कश्फ़ और कमाल हैं रोटी के वास्ते ।।
जितने हैं रूप सब ये दिखाती हैं रोटियाँ ।।11।।

रोटी से नाचे प्यादा क़वायद दिखा-दिखा ।
असवार नाचे घोड़े को कावा लगा-लगा ।।
घुँघरू को बाँधे पैक भी फिरता है जा बजा ।
और इस के सिवा ग़ौर से देखो तो जा बजा ।।
सौ-सौ तरह के नाच दिखाती हैं रोटियाँ ।।12।।

रोटी के नाच तो हैं सभी ख़ल्क में पड़े ।
कुछ भाँड भगतिए ये नहीं फिरते नाचते ।।
ये रण्डियाँ जो नाचें हैं घूँघट को मुँह पे ले ।
घूँघट न जानो दोस्तो ! तुम जिनहार इसे ।।
उस पर्दे में ये अपनी कमाती हैं रोटियाँ ।।13।।

वह जो नाचने में बताती हैं भाव-ताव ।
चितवन इशारतों से कहें हैं कि ’रोटी लाव’ ।।
रोटी के सब सिंगार हैं रोटी के राव-चाव ।
रंडी की ताब क्या करे जो करे इस कदर बनाव ।।
यह आन, यह झमक तो दिखाती हैं रोटियाँ ।।14।।

अशराफ़ों ने जो अपनी ये जातें छुपाई हैं ।
सच पूछिए, तो अपनी ये शानें बढ़ाई हैं ।।
कहिए उन्हीं की रोटियाँ कि किसने खाई हैं ।
अशराफ़ सब में कहिए, तो अब नानबाई हैं ।।
जिनकी दुकान से हर कहीं जाती हैं रोटियाँ ।।15।।

भटियारियाँ कहावें न अब क्योंकि रानियाँ ।
मेहतर खसम हैं उनके वे हैं मेहतरानियाँ ।।
ज़ातों में जितने और हैं क़िस्से कहानियाँ ।
सब में उन्हीं की ज़ात को ऊँची हैं बानियाँ ।।
किस वास्ते की सब ये पकाती हैं रोटियाँ ।।16।।

दुनिया में अब बदी न कहीं और निकोई है ।
ना दुश्मनी ना दोस्ती ना तुन्दखोई है ।।
कोई किसी का, और किसी का न कोई है ।
सब कोई है उसी का कि जिस हाथ डोई है ।।
नौकर नफ़र ग़ुलाम बनाती हैं रोटियाँ ।।17।।

रोटी का अब अज़ल से हमारा तो है ख़मीर ।
रूखी भी रोटी हक़ में हमारे है शहद-ओ-शीर ।।
या पतली होवे मोटी ख़मीरी हो या फ़तीर ।
गेहूँ, ज्वार, बाजरे की जैसी भी हो ‘नज़ीर‘ ।।
हमको तो सब तरह की ख़ुश आती हैं रोटियाँ ।।18।।

(परीरुख़ों=परियों जैसी शक्ल सूरत वाली, ज़हूर=
प्रकट, कामिल=निपुण, मेह्र-ओ-माह=सूर्य-चाँद,
हक़=ख़ुदा, मुशाहिर्द=निरीक्षण, कश्फ़-उल-क़ुलूब=
मन की गुप्त जानकारी देना, कश्फ़-उल-कुबूर=क़ब्र की
गुप्त जानकारी देना, कश्फ़=गुप्त जानकारी, कन्द=शक्कर,
गुलज़ार=बाग़, पैक=पत्रवाहक, पुराने ज़माने में जिसके पैर
में या लाठी में घूँघरू बँधे होते थे, जिनहार=हरगिज,
अशराफ़=शरीफ़ का बहुवचन, निकोई=अच्छाई,
तुन्दखोई=बदमिजाज़ी, नफ़र=मज़दूर, फ़तीर=
गुंधे हुए आटे की लोई)

7. श्री कृष्ण जी की तारीफ़ में

है सबका ख़ुदा सब तुझ पे फ़िदा ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।
हे कृष्ण कन्हैया, नन्द लला !
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

इसरारे हक़ीक़त यों खोले ।
तौहीद के वह मोती रोले ।
सब कहने लगे ऐ सल्ले अला ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

सरसब्ज़ हुए वीरानए दिल ।
इस में हुआ जब तू दाखिल ।
गुलज़ार खिला सहरा-सहरा ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

फिर तुझसे तजल्ली ज़ार हुई ।
दुनिया कहती तीरो तार हुई ।
ऐ जल्वा फ़रोज़े बज़्मे-हुदा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मुट्ठी भर चावल के बदले ।
दुख दर्द सुदामा के दूर किए ।
पल भर में बना क़तरा दरिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

जब तुझसे मिला ख़ुद को भूला ।
हैरान हूँ मैं इंसा कि ख़ुदा ।
मैं यह भी हुआ, मैं वह भी हुआ ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

ख़ुर्शीद में जल्वा चाँद में भी ।
हर गुल में तेरे रुख़सार की बू ।
घूँघट जो खुला सखियों ने कहा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

दिलदार ग्वालों, बालों का ।
और सारे दुनियादारों का ।
सूरत में नबी सीरत में ख़ुदा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

इस हुस्ने अमल के सालिक ने ।
इस दस्तो जबलए के मालिक ने ।
कोहसार लिया उँगली पे उठा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मन मोहिनी सूरत वाला था ।
न गोरा था न काला था ।
जिस रंग में चाहा देख लिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

तालिब है तेरी रहमत का ।
बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा ।
तू बहरे करम है नंद लला ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

(ग़नी,=बेपरवाह, इसरार=भेद,
तौहीद=एक ईश्वर को मानना,
गुलज़ार=बाग़, सहरा-सहरा=
जंगल-जंगल, तजल्ली=नूर, ज़ार=
भरपूर, फ़रोज़े=रौशन करने वाले,
बज़्मे-हुदा=सत्य की महफिल,
ख़ुर्शीद=सूरज, रुख़सार=गाल,
नबी=पैग़म्बर, सीरत=स्वभाव,
अमल=काम, सालिक=साधक,
दसतो जबलए=जंगल और पहाड़,
कोहसार=पहाड़, तालिब=इच्छुक,
नाचीज़=तुच्छ, बहरे करम=दया,
का सागर)

8. इश्क़ की मस्ती

हैं आशिक़ और माशूक जहाँ वां शाह बज़ीरी है बाबा ।
नै रोना है नै धोना है नै दर्द असीरी है बाबा ।।
दिन-रात बहारें चुहलें हैं और इश्क़ सग़ीरी है बाबा ।
जो आशिक़ हैं सो जानें हैं यह भेड फ़क़ीरी है बाबा ।।
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।१।।

है चाह फ़क़त एक दिलबर की फिर और किसी की चाह नहीं ।
एक राह उसी से रखते हैं फिर और किसी से राह नहीं ।
यां जितना रंजो तरद्दुद है हम एक से भी आगाह नहीं।
कुछ करने का सन्देह नहीं, कुछ जीने की परवाह नहीं ।।
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।२।।

कुछ ज़ुल्म नहीं, कुछ ज़ोर नहीं, कुछ दाद नहीं फ़रयाद नहीं।
कुछ क़ैद नहीं, कुछ बन्द नहीं, कुछ जब्र नहीं, आज़ाद नहीं ।।
शागिर्द नहीं, उस्ताद नहीं, वीरान नहीं, आबाद नहीं ।
हैं जितनी बातें दुनियां की सब भूल गए कुछ याद नहीं ।।
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।३।।

जिस सिम्त नज़र भर देखे हैं उस दिलबर की फुलवारी है ।
कहीं सब्ज़ी की हरियाली है, कहीं फूलों की गुलकारी है ।।
दिन-रात मगन ख़ुश बैठे हैं और आस उसी की भारी है ।
बस आप ही वह दातारी हैं और आप ही वह भंडारी हैं ।।
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।४।।

नित इश्रत है, नित फ़रहत है, नित राहत है, नित शादी है ।
नित मेहरो करम है दिलबर का नित ख़ूबी ख़ूब मुरादी है ।।
जब उमड़ा दरिया उल्फ़त का हर चार तरफ़ आबादी है ।
हर रात नई एक शादी है हर रोज़ मुबारकबादी है ।।
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।५।।

है तन तो गुल के रंग बना और मुँह पर हरदम लाली है ।
जुज़ ऐशो तरब कुछ और नहीं जिस दिन से सुरत संभाली है ।।
होंठो में राग तमाशे का और गत पर बजती ताली है ।
हर रोज़ बसंत और होली है और हर इक रात दिवाली है ।।
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।६।।

हम चाकर जिसके हुस्न के हैं वह दिलबर सबसे आला है ।
उसने ही हमको जी बख़्शा उसने ही हमको पाला है ।।
दिल अपना भोला-भाला है और इश्क़ बड़ा मतवाला है ।
क्या कहिए और ’नज़ीर’ आगे अब कौन समझने वाला है ।।
हर आन हँसी, हर आन ख़ुशी हर वक़्त अमीरी है बाबा ।
जब आशिक़ मस्त फ़क़ीर हुए फिर क्या दिलगीरी है बाबा ।।७।।

(असीरी=तेज़, सग़ीरी=थोड़ा, दिलगीरी=दुख, तरद्दुद=सोच,
दाद=इंसाफ़, जब्र=ज़ुल्म, गुलकारी=बेल-बूटे बनाने का
काम, इश्रत=ख़ुशी, फ़रहत=ख़ुशी, करम=कृपा, तरब=आनंद)

9. पेट

किसी सूरत नहीं भरता ज़रा पेट, यह कुछ रखता है अब हर्सो हक ।
अगर चोरी न करता चोर यारो, तो होता चाक कहो उसका भला पेट ।।

चले हैं मार अशराफ़ों को धक्का, मियाँ जिस दम कमीने का भरा पेट ।
नहीं चैन उसको इस काफ़िर के हाथों, है छोटा जिसका अघसेरा बना पेट ।।

ख़ुदा हाफ़िज़ उन लोगों का यारो, कि जिनकी है बड़ी तोंद और बड़ा पेट ।
सदा माशूक पेड़े माँगता है, मलाई-सा वह आशिक़ को दिखा पेट ।।

और आशिक़ का भी इसके देखने से, कभी मुतलिक नहीं भरा पेट ।
ग़रीब आजिज तो है लाचार यारो ! कि उनसे हर घड़ी है माँगता पेट ।।

तसल्ली ख़ूब उनको भी नहीं है कि घर दौलत से जिनके फट पड़ा पेट ।
किसी तरह यह मुहिब न यार न दोस्त फ़क़त रोटी का है इकआश्ना पेट ।।

भरे तो इस ख़ुशी में फूल जावे कि गोया बाँझ के तई रह गया पेट ।
जो खाली हो तो दिन को यों करे सुस्त किसी का जैसे दस्तों से चला पेट ।।

बड़ा कोई नहीं दुनिया में यारो मगर कहिए तो सबसे बड़ा पेट ।
हुए पूरे फक़ीरी में वही लोग जिन्होंने सब्र से अपना कसा पेट ।।

लगा पूरब से लेकर ताबः पच्छिम लिए फिरता है सबको जा बजा पेट ।
कई मन किया गया मज़मून का आटा ’नज़ीर’ इस रेख्ते का है बड़ा पेट ।।

(अशराफ़=शरीफ़, फ़क्त=केवल, इकआश्ना=जानकार)

10. शब-बरात

आलम के बीच जिस घड़ी आती है शब-बरात ।
क्या-क्या जहूरे नूर दिखाती है शब-बरात ।।

देखे है बन्दिगी में जिसे जागता तो फिर ।
फूली नहीं बदन में समाती है शब-बरात ।।

रोशन हैं दिल जिन्हों के इबादत के नूर से ।
उनको तमाम रात जगाती है शब-बरात ।।

बख्शिश ख़ुदा की राह में करते हैं जो मुहिब ।
बरकत हमेशा उनकी बढ़ाती है शब-बरात ।।

ख़ालिक की बन्दिगी करो और नेकियों के दम ।
यह बात हर किसी को सुनाती है शब-बरात ।।

गाफ़िल न बन्दिगी से हो और ख़ैर से ज़रा ।
हर लहज़ा ये सभों को जताती है शब-बरात ।।

हुस्ने अमल करके जो भला आक़िबत में हो ।
सबको यह नेक राह बताती है शब-बरात ।।

लेकर हमीर हमज़ा के हर बार नाम को ।
ख़ल्क़त को उनकी याद दिलाती है शब-बरात ।।

क्या-क्या मैं इस शब-बरात की खूंबी कहूँ ’नज़ीर’ ।
लाखों तरह की ख़ूबियाँ लाती है शब-बरात ।।

(जहूर=प्रकट करना, नूर=प्रकाश, मुहिब=प्रेमी,
ख़ालिक=ईश्वर, गाफ़िल=बेख़बर, लहज़ा=समय,
आक़िबत=यमलोक)

11. होली

हुआ जो आके निशाँ आश्कार होली का ।
बजा रबाब से मिलकर सितार होली का ।
सुरुद रक़्स हुआ बेशुमार होली का ।
हँसी-ख़ुशी में बढ़ा कारोबार होली का ।
ज़ुबाँ पे नाम हुआ बार-बार होली का ।।1।।

ख़ुशी की धूम से हर घर में रंग बनवाए ।
गुलाल अबीर के भर-भर के थाल रखवाए ।
नशों के जोश हुए राग-रंग ठहराए ।
झमकते रूप के बन-बन के स्वाँग दिखलाए ।
हुआ हुजूम अजब हर किनार होली का ।।2।।

गली में कूचे में ग़ुल शोर हो रहे अक्सर ।
छिड़कने रंग लगे यार हर घड़ी भर-भर ।
बदन में भीगे हैं कपड़े, गुलाल चेहरों पर ।
मची यह धूम तो अपने घरों से ख़ुश होकर ।
तमाशा देखने निकले निगार होली का ।।3।।

बहार छिड़कवाँ कपड़ों की जब नज़र आई ।
हर इश्क़ बाज़ ने दिल की मुराद भर पाई ।
निगाह लड़ाके पुकारा हर एक शैदाई ।
मियाँ ये तुमने जो पोशाक अपनी दिखलाई ।
ख़ुश आया अब हमें, नक़्शो-निगार होली का ।।4।।

तुम्हारे देख के मुँह पर गुलाल की लाली ।
हमारे दिल को हुई हर तरह की ख़ुशहाली ।
निगाह ने दी, मये गुल रंग की भरी प्याली ।
जो हँस के दो हमें प्यारे तुम इस घड़ी गाली ।
तो हम भी जानें कि ऐसा है प्यार होली का ।।5।।

जो की है तुमने यह होली की तरफ़ा तैयारी ।
जो हँस के देखो इधर को भी जान यक बारी ।
तुम्हारी आन बहुत हमको लगती है प्यारी ।
लगा दो हाथ से अपने जो एक पिचकारी ।
तो हम भी देखें बदन पे सिंगार होली का ।।6।।

तुम्हारे मिलने का रखकर हम अपने दिल में ध्यान ।
खड़े हैं आस लगाकर कि देख लें एक आन ।
यह ख़ुशदिल का जो ठहरा है आन कर सामान ।
गले में डाल कर बाहें ख़ुशी से तुम ऐ जान !
पिन्हाओ हम को भी एकदम यह हार होली का ।।7।।

उधर से रंग लिए आओ तुम इधर से हम ।
गुलाल अबीर मलें मुँह पे होके ख़ुश हर दम ।
ख़ुशी से बोलें हँसे होली खेल कर बाहम ।
बहुत दिनों से हमें तो तुम्हारे सर की कसम ।
इसी उम्मीद में था इन्तिज़ार होली का ।।8।।

बुतों की गालियाँ हँस-हँस के कोई सहता है ।
गुलाल पड़ता है कपड़ों से रंग बहता है ।
लगा के ताक कोई मुँह को देख रहता है ।
’नज़ीर’ यार से अपने खड़ा ये कहता है ।
मज़ा दिखा हमें कुछ तू भी यार होली का ।।9।।

(आश्कार=ज़ाहिर, सुरुद=गाना, रक़्स=
नृत्य, अबीर=अभ्रक का चूर्ण, निगार=प्रेमी,
नक़्शो-निगार=बेल-बूटे, मय=शराब, बाहम=
आपस में)

12. होली

बुतों के ज़र्द पैराहन में इत्र चम्पा जब महका ।
हुआ नक़्शा अयाँ होली की क्या-क्या रस्म और रह का ।।१।।

गुलाल आलूदः गुलचहरों के वस्फ़े रुख में निकले हैं ।
मज़ा क्या-क्या ज़रीरे कल्क से बुलबुल की चह-चह का ।।२।।

गुलाबी आँखड़ियों के हर निगाह से जाम मिल पीकर ।
कोई खरखुश, कोई बेख़ुद, कोई लोटा, कोई बहका ।।३।।

खिडकवाँ रंग खूबाँ पर अज़ब शोखी दिखाता है ।
कभी कुछ ताज़गी वह, वह कभी अंदाज़ रह-रह का ।।४।।

भिगोया दिलवरों ने जब ‘नज़ीर’ अपने को होली में ।
तो क्या क्या तालियों का ग़ुल हुआ और शोर क़ह क़ह का ।।५।।

(पैराहन=वस्त्र, नक़्शा अयाँ=तस्वीर स्पष्ट हो गई,
रस्म और रह=तौर-तरीके, आलूदः=लगे हुए,
रुख=कपोल, कल्क=बेचैन, खरखुश=नशे में मस्त,
शोखी=चंचलता, ग़ुल=शोर)

13. होली

बजा लो तब्लो तरब इस्तमाल होली का ।
हुआ नुमूद में रंगो जमाल होली का ।।
भरा सदाओं में, रागो ख़़याल होली का ।
बढ़ा ख़ुशी के चमन में निहाल होली का ।।
अज़ब बहार में आया जमाल होली का ।।१।।

हर तरफ़ से लगे रंगो रूप कुछ सजने ।
चमक के हाथों में कुछ तालियाँ लगी बजने ।।
किया ज़हूर हँसी और ख़ुशी की सजधज ने ।
सितारो ढोलो मृदंग दफ़ लगे बजने ।।
धमक के तबले पै खटके है ताल होली का ।।२।।

जिधर को देखो उधर ऐशो चुहल के खटके ।
हैं भीगे रंग से दस्तारो जाम और पटके ।।
भरे हैं हौज कहीं रंग के कहीं मटके ।
कोई ख़ुशी से खड़ा थिरके और मटके ।।
यह रंग ढंग है रंगी खिसाल होली का ।।३।।

निशातो ऐश से चलत तमाशे झमकेरे ।
बदन में छिड़कवाँ जोड़े सुनहरे बहुतेरे ।
खड़े हैं रंग लिए कूच औ गली घेरे ।
पुकारते हैं कि भड़ुआ हो अब जो मुँह फेरे ।
यह कहके देते हैं झट रंग डाल होली का ।।४।।

ज़रूफ़ बादए गुलरंग से चमकते हैं ।
सुराही उछले है और जाम भी छलकते हैं ।।
नशों के जोश में महबूब भी झमकते हैं ।
इधर अबीर उधर रंग ला छिड़कते हैं ।।
उधर लगाते हैं भर-भर गुलाल होली का ।।५।।

जो रंग पड़ने से कपड़ों तईं छिपाते हैं ।
तो उनको दौड़ के अक्सर पकड़ के लाते हैं ।।
लिपट के उनपे घड़े रंग के झुकाते हैं ।
गुलाल मुँह पे लगा ग़ुलमचा सुनाते हैं ।।
यही है हुक्म अब ऐश इस्तमाल होली का ।।६।।

गुलाल चहरए ख़ूबाँ पै यों झमकता है ।
कि रश्क से गुले-ख़ुर्शीद उसको तकता है ।।
उधर अबीर भी अफ़शाँ नमित चमकता है ।
हरेक के ज़ुल्फ़ से रंग इस तरह टपकता है ।।
कि जिससे होता है ख़ुश्क बाल-बाल होली का ।।७।।

कहीं तो रंग छिड़क कर कहें कि होली है ।
कोई ख़ुशी से ललक कर कहें कि होली है ।
अबीर फेंकें हैं तक कर कहें की होली है ।
गुलाल मलके लपक कर कहें कि होली है ।
हरेक तरफ़ से है कुछ इत्तिसाल होली का ।।८।।

यह हुस्न होली के रंगीन अदाए मलियाँ हैं ।
जो गालियाँ हैं तो मिश्री की वह भी डलियाँ हैं ।।
चमन हैं कूचाँ सभी सहनो बाग गलियाँ हैं ।
तरब है ऐश है, चुहलें हैं , रंगरलियाँ हैं ।।

अजब ‘नज़ीर’ है फ़रखु़न्दा हाल होली का ।।९।।

(तब्लो तरब=ख़ुशी का ढोल, नुमूद=धूमधाम,
रंगो जमाल=सुन्दरता, ज़हूर=रौशन, दस्तारो
जाम=पगड़ी और चादर, खिसाल=आदत, निशातो
ऐश=आनंद और सुख, गुले-ख़ुर्शीद=सूरजमुखी,
इत्तिसाल=मेल-मिलाप, तरब=आनन्द, फ़रखु़न्दा=
ख़ुशी का)

14. होली पिचकारी

हाँ इधर को भी ऐ गुंचादहन पिचकारी ।
देखें कैसी है तेरी रंगबिरंग पिचकारी ।।१।।

तेरी पिचकारी की तक़दीद में ऐ गुल हर सुबह ।
साथ ले निकले है सूरज की किरण पिचकारी ।।२।।

जिस पे हो रंग फिशाँ उसको बना देती है ।
सर से ले पाँव तलक रश्के चमन पिचकारी ।।३।।

बात कुछ बस की नहीं वर्ना तेरे हाथों में ।
अभी आ बैठें यहीं बनकर हम तंग पिचकारी ।।४।।

हो न हो दिल ही किसी आशिके शैदा का ‘नज़ीर’ ।
पहुँचा है हाथ में उसके बनकर पिचकारी ।।५।।

(गुंचादहन=कली जैसे सुन्दर और छोटे मुँह वाली,
तक़दीद=स्वागत में, फिशाँ=रंग छिड़का हुआ)

15. होली

जब फागुन रंग झमकते हों तब देख बहारें होली की ।
और दफ़ के शोर खड़कते हों तब देख बहारें होली की ।
परियों के रंग दमकते हों तब देख बहारें होली की ।
ख़म शीशए, जाम छलकते हों तब देख बहारें होली की ।
महबूब नशे में छकते हों तब देख बहारें होली की ।।1।।

हो नाच रंगीली परियों का बैठे हों गुलरू रंग भरे ।
कुछ भीगी तानें होली की कुछ नाज़ो-अदा के ढंग भरे ।
दिल भूले देख बहारों को और कानों में आहंग भरे ।
कुछ तबले खड़के रंग भरे कुछ ऐश के दम मुँहचंग भरे ।
कुछ घुँघरू ताल झनकते हों तब देख बहारें होली की ।।2।।

सामान जहाँ तक होता है इस इशरत के मतलूबों का ।
वो सब सामान मुहैया हो और बाग़ खिला हो ख़ूबों का ।
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का ।
इस ऐश मज़े के आलम में इक ग़ोल खड़ा महबूबों का ।
कपड़ों पर रंग छिड़कते हों तब देख बहारें होली की ।।3।।

गुलज़ार खिले हों परियों के, और मजलिस की तैयारी हो ।
कपड़ों पर रंग के छीटों से ख़ुशरंग अजब गुलकारी हो ।
मुँह लाल, गुलाबी आँखें हों, और हाथों में पिचकारी हो ।
उस रंग भरी पिचकारी को, अँगिया पर तककर मारी हो ।
सीनों से रंग ढलकते हों, तब देख बहारें होली की ।।4।।

इस रंग रंगीली मजलिस में, वह रंडी नाचने वाली हो ।
मुँह जिसका चाँद का टुकड़ा हो औऱ आँख भी मय की प्याली हो ।
बदमस्त, बड़ी मतवाली हो, हर आन बजाती ताली हो ।
मयनोशी हो बेहोशी हो ‘भड़ुए’ की मुँह में गाली हो ।
भड़ुए भी भड़ुवा बकते हों, तब देख बहारें होली की ।।5।।

और एक तरफ़ दिल लेने को महबूब भवैयों के लड़के ।
हर आन घड़ी गत भरते हों कुछ घट-घट के कुछ बढ़-बढ़ के ।
कुछ नाज़ जतावें लड़-लड़ के कुछ होली गावें अड़-अड़ के ।
कुछ लचकें शोख़ कमर पतली कुछ हाथ चले कुछ तन फ़ड़के ।
कुछ काफ़िर नैन मटकते हों तब देख बहारें होली की ।।6।।

यह धूम मची हो होली की और ऐश मज़े का छक्कड़ हो ।
उस खींचा-खींच घसीटी पर और भडुए रंडी का फक्कड़ हो ।
माजून शराबें, नाच, मज़ा और टिकिया, सुलफ़ा, कक्कड़ हो ।
लड़-भिड़के ‘नज़ीर’ फिर निकला हो कीचड़ में लत्थड़-पत्थड़ हो ।
जब ऐसे ऐश झमकते हों तब देख बहारें होली की ।।7।।

(ख़म=सुराही, छकते=मस्त, गुलरू=फूलों जैसे मुखड़े वाली,
आहंग=गान, इशरत=ख़ुशी, मतलूबों=इच्छुक, मयनोशी=शराबनोशी,
भड़ुए=वेश्याओं के साथ नकल करने वाले, भड़ुवा=मज़ाक, भवैयों=
भावपूर्ण ढंग से नाचने वाले, माजून=कुटी हुई दवाओं को शहद या
शंकर क़िवाम में मिलाकर बनाया हुआ अवलेह, टिकिया=चरस गांजे
वगैरह की टिकिया, सुलफ़ा=चरस)

16. ख़ुशामद

दिल ख़ुशामद से हर इक शख़्स का क्या राज़ी है
आदमी जिन परी ओ भूत बला राज़ी है
भाई फ़रज़ंद भी ख़ुश बाप चचा राज़ी है
शाद मसरूर ग़नी शाह ओ गदा राज़ी है
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

अपना मतलब हो तो मतलब की ख़ुशामद कीजे
और न हो काम तो उस ढब की ख़ुशामद कीजे
औलिया अंबिया और रब की ख़ुशामद कीजे
अपने मक़्दूर ग़रज़ सब की ख़ुशामद कीजे
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

चार दिन जिस को किया झुक के ख़ुशामद से सलाम
वो भी ख़ुश हो गया अपना भी हुआ काम में काम
बड़े आक़िल बड़े दाना ने निकाला है ये दाम
ख़ूब देखा तो ख़ुशामद ही की आमद है तमाम
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

बद बख़ील और सख़ी की भी ख़ुशामद कीजे
और जो शैतान हो तो उस की भी ख़ुशामद कीजे
गर वली हो तो वली की भी ख़ुशामद कीजे
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

प्यार से जोड़ दिए जिस की तरफ़ हाथ जो आह
वहीं ख़ुश हो गया करते ही वो हाथों पे निगाह
ग़ौर से हम ने जो इस बात को देखा वल्लाह
कुछ ख़ुशामद ही बड़ी चीज़ है अल्लाह अल्लाह
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

पीने और पहनने खाने की ख़ुशामद कीजे
हीजड़े भाँड ज़नाने की ख़ुशामद कीजे
मस्त ओ हुशियार दिवाने की ख़ुशामद कीजे
भोले नादान सियाने की ख़ुशामद कीजे
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

ऐश करते हैं वही जिन का ख़ुशामद का मिज़ाज
जो नहीं करते वो रहते हैं हमेशा मोहताज
हाथ आता है ख़ुशामद से मकाँ मुल्क और ताज
क्या ही तासीर की इस नुस्ख़े ने पाई है रिवाज
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

गर भला हो तो भले की भी ख़ुशामद कीजे
और बुरा हो तो बुरे की भी ख़ुशामद कीजे
पाक नापाक सिड़े की भी ख़ुशामद कीजे
कुत्ते बिल्ली ओ गधे की भी ख़ुशामद कीजे
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

ख़ूब देखा तो ख़ुशामद की बड़ी खेती है
ग़ैर की अपने ही घर बीच ये सुख देती है
माँ ख़ुशामद के सबब छाती लगा लेती है
नानी दादी भी ख़ुशामद से दुआ देती है
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

बी-बी कहती है मियाँ आ तिरे सदक़े जाऊँ
सास बोले कहीं मत जा तिरे सदक़े जाऊँ
ख़ाला कहती है कि कुछ खा तिरे सदक़े जाऊँ
साली कहती है कि भय्या तिरे सदक़े जाऊँ
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

आ पड़ा है जो ख़ुशामद से सरोकार उसे
ढूँडते फिरते हैं उल्फ़त के ख़रीदार उसे
आश्ना मिलते हैं और चाहे हैं सब यार उसे
अपने बेगाने ग़रज़ करते हैं सब प्यार उसे
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

रूखी और रोग़नी आबी को ख़ुशामद कीजे
नान-बाई ओ कबाबी की ख़ुशामद कीजे
साक़ी ओ जाम शराबी की ख़ुशामद कीजे
पारसा रिंद ख़राबी की ख़ुशामद कीजे
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

जो कि करते हैं ख़ुशामद वो बड़े हैं इंसाँ
जो नहीं करते वो रहते हैं हमेशा हैराँ
हाथ आते हैं ख़ुशामद से हज़ारों सामाँ
जिस ने ये बात निकाली है मैं उस के क़ुर्बां
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

कौड़ी पैसे ओ टके ज़र की ख़ुशामद कीजे
लाल ओ नीलम दर ओ गौहर की ख़ुशामद कीजे
और जो पत्थर हो तो पत्थर की ख़ुशामद कीजे
नेक ओ बद जितने हैं यक-सर की ख़ुशामद कीजे
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

हम ने हर दिल की ख़ुशामद की मोहब्बत देखी
प्यार इख़्लास ओ करम मेहर मुरव्वत देखी
दिलबरों में भी ख़ुशामद ही की उल्फ़त देखी
आशिक़ों मैं भी ख़ुशामद ही की चाहत देखी
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

पारसा पीर है ज़ाहिद है मना जाती है
जुवारिया चोर दग़ाबाज़ ख़राबाती है
माह से माही तलक च्यूँटी है या हाथी है
ये ख़ुशामद तो मियाँ सब के तईं भाती है
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

गर न मीठी हो तो कड़वी भी ख़ुशामद कीजे
कुछ न हो पास तो ख़ाली भी ख़ुशामद कीजे
जानी दुश्मन हो तो उस की ख़ुशामद कीजे
सच अगर पूछो तो झूटी भी ख़ुशामद कीजे
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

मर्द ओ ज़न तिफ़्ल ओ जवाँ ख़ुर्द ओ कलाँ पीर ओ फ़क़ीर
जितने आलम में हैं मोहताज ओ गदा शाह वज़ीर
सब के दिल होते हैं फंदे में ख़ुशामद के असीर
तो भी वल्लाह बड़ी बात ये कहता है ‘नज़ीर’
जो ख़ुशामद करे ख़ल्क़ उस से सदा राज़ी है
हक़ तो ये है कि ख़ुशामद से ख़ुदा राज़ी है

17. दार-उल-मकाफ़ात-है दुनिया जिस का नाम मियाँ

है दुनिया जिस का नाम मियाँ ये और तरह की बस्ती है
जो महँगों को तो महँगी है और सस्तों को ये सस्ती है
याँ हरदम झगड़े उठते हैं, हर आन अदालत कस्ती है
गर मस्त करे तो मस्ती है और पस्त करे तो पस्ती है
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल पर्स्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बदस्ती है

जो और किसी का मान रखे, तो उसको भी अरमान मिले
जो पान खिलावे पान मिले, जो रोटी दे तो नान मिले
नुक़सान करे नुक़सान मिले, एहसान करे एहसान मिले
जो जैसा जिस के साथ करे, फिर वैसा उसको आन मिले
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बदस्ती है

जो और किसी की जाँ बख़्शे तो तो उसको भी हक़ जान रखे
जो और किसी की आन रखे तो, उसकी भी हक़ आन रखे
जो याँ कारहने वाला है, ये दिल में अपने जान रखे
ये चरत-फिरत का नक़शा है, इस नक़शे को पहचान रखे
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बद्स्ती है

जो पार उतारे औरों को, उसकी भी पार उतरनी है
जो ग़र्क़ करे फिर उसको भी, डुबकूं-डुबकूं करनी है
शम्शीर तीर बन्दूक़ सिना और नश्तर तीर नहरनी है
याँ जैसी जैसी करनी है, फिर वैसी वैसी भरनी है
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बद्स्ती है

जो ऊँचा ऊपर बोल करे तो उसका बोल भी बाला है
और दे पटके तो उसको भी, कोई और पटकने वाला है
बेज़ुल्म ख़ता जिस ज़ालिम ने मज़लूम ज़िबह करडाला है
उस ज़ालिम के भी लूहू का फिर बहता नद्दी नाला है
कुछ देर नही अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बद्स्ती है

जो और किसी को नाहक़ में कोई झूटी बात लगाता है
और कोई ग़रीब और बेचारा नाहक़ में लुट जाता है
वो आप भी लूटा जाता है औए लाठी-पाठी खाता है
जो जैसा जैसा करता है, वो वौसा वैसा पाता है
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बदस्ती है

है खटका उसके हाथ लगा, जो और किसी को दे खटका
और ग़ैब से झटका खाता है, जो और किसी को दे झटका
चीरे के बीच में चीरा है, और टपके बीच जो है टपका
क्या कहिए और ‘नज़ीर’ आगे, है रोज़ तमाशा झटपट का
कुछ देर नहीं अंधेर नहीं, इंसाफ़ और अद्ल परस्ती है
इस हाथ करो उस हाथ मिले, याँ सौदा दस्त-बदस्ती है

18. जाड़े की बहारें

जब माह अघन का ढलता हो तब देख बहारें जाड़े की
और हँस हँस पूस सँभलता हो तब देख बहारें जाड़े की
दिन जल्दी जल्दी चलता हो तब देख बहारें जाड़े की
और पाला बर्फ़ पिघलता हो तब देख बहारें जाड़े की
चिल्ला ग़म ठोंक उछलता हो तब देख बहारें जाड़े की

तन ठोकर मार पछाड़ा हो और दिल से होती हो कुश्ती सी
थर-थर का ज़ोर उखाड़ा हो बजती हो सब की बत्तीसी
हो शोर फफू हू-हू का और धूम हो सी-सी सी-सी की
कल्ले पे कल्ला लग लग कर चलती हो मुँह में चक्की सी
हर दाँत चने से दलता हो तब देख बहारें जाड़े की

हर एक मकाँ में सर्दी ने आ बाँध दिया हो ये चक्कर
जो हर दम कप-कप होती हो हर आन कड़ाकड़ और थर-थर
पैठी हो सर्दी रग रग में और बर्फ़ पिघलता हो पत्थर
झड़-बाँध महावट पड़ती हो और तिस पर लहरें ले ले कर
सन्नाटा बाव का चलता हो तब देख बहारें जाड़े की

हर चार तरफ़ से सर्दी हो और सेहन खुला हो कोठे का
और तन में नीमा शबनम का हो जिस में ख़स का इत्र लगा
छिड़काव हुआ हो पानी का और ख़ूब पलंग भी हो भीगा
हाथों में पियाला शर्बत का हो आगे इक फर्राश खड़ा
फर्राश भी पंखा झलता हो तब देख बहारें जाड़े की

जब ऐसी सर्दी हो ऐ दिल तब रोज़ मज़े की घातें हों
कुछ नर्म बिछौने मख़मल के कुछ ऐश की लम्बी रातें हों
महबूब गले से लिपटा हो और कुहनी, चुटकी, लातें हों
कुछ बोसे मिलते जाते हों कुछ मीठी मीठी बातें हों
दिल ऐश-ओ-तरब में पलता हो तब देख बहारें जाड़े की

हो फ़र्श बिछा ग़ालीचों का और पर्दे छोटे हों आ कर
इक गर्म अँगीठी जलती हो और शम्अ हो रौशन और तिस पर
वो दिलबर, शोख़, परी, चंचल, है धूम मची जिस की घर घर
रेशम की नर्म निहाली पर सौ नाज़-ओ-अदा से हँस हँस कर
पहलू के बीच मचलता हो तब देख बहारें जाड़े की

तरकीब बनी हो मज्लिस की और काफ़िर नाचने वाले हों
मुँह उन के चाँद के टुकड़े हों तन उन के रूई के गाले हों
पोशाकें नाज़ुक रंगों की और ओढ़े शाल दो-शाले हों
कुछ नाच और रंग की धूमें हों ऐश में हम मतवाले हों
प्याले पर प्याला चलता हो तब देख बहारें जाड़े की

हर एक मकाँ हो ख़ल्वत का और ऐश की सब तय्यारी हो
वो जान कि जिस से जी ग़श हो सौ नाज़ से आ झनकारी हो
दिल देख ‘नज़ीर’ उस की छब को हर आन अदा पर वारी हो
सब ऐश मुहय्या हो आ कर जिस जिस अरमान की बारी हो
जब सब अरमान निकलता हो तब देख बहारें जाड़े की

19. बटमार अजल का आ पहुँचा, टुक उसको देख डरो बाबा

बटमार अजल का आ पहुँचा, टुक उसको देख डरो बाबा।
अब अश्क बहाओ आँखों से और आहें सर्द भरो बाबा।
दिल, हाथ उठा इस जीने से, बस मन मार, मरो बाबा।
जब बाप की ख़ातिर रोते थे, अब अपनी ख़ातिर रो बाबा।
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा॥

ये अस्प बहुत कूदा उछला अब कोड़ा मारो, ज़ेर करो।
जब माल इकट्ठा करते थे, अब तन का अपने ढेर करो।
गढ़ टूटा, लश्कर भाग चुका, अब म्यान में तुम शमशेर करो।
तुम साफ़ लड़ाई हार चुके, अब भागने में मत देर करो।
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा॥

यह उम्र जिसे तुम समझे हो, यह हरदम तन को चुनती है।
जिस लकड़ी के बल बैठे हो, दिन-रात यह लकड़ी घुनती है।
तुम गठरी बांधो कपड़े की, और देख अजल सर धुनती है।
अब मौत कफ़न के कपड़े का याँ ताना-बाना बुनती है।
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा॥

घर बार, रुपए और पैसे में मत दिल को तुम ख़ुरसन्द करो।
या गोर बनाओ जंगल में, या जमुना पर आनन्द करो।
मौत आन लताड़ेगी आख़िर कुछ मक्र करो, या फ़न्द करो।
बस ख़ूब तमाशा देख चुके, अब आँखें अपनी बन्द करो।
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा ॥

व्यापार तो याँ का बहुत किया, अब वहाँ का भी कुछ सौदा लो।
जो खेप उधर को चढ़ती है, उस खेप को याँ से लदवा लो।
उस राह में जो कुछ खाते हैं, उस खाने को भी मंगवा लो।
सब साथी मंज़िल पर पहुँचे, अब तुम भी अपना रस्ता लो।
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा।
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा॥

कुछ देर नहीं अब चलने में, क्या आज चलो या कल निकलो।
कुछ कपड़ा-लत्ता लेना हो, सो जल्दी बांध संभल निकलो।
अब शाम नहीं, अब सुब्‌ह हुई जूँ मोम पिघल कर ढल निकलो।
क्यों नाहक धूप चढ़ाते हो, बस ठंडे-ठंडे चल निकलो।
तन सूखा, कुबड़ी पीठ हुई, घोड़े पर ज़ीन धरो बाबा॥
अब मौत नक़ारा बाज चुका, चलने की फ़िक्र करो बाबा॥

20. फ़क़ीरों की सदा

ज़र की जो मुहब्बत तुझे पड़ जायेगी बाबा!
दुख उसमें तेरी रूह बहुत पायेगी बाबा!
हर खाने को, हर पीने को तरसायेगी बाबा!
दौलत जो तेरे याँ है न काम आयेगी बाबा!
फिर क्या तुझे अल्लाह से मिलवायेगी बाबा! ॥1॥

दाता की तो मुश्किल कोई अटकी नहीं रहती
चढ़ती है पहाड़ों के ऊपर नाव सख़ी की
और तूने बख़ीली से अगर जमा उसे की
तो याद यह रख बात कि जब आवेगी सख़्ती
ख़ुश्की में तेरी नाव यह डुबवायेगी बाबा! ॥2॥

यह तो न किसी पास रही है न रहेगी
जो और से करती रही वह तुझसे करेगी
कुछ शक नहीं इसमें जो बढ़ी है, सो घटेगी
जब तक तू जिएगा, यह तुझे चैन न देगी
और मरते हुए फिर यह ग़ज़ब लायेगी बाबा!॥3॥

जब मौत का होवेगा तुझे आन के धड़का
और निज़अ तेरी आन के दम देवेगी भड़का
जब इसमें तू अटकेगा, न दम निकलेगा फड़का
कुप्पों में रूपै डाल के जब देवेंगे खड़का
तब तन से तेरी जान निकल जायेगी बाबा! ॥4॥

तू लाख अगर माल के सन्दूक भरेगा
है ये तो यक़ीं, आख़िरश एक दिन तो मरेगा
फिर बाद तेरे उस पे जो कोई हाथ धरेगा
वह नाच मज़ा देखेगा और ऎश करेगा
और रुह तेरी क़ब्र में घबरावयेगी बाबा! ॥5॥

उसके तो वहाँ ढोलक औ मिरदंग बजेगी
और रूह तेरी क़ब्र में हसरत से जलेगी
वह खावेगा और तेरे तईं आग लगेगी
ता हश्र तेरी रूह को फिर कल न पड़ेगी
ऐसा यह तुझे गारे में तड़पायेगी बाबा! ॥6॥

गर होश है तुझ में तो बख़ीली का न कर काम
इस काम का आख़िर को बुरा होता है अन्जाम
थूकेगा कोई कह के, कोई देवेगा दुश्नाम
जनहार न लेगा कोई हर सुबह तेरा नाम
पैज़ारे तेरे नाम पे लगवायेगी बाबा!॥7॥

21. बसंत-आलम में जब बहार की आकर लगंत हो

आलम में जब बहार की आकर लगंत हो।
दिल को नहीं लगन हो मजे की लगंत हो।
महबूब दिलबरों से निगह की लड़ंत हो।
इशरत हो, सुख हो, ऐश हो और जी निश्चिंत हो।
जब देखिए बसंत कि कैसी बसंत हो ॥

अव्वल तो जाफ़रां से मकां ज़र्द ज़र्द हों।
सहरा ओ बागो अहले जहां ज़र्द ज़र्द हों।
जोड़े बसंतियों से निहां ज़र्द ज़र्द हों।
इकदम तो सब जमीनो जमां ज़र्द ज़र्द हों।
जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो ॥

मैदां हो सब्ज साफ चमकती भी रेत हो।
साकी भी अपने जाम सुराही समेत हो।
कोई नशे में मस्त हो कोई सचेत हो।
दिलबर गले लिपटते हों सरसों का खेत हो।
जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो ॥

ऑंखों में छा रहे हों बहारों के आवो रंग।
महबूब गुलबदन हों खिंचे हो बगल में तंग।
बजते हों ताल ढोलक व सारंगी ओ मुंहचंग।
चलते हों जाम ऐश के होते हों रंग रंग।
जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो ॥

चारों तरफ से ऐशो तरब के निशान हों।
सुथरे बिछे हों फर्श धरे हार पान हों।
बैठे हुए बगल में कई आह जान हों।
पर्दे पड़े हों ज़र्द सुनहरी मकान हों।
जब देखिए बसंत को कैसी बसंत हो।

कसरत से तायफ़ों की मची हो उलट पुलट।
चोली किसी की मसकी हो अंगिया रही हो कट।
बैठे हों बनके नाज़नीं परियों के ग़ट के ग़ट।
जाते हों दौड़-दौड़ गले से लिपट-लिपट।
जब देखिए बसंत तो कैसी बसंत हो ॥

वह सैर हो कि जावे जिधर की तरफ निगाह।
जो बाल भी जर्द चमके हो कज कुलाह।
पी-पी शराब मस्त हों हंसते हों वाह-वाह।
इसमें मियां ‘नज़ीर’ भी पीते हों वाह-वाह।
जब देखिए बसंत कि कैसी बसंत हो ॥

22. बसंत-फिर आलम में तशरीफ लाई बसंत

फिर आलम में तशरीफ लाई बसंत।
हर एक गुलबदन ने मनाई बसंत॥
तवायफ़ ने हरजाँ उठाई बसंत।
इधर औ’ उधर जगमगाई बसंत॥
हमें फिर ख़ुदा ने दिखाई बसंत ॥1॥

मेरा दिल है जिस नाज़नी पर फ़िदा।
वह काफ़िर भी जोड़ा बसंती बना॥
सरापा वह सरसों का बन खेत-सा।
वह नाज़ुक से हाथों से गड़ुवा उठा॥
अज़ब ढंग से मुझ पास लाई बसंत ॥2॥

वह कुर्ती बसंती वह गेंदे के हार।
वह कमख़्वाब का ज़र्द काफ़िर इज़ार॥
दुपट्टा फिर ज़र्द संजगाफ़दार।
जो देखी मैं उसकी बसंती बहार॥
तो भूली मुझे याद आई बसंत॥3॥

वह कड़वा जो था उसके हाथों में फूल।
गया उसकी पोशाक को देख भूल॥
कि इस्लाम तू अल्लाह ने कर कबूल।
निकाला इसे और छिपाई बसंत ॥4॥

वह अंगिया जो थी ज़र्द और जालदार।
टँकी ज़र्द गोटे की जिस पर कतार॥
वह ज़ो दर्द लेमू को देख आश्कार।
ख़ुशी होके सीने में दिल एक बार॥
पुकारा कि अब मैंने पाई बसंत ॥5॥

वह जोड़ा बसंती जो था ख़ुश अदा।
झमक अपने आलम की उसमें दिखा॥
उठा आँख औ’ नाज़ से मुस्करा।
कहा लो मुबारक हो दिन आज का॥
कि याँ हमको लेकर है आई बसंत ॥6॥

पड़ी उस परी पर जो मेरी निगाह।
तो मैं हाथ उसके पकड़ ख़्वामख़्वाह॥
गले से लिपटा लिया करके चाह।
लगी ज़र्द अंगिया जो सीने से आह॥
तो क्या-क्या जिगर में समाई बसंत ॥7॥

वह पोशाक ज़र्द और मुँह चांद-सा।
वह भीगा हुआ हुस्न ज़र्दी मिला॥
फिर उसमें जो ले साज़ खींची सदा।
समाँ छा गया हर तरफ़ राग का॥
इस आलम से काफ़िर ने गाई बसंत ॥8॥

बंधा फिर वह राग बसंती का तार।
हर एक तान होने लगी दिल के पार॥
वह गाने की देख उसकी उसदम बहार।
हुई ज़र्द दीवारोंदर एक बार ॥
गरज़ उसकी आंखों में छाई बसंत ॥9 ॥

23. बसंत-जहां में फिर हुई ऐ ! यारो आश्कार बसंत

जहां में फिर हुई ऐ ! यारो आश्कार बसंत।
हुई बहार के तौसन पै अब सवार बसंत॥
निकाल आयी खिजाओं को चमन से पार बसंत।
मची है ज़ोर हर यक जा वो हर कनार बसंत॥
अजब बहार से आयी है अबकी बार बसंत॥

जहां में आयी बहार और खिजां के दिन भूले।
चमन में गुल खिले और वन में राय वन फूले॥
गुलों ने डालियों के डाले बाग में झूले।
समाते फूल नहीं पैरहन में अब फूले।
दिखा रही है अजब तरह की बहार बसंत॥

दरख्त झाड़ हर इक पात झाड़ लहराए।
गुलों के सर पै पर बुलबुलों के मंडराए॥
चमन हरे हुए बागों में आम भी आए।
शगूफे खिल गए भौंरे भी गुंजने आए॥
यह कुछ बहार के लायी है वर्गों बार बसंत॥

कहीं तो केसर असली में कपड़े रंगते हैं।
तुन और कुसूम की ज़र्दी में कपड़े रंगते हैं॥
कहीं सिंगार की डंडी में कपड़े रंगते हैं।
गरीब दमड़ी की हल्दी में कपड़े रंगते हैं॥
गर्ज हरेक का बनाती है अब सिंगार बसंत॥

कहीं दुकान सुनहरी लगा के बैठे हैं।
बसंती जोड़े पहन और पहना के बैठे हैं॥
गरीब खेत में सरसों के जाके बैठे हैं।
चमन में बाग में मजलिस बनाके बैठे हैं।
पुकारते हैं अहा! हा! री ज़र निगार बसंत॥

कहीं बसंत गवा हुरकियों से सुनते हैं।
मजीरा तबला व सारंगियों से सुनते हैं॥
कहीं खाबी व मुंहचंगियों से सुनते हैं।
गरीब ठिल्लियों और तालियों से सुनते हैं॥
बंधा रही है समद का हर एक तार बसंत॥

जो गुलबदन हैं अजब सज के हंसते फिरते हैं।
बसंती जोड़ों में क्या-क्या चहकते फिरते हैं॥
सरों पै तुर्रे सुनहरे झमकते फिरते हैं।
गरीब फूल ही गेंदे के रखते फिरते हैं॥
हुई है सबके गले की गरज कि हार बसंत॥

तवायफों में है अब यह बसंत का आदर।
कि हर तरफ को बना गड़ुए रखके हाथों पर॥
गेहूं की बालियां और सरसों की डालियां लेकर।
फिरें उम्दों के कूंचे व कूंचे घर घर॥
रखे हैं आगे सबों के बना संवार बसंत॥

मियां बसंत के यां तक रंग गहरे हैं।
कि जिससे कूंचे और बाज़ार सब सुनहरे हैं॥
जो लड़के नाजनी और तन कुछ इकहरे हैं।
वह इस मजे के बसंती लिबास पहरे हैं॥
कि जिन पै होती है जी जान से निसार बसंत॥

बहा है ज़ोर जहां में बसंत का दरिया।
किसी का जर्द है जोड़ा किसी का केसरिया॥
जिधर को देखो उधर जर्द पोश का रेला।
बने हैं कूच ओ बज़ार खेत सरसों का॥
बिखर रही है गरज आके बेशुमार बसंत॥

‘नज़ीर’ खल्क में यह रुत जो आन फिरती है।
सुनहरे करती महल और दुकान फिरती है॥
दिखाती हुस्न सुनहरी की शान फिरती है।
गोया वही हुई सोने की कान फिरती है।
सबों को ऐश की रहती है यादगार बसंत॥

24. होली की बहार

हिन्द के गुलशन में जब आती है होली की बहार।
जांफिशानी चाही कर जाती है होली की बहार।।

एक तरफ से रंग पड़ता, इक तरफ उड़ता गुलाल।
जिन्दगी की लज्जतें लाती हैं, होली की बहार।।

जाफरानी सजके चीरा आ मेरे शाकी शिताब।
मुझको तुम बिन यार तरसाती है होली की बहार।।

तू बगल में हो जो प्यारे, रंग में भीगा हुआ।
तब तो मुझको यार खुश आती है होली की बहार।।

और हो जो दूर या कुछ खफा हो हमसे मियां।
तो काफिर हो जिसे भाती है होली की बहार।।

नौ बहारों से तू होली खेलले इस दम ‘नजीर’।
फिर बरस दिन के उपर है होली की बहार।।

(जांफिशानी=जान तोड़ कोशिश, जाफरानी=केसर
के रंग का,केसरी, केसर से बना हुआ)

25. बालपन-बाँसुरी बजैया का

यारो सुनो ! ये दधि के लुटैया का बालपन ।
और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।।
मोहन-सरूप निरत करैया का बालपन ।
बन-बन के ग्वाकल गौएँ चरैया का बालपन ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।1।।

ज़ाहिर में सुत वो नंद जसोदा के आप थे ।
वरना वह आप माई थे और आप बाप थे ।।
परदे में बालपन के यह उनके मिलाप थे ।
जोती सरूप कहिए जिन्हेंन सो वह आप थे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।2।।

उनको तो बालपन से न था काम कुछ ज़रा ।
संसार की जो रीति थी उसको रखा बचा ।।
मालिक थे वो तो आपी उन्हेंर बालपन से क्या। ।
वाँ बालपन, जवानी, बुढ़ापा, सब एक सा ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।3।।

मालिक जो होवे उसको सभी ठाठ याँ सरे ।
चाहे वह नंगे पाँव फिरे या मुकुट धरे ।।
सब रूप हैं उसी के वह जो चाहे सो करे ।
चाहे जवाँ हो, चाहे लड़कपन से मन हरे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।4।।

बाले हो ब्रज राज जो दुनियाँ में आ गए ।
लीला के लाख रंग तमाशे दिखा गए ।।
इस बालपन के रूप में कितनों को भा गए ।
इक यह भी लहर थी कि जहाँ को जता गए ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।5।।

यूँ बालपन तो होता है हर तिफ़्ल का भला ।
पर उनके बालपन में तो कुछ और भेद था ।।
इस भेद की भला जी, किसी को ख़बर है क्या ।
क्या जाने अपने खेलने आए थे क्या कला ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।6।।

राधारमन तो यारो अजब जायेगौर थे ।
लड़कों में वह कहाँ है, जो कुछ उनमें तौर थे ।।
आप ही वह प्रभू नाथ थे आप ही वह दौर थे ।
उनके तो बालपन ही में तेवर कुछ और थे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।7।।

वह बालपन में देखते जिधर नज़र उठा ।
पत्थर भी एक बार तो बन जाता मोम सा ।।
उस रूप को ज्ञानी कोई देखता जो आ ।
दंडवत ही वह करता था माथा झुका झुका ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।8।।

परदा न बालपन का वह करते अगर ज़रा ।
क्या ताब थी जो कोई नज़र भर के देखता ।।
झाड़ और पहाड़ देते सभी अपना सर झुका ।
पर कौन जानता था जो कुछ उनका भेद था ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।9।।

मोहन, मदन, गोपाल, हरी, बंस, मन हरन ।
बलिहारी उनके नाम पै मेरा यह तन बदन ।।
गिरधारी, नंदलाल, हरि नाथ, गोवरधन ।
लाखों किए बनाव, हज़ारों किए जतन ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।10।।

पैदा तो मधु पुरी में हुए श्याम जी मुरार ।
गोकुल में आके नन्द के घर में लिया क़रार ।।
नन्द उनको देख होवे था जी जान से निसार ।
माई जसोदा पीती थी पानी को वार वार ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।11।।

जब तक कि दूध पीते रहे ग्वाल ब्रज राज ।
सबके गले के कठुले थे और सबके सर के ताज ।।
सुन्दर जो नारियाँ थीं वे करती थीं कामो-काज ।
रसिया का उन दिनों तो अजब रस का था मिज़ाज ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।12।।

बदशक्ल से तो रोके सदा दूर हटते थे ।
और ख़ूबरू को देखके हँस-हँस चिमटते थे ।।
जिन नारियों से उनके ग़मो-दर्द बँटते थे ।
उनके तो दौड़-दौड़ गले से लिपटते थे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।13।।

अब घुटनियों का उनके मैं चलना बयाँ करूँ ।
या मीठी बातें मुँह से निकलना बयाँ करूँ ।।
या बालकों में इस तरह से पलना बयाँ करूँ ।
या गोदियों में उनका मचलना बयाँ करूँ ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।14।।

पाटी पकड़ के चलने लगे जब मदन गोपाल ।
धरती तमाम हो गई एक आन में निहाल ।।
बासुक चरन छूने को चले छोड़ कर पताल ।
अकास पर भी धूम मची देख उनकी चाल ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।15।।

थी उनकी चाल की जो अ़जब, यारो चाल-ढाल ।
पाँवों में घुंघरू बाजते, सर पर झंडूले बाल ।।
चलते ठुमक-ठुमक के जो वह डगमगाती चाल ।
थांबे कभी जसोदा कभी नन्द लें संभाल ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।16।।

पहने झगा गले में जो वह दखिनी चीर का ।
गहने में भर रहा गोया लड़का अमीर का ।।
जाता था होश देख के शाही वज़ीर का ।
मैं किस तरह कहूँ इसे चॊरा अहीर का ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।17।।

जब पाँवों चलने लागे बिहारी न किशोर ।
माखन उचक्के ठहरे, मलाई दही के चोर ।।
मुँह हाथ दूध से भरे कपड़े भी शोर-बोर ।
डाला तमाम ब्रज की गलियों में अपना शोर ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।18।।

करने लगे यह धूम, जो गिरधारी नन्द लाल ।
इक आप और दूसरे साथ उनके ग्वाल बाल ।।
माखन दही चुराने लगे सबके देख भाल ।
की अपनी दधि की चोरी घर घर में धूम डाल ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।19।।

थे घर जो ग्वालिनों के लगे घर से जा-बजा ।
जिस घर को ख़ाली देखा उसी घर में जा फिरा ।।
माखन मलाई, दूध, जो पाया सो खा लिया ।
कुछ खाया, कुछ ख़राब किया, कुछ गिरा दिया ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।20।।

कोठी में होवे फिर तो उसी को ढंढोरना ।
गोली में हो तो उसमें भी जा मुँह को बोरना ।।
ऊँचा हो तो भी कांधे पै चढ़ कर न छोड़ना ।
पहुँचा न हाथ तो उसे मुरली से फोड़ना ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।21।।

गर चोरी करते आ गई ग्वालिन कोई वहाँ ।
और उसने आ पकड़ लिया तो उससे बोले हाँ ।।
मैं तो तेरे दही की उड़ाता था मक्खियाँ ।
खाता नहीं मैं उसकी निकाले था चूँटियाँ ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।22।।

गर मारने को हाथ उठाती कोई ज़रा ।
तो उसकी अंगिया फाड़ते घूसे लगा-लगा ।।
चिल्लाते गाली देते, मचल जाते जा बजा ।
हर तरह वाँ से भाग निकलते उड़ा छुड़ा ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।23।।

ग़ुस्से में कोई हाथ पकड़ती जो आन कर ।
तो उसको वह सरूप दिखाते थे मुरलीधर ।।
जो आपी लाके धरती वह माखन कटोरी भर ।
ग़ुस्सा वह उनका आन में जाता वहीं उतर ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।24।।

उनको तो देख ग्वालिनें जी जान पाती थीं ।
घर में इसी बहाने से उनको बुलाती थीं ।।
ज़ाहिर में उनके हाथ से वह ग़ुल मचाती थीं ।
पर्दे में सब वह किशन के बलिहारी जाती थीं ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।25।।

कहतीं थीं दिल में दूध जो अब हम छिपाएँगे ।
श्रीकिशन इसी बहाने हमें मुँह दिखाएँगे ।।
और जो हमारे घर में यह माखन न पाएँगे ।
तो उनको क्या गरज़ है यह काहे को आएँगे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।26।।

सब मिल जसोदा पास यह कहती थी आके बीर ।
अब तो तुम्हारा कान्ह हुआ है बड़ा शरीर ।।
देता है हमको गालियाँ फिर फाड़ता है चीर ।
छोड़े दही न दूध, न माखन, मही न खीर ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।27।।

माता जसोदा उनकी बहुत करती मिनतियाँ ।
और कान्ह को डराती उठा बन की साँटियाँ ।।
जब कान्हा जी जसोदा से करते यही बयाँ ।
तुम सच न जानो माता, यह सारी हैं झूटियाँ ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।28।।

माता कभी यह मेरी छुंगलियाँ छुपाती हैं ।
जाता हूँ राह में तो मुझे छेड़ जाती हैं ।।
आप ही मुझे रुठातीं हैं आपी मनाती हैं ।
मारो इन्हें ये मुझको बहुत सा सताती हैं ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।29।।

माता कभी यह मुझको पकड़ कर ले जाती हैं ।
गाने में अपने साथ मुझे भी गवाती हैं ।।
सब नाचती हैं आप मुझे भी नचाती हैं ।
आप ही तुम्हारे पास यह फ़रयादी आती हैं ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।30।।

एक रोज़ मुँह में कान्ह ने माखन झुका दिया ।
पूछा जसोदा ने तो वहीं मुँह बना दिया ।।
मुँह खोल तीन लोक का आलम दिखा दिया ।
एक आन में दिखा दिया और फिर भुला दिया ।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।31।।

थे कान्ह जी तो नंद जसोदा के घर के माह ।
मोहन नवल किशोर की थी सबके दिल में चाह ।।
उनको जो देखता था सो कहता था वाह-वाह ।
ऐसा तो बालपन न हुआ है किसी का आह ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।32।।

सब मिलकर यारो किशन मुरारी की बोलो जै ।
गोबिन्द छैल कुंज बिहारी की बोलो जै ।।
दधिचोर गोपी नाथ, बिहारी की बोलो जै ।
तुम भी ‘नज़ीर’ किशन बिहारी की बोलो जै ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।33।।

26. ईद उल फ़ितर

है आबिदों को त’अत-ओ-तजरीद की ख़ुशी
और ज़ाहिदों को ज़ुहद की तमहीद की ख़ुशी

रिंद आशिक़ों को है कई उम्मीद की ख़ुशी
कुछ दिलबरों के वल की कुछ दीद की ख़ुशी

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

पिछले पहर से उठ के नहाने की धूम है
शीर-ओ-शकर सिवईयाँ पकाने की धूम है

पीर-ओ-जवान को नेम’तें खाने की धूम है
लड़को को ईद-गाह के जाने की धूम है

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

कोई तो मस्त फिरता है जाम-ए-शराब से
कोई पुकरता है के छूटे अज़ाब से

कल्ला किसी का फूला है लड्डू की चाब से
चटकारें जी में भरते हैं नान-ओ-कबाब से

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

क्या हि मुआन्क़े की मची है उलट पलट
मिलते हैं दौड़ दौड़ के बाहम झपट झपट

फिरते हैं दिल-बरों के भी गलियों में ग़त के ग़त
आशिक़ मज़े उड़ाते हैं हर दम लिपट लिपट

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

काजल हिना ग़ज़ब मसी-ओ-पान की धड़ी
पिशवाज़ें सुर्ख़ सौसनी लाही की फुल-झड़ी

कुर्ती कभी दिखा कभी अन्गिया कसी कड़ी
कह “ईद ईद” लूटेन हैं दिल को घड़ी घड़ी

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

रोज़े की ख़ुश्कियों से जो हैं ज़र्द ज़र्द गाल
ख़ुश हो गये वो देखते ही ईद का हिलाल

पोशाकें तन में ज़र्द, सुनहरी सफ़ेद लाल
दिल क्या के हँस रहा है पड़ा तन का बाल बाल

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

जो जो के उन के हुस्न की रखते हैं दिल से चाह
जाते हैं उन के साथ ता बा-ईद-गाह

तोपों के शोर और दोगानों की रस्म-ओ-राह
मयाने, खिलोने, सैर, मज़े, ऐश, वाह-वाह

ऐसी न शब-ए-बरात न बक़्रीद की ख़ुशी
जैसी हर एक दिल में है इस ईद की ख़ुशी

रोज़ों की सख़्तियों में न होते अगर अमीर
तो ऐसी ईद की न ख़ुशी होती दिल-पज़ीर

सब शाद हैं गदा से लगा शाह ता वज़ीर
देखा जो हम ने ख़ूब तो सच है मियाँ “नज़ीर”

(आबिद=श्रद्धालु, त’अत=श्रद्धा, ज़ाहिद=पूजा करने वाला,
ज़ुहद की तमहीद=धर्म की बात की शुरुआत, पीर=पुराना,
नेम’त=इनाम,दया, अज़ाब=यातना, कल्ला=गाल,
मुआनिक़=आलिंगन, ग़ट=भीड़, पिश्वाज़= कुरती,
हिलाल= ईद का चांद)

27. पैसा-पैसे ही का अमीर के दिल में खयाल है

पैसे ही का अमीर के दिल में खयाल है
पैसे ही का फ़कीर भी करता सवाल है

पैसा ही फौज पैसा ही जाहो जलाल है
पैसे ही का तमाम ये तंगो दवाल है

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

पैसा जो होवे पास तो कुन्दन के हैं डले
पैसे बगैर मिट्टी के उस से डले भले

पैसे से चुन्नी लाख की इक लाल दे के ले
पैसा न हो तो कौड़ी को मोती कोई न ले

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

पैसा जो हो तो देव की गर्दन को बाँध लाए
पैसा न हो तो मकड़ी के जाले से खौफ खाए

पैसे से लाला भैया जी और चौधरी कहाए
बिन पैसे साहूकार भी इक चोर-सा दिखाए

पसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

पैसा ही जस दिलाता है इन्साँ के हात को
पैसा ही जेब देता है ब्याह और बरात को

भाई सगा भी आन के पूछे न बात को
बिन पैसे यारो दूल्हा बने आधी रात को

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

पैसे ने जिस मकाँ में बिछाया है अपना जाल
फंसते हैं उस मकां में फरिश्तों के पर ओ बाल

पैसे के आगे क्या है ये महबूब खुश जमाल
पैसा परी को लाए परिस्तान से निकाल

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

दुनिया में दीनदार कहाना भी नाम है
पैसा जहाँ के बीच वो कायम मुकाम है

पैसा ही जिस्मोजान है पैसा ही काम है
पैसे ही का नजीर ये आदम गुलाम है

पैसा ही रंग रूप है पैसा ही माल है
पैसा न हो तो आदमी चर्खे की माल है

28. बरसात की बहारें

हैं इस हवा में क्या-क्या बरसात की बहारें।
सब्जों की लहलहाहट ,बाग़ात की बहारें।
बूँदों की झमझमाहट, क़तरात की बहारें।
हर बात के तमाशे, हर घात की बहारे।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

बादल लगा टकोरें , नौबत की गत लगावें।
झींगर झंगार अपनी , सुरनाइयाँ बजावें।
कर शोर मोर बगले , झड़ियों का मुँह बुलावें।
पी -पी करें पपीहे , मेंढक मल्हारें गावें।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

क्या – क्या रखे हए है या रब सामान तेरी कुदरत।
बदले है रंग क्या- क्या हर आन तेरी कुदरत।
सब मस्त हो रहे हैं , पहचान तेरी कुदरत।
तीतर पुकारते है , ‘सुबहान तेरी कुदरत’।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

जो मस्त हों उधर के , कर शोर नाचते हैं।
प्यारे का नाम लेकर ,क्या जोर नाचते हैं।
बादल हवा से गिर – गिर, घनघोर नाचते हैं।
मेंढक उछल रहे हैं ,और मोर नाचते हैं।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

कितनों तो कीचड़ों की, दलदल में फँस रहे हैं।
कपड़े तमाम गंदे , दलदल में बस रहे हैं।
इतने उठे हैं मर – मर, कितने उकस रहे हैं।
वह दुख में फँस रहे हैं, और लोग हँस रहे हैं।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

यह रुत वह है जिसमें , खुर्दो कबीर खुश हैं।
अदना गरीब मुफ्लिस, शाहो वजीर खुश हैं।
माशूक शादो खुर्रम , आशिक असीर खुश हैं।
जितने हैं अब जहाँ में, सब ऐ ‘नज़ीर’ खुश हैं।
क्या – क्या मची हैं यारो बरसात की बहारें।

(कबीर=बड़ा, शाद=खुश, खुर्रम=खुश,असीर=कैदी,बंदी)

29. राखी

चली आती है अब तो हर कहीं बाज़ार की राखी ।
सुनहरी, सब्ज़, रेशम, ज़र्द और गुलनार की राखी ।
बनी है गो कि नादिर ख़ूब हर सरदार की राखी ।
सलूनों में अजब रंगीं है उस दिलदार की राखी ।
न पहुँचे एक गुल को यार जिस गुलज़ार की राखी ।।1।।

अयाँ है अब तो राखी भी, चमन भी, गुल भी, शबनम भी ।
झमक जाता है मोती और झलक जाता है रेशम भी ।
तमाशा है अहा ! हा ! हा गनीमत है यह आलम भी ।
उठाना हाथ, प्यारे वाह वा टुक देख लें हम भी ।
तुम्हारी मोतियों की और ज़री के तार की राखी ।।2।।

मची है हर तरफ़ क्या क्या सलूनों की बहार अब तो ।
हर एक गुलरू फिरे है राखी बाँधे हाथ में ख़ुश हो ।
हवस जो दिल में गुज़रे है कहूँ क्या आह में तुमको ।
यही आता है जी में बनके बाम्हन आज तो यारो ।
मैं अपने हाथ से प्यारे के बाँधूँ प्यार की राखी ।।3।।

हुई है ज़ेबो ज़ीनत और ख़ूबाँ को तो राखी से ।
व लेकिन तुमसे अब जान और कुछ राखी के गुल फूले ।
दिवानी बुलबुलें हों देख गुल चुनने लगीं तिनके ।
तुम्हारे हाथ ने मेंहदी ने अंगुश्तों ने नाख़ुन ने ।
गुलिस्ताँ की, चमन की, बाग़ की गुलज़ार की राखी ।।4।।

अदा से हाथ उठने में गुले राखी जो हिलते हैं ।
कलेजे देखने वालों के क्या क्या आह छिलते हैं ।
कहाँ नाज़ुक यह पहुँचे और कहाँ यह रंग मिलते हैं ।
चमन में शाख़ पर कब इस तरह के फूल खिलते हैं ।
जो कुछ ख़ूबी में है उस शोख़ गुल रुख़सार की राखी ।।5।।

फिरें हैं राखियाँ बाँधे जो हर दम हुस्न के मारे ।
तो उनकी राखियों को देख ऐ ! जाँ ! चाव के मारे ।
पहन ज़ुन्नार और क़श्क़ः लगा माथे ऊपर बारे ।
’नज़ीर’ आया है बाम्हन बनके राखी बाँधने प्यारे ।
बँधा लो उससे तुम हँसकर अब इस त्यौहार की राखी ।।6।।

(गुलनार=अनार का फूल, नादिर=अद्भुत्त, अयाँ=प्रकट, शबनम=
ओस, ज़री=सोने चाँदी के तार, गुलरू=फूल जैसे सुंदर और सुकुमार
मुख, ज़ेबो ज़ीनत=शृंगार और सजावट, ख़ूबाँ=सुंदर स्त्रियाँ, अंगुश्तों=
उँगलियाँ, गुलिस्ताँ=बाग़, रुख़सार=कपोल, ज़ुन्नार=जनेऊ, क़श्क़ः=
तिलक)

30. आशिक़ों की भंग

दुनिया के अमीरों में याँ किसका रहा डंका ।
बरबाद हुए लश्कर, फ़ौजों का थका डंका ।
आशिक़ तो यह समझे हैं, अब दिल में बना डंका ।
जो भंग पिएँ उनका बजता है सदा डंका ।
कूंडी के नक़्क़ारे पर, ख़ुतके का लगा डंका ।।
नित भंग पी और आशिक़, दिन रात बजा डंका ।।१।।

उल्फ़त के जमर्रुद की, यह खेत की बूटी है ।
पत्तों की चमक उसके कमख़्वाब की बूटी है ।
मुँह जिसके लगी उससे फिर काहे को छूटी है ।
यह तान टिकोरे की इस बात पे टूटी है ।
कूंडी के नक़्क़ारे पर, ख़ुतके का लगा डंका ।।
नित भंग पी और आशिक़, दिन रात बजा डंका ।।२।।

हर आन खड़ाके से, इस ढब का लगा रगड़ा ।
जो सुन के खड़क इसकी हो बंद सभी दगड़ा ।
चक़्कान चढ़ा गहरा, और बाँध हरा पगड़ा ।
क्या सैर की ठहरेगी टुक छोड़ के यह झगड़ा ।
कूंडी के नक़्क़ारे पर, ख़ुतके का लगा डंका ।।
नित भंग पी और आशिक़, दिन रात बजा डंका ।।३।।

एक प्याले के पीते ही, हो जावेगा मतवाला ।
आँखों में तेरी आकर खिल जाएगा गुल लाला ।
क्या क्या नज़र आवेगी हरियाली व हरियाला ।
आ मान कहा मेरा, ऐ शोख़ नए लाला ।
कूंडी के नक़्क़ारे पर, ख़ुतके का लगा डंका ।।
नित भंग पी और आशिक़, दिन रात बजा डंका ।।४।।

हैं मस्त वही पूरे, जो कूंडी के अन्दर हैं ।
दिल उनके बड़े दरिया, जी उनके समुन्दर हैं ।
बैठे हैं सनम बुत हो, और झूमते मन्दिर हैं ।
कहते हैं यही हँस-हँस, आशिक़ जो कलन्दर हैं ।
कूंडी के नक़्क़ारे पर, ख़ुतके का लगा डंका ।।
नित भंग पी और आशिक़, दिन रात बजा डंका ।।५।।

सब छोड़ नशा प्यारे, पीवे तू अगर सब्जी ।
कर जावे वही तेरी, ख़ातिर में असर सब्जी ।
हर बाग में हर जाँ में, आ जावे नज़र सब्जी ।
तेरी भी ’नज़ीर’ अब तो सब्जी में है सर सब्जी ।
कूंडी के नक़्क़ारे पर, ख़ुतके का लगा डंका ।।
नित भंग पी और आशिक़, दिन रात बजा डंका ।।६।।

(जमर्रुद=पन्ना,हरा रत्न, कमख़्वाब=
एक प्रकार का रेशमी वस्त्र, दगड़ा=
कच्ची सड़क, चक़्कान=गाढ़ी घुटी हुई
भंग)

31. दरसनाए पैग़म्बरे ख़ुदा

सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ।

तेरा दोस्त है वह जो ख़ेरुलवरा ।
मुहम्मद नबी मालिके दोसरा ।
कहाँ वस्फ़ हो मुझ से उसका अदा ।
व लेकिन है मेरी यही इल्तिजा ।
ज़बाँ ताबुवद दर दहाँ जाए गीर ।
सनाऐ मुहम्मद बुवद दिल पज़ीर ।

वह शाहे दो आलम अमीरे उमम ।
बने वास्ते जिसके लौहो-क़लम ।
सदा जिसके चूमें मलायक क़दम ।
करूँ उसका रुतबा मैं क्यूँकर रक़म ।
हबीबे ख़ुदा अशरफ़ुल अंम्बिया ।
कि अर्शे मजीदश बुवद मुत्तक़ा ।

अगर्चे यह पदा हुआ ख़ाक पर ।
गया ख़ाक से फिर वह इफ़लाक पर ।
मेरा जी फ़िदा उस तने पाक पर
तसद्दुक़ हूँ मैं उसके फ़ितराक पर ।
सवारे जहाँ गीर यकराँ बुराक़ ।
कि बगज़श्त अज़ करने नीली-ए-खाक़ ।

(सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम=अल्लाह का दुरुद
और सलाम आप पर हो, वस्फ़=प्रशंसा, लौहो-क़लम=
वह तख़्ती और लेखनी, जिनके द्वारा ईश्वर की आज्ञा से
भविष्य में होने वाली सब घटनाएँ लिखी हों, मलायक=
फ़रिश्ते, रक़म=लिखना, अर्शे मजीदश बुवद मुत्तक़ा=
रसूल जो ख़ुदा के महबूब हैं और नाबियों में जिनका
रुत्बा सबसे ज़्यादा है । जिनका निवासस्थान अर्श पर
बना, इफ़लाक=आकाश, तसद्दुक़=न्यौछावर, फ़ितराक=
वह डोरी जो घोड़े की ज़ीन में दोनों ओर लगाते हैं,
बगज़श्त अज़ करने नीली-ए-खाक़=वह व्यक्ति जो अकेले
बुराक़ घोड़े पर सवार होकर सारे ब्रह्माण्ड की सैर कर आए
जो कि इस नीले गुम्बद वाले महल से भी परे चले गए)

32. इश्क़ अल्लाह

ज़ाहिदो रौज़ए रिज़्वाँ से कहो इश्क़ अल्लाह ।
आशिक़ो कूचए जानाँ से कहो इश्क़ अल्लाह ।

जिसकी आँखों ने किया बज़्मे दो आलम को ख़राब ।
कोई उस फ़ितनए दौराँ से कहो इश्क़ अल्लाह ।।

यारो देखो जो कहीं उस गुले खन्दाँ का ज़माल ।
तो मेरे दीदए गिरयाँ से कहो इश्क़ अल्लाह ।।

हैं जो वह कुश्तए शमशीर निगाहे क़ातिल ।
जाके उस गंजे शहीदाँ से कहो इश्क़ अल्लाह ।।

आह के साथ मेरे सीने से निकले है धुआँ ।
ऐ बुताँ मुझ दिलबर जाँ से कहो इश्क़ अल्लाह ।।

याद में उसके रुख़ों ज़ुल्फ़ की हर आन ’नज़ीर’
रोज़ो शब सुंबुलो रेहाँ से कहो इश्क़ अल्लाह ।।

(ज़ाहिदो=साधु, रौज़ए रिज़्वाँ=स्वर्ग की वाटिका,
बज़्मे दो आलम=दुनिया की महफ़िल, फ़ितनए
दौराँ=ज़माने का उपद्रवी, गुले खन्दाँ=फूल की
मुस्कान, ज़माल=ख़ूबसूरती, दीदए गिरयाँ=
बहुमूल्य आँखें)

33. ईद

शाद था जब दिल वह था और ही ज़माना ईद का ।
अब तो यक्साँ है हमें आना न जाना ईद का ।।

दिल का ख़ून होता है जब आता है अपना हमको याद ।
आधी-आधी रात तक मेंहदी लगाना ईद का ।।

आँसू आते हैं भरे जब ध्यान में गुज़रे है आह ।
पिछले पहर से वह उठ-उठ कर नहाना ईद का ।।

हश्र तक जाती नहीं ख़ातिर से इस हसरत की बू ।
इत्र बग़लों में वह भर-भर कर लगाना ईद का ।।

होंठ जब होते थे लाल, अब आँखें हो जाती हैं सुर्ख़ ।
याद आता है जो हमको पान खाना ईद का ।।

दिल के हो जाते हैं टुकड़े जिस घड़ी आता है याद ।
ईदगाह तक दिलबरों के साथ जाना ईद का ।।

गुलइहज़ारों के मियाँ मिलने की ख़ातिर जब तो हम ।
ठान रखते थे महीनों से बहाना ईद का ।।

अब तो यूँ छुपते हैं जैसे तीर से भागे कोई ।
तब बने फिरते थे हम आप ही निशाना ईद का ।।

नींद आती थी न हरगिज़, भूक लगती थी ज़रा ।
यह ख़ुशी होती थी जब होता था आना ईद का ।।

(हश्र=क़यामत,प्रलय, गुलइमज़ारों=गुलाब जैसे
सुकुमार और कोमल गालों वाली)

34. पहुँची

क्यों न उसकी हो दिलरुबा पहुँची ।
जिसके पहुँचे पै हो किफ़ा पहुँची ।
ग़र पहुँच हो तो हम मलें आँखें ।
ऐसी इसकी है ख़ुशनुमा पहुँची ।
दिल को पहुँचे है रंज क्या-क्या वह ।
अपनी लेता है जब छिपा पहुँची ।
एक छड़ी गुल की भेजकर इसको ।
फ़िक्र थी वह न पहुँची या पहुँची ।
सुबह पूंछी रसीद जब तो ’नज़ीर’ ।
दी हमें शोख ने दिखा पहुँची ।।

35. आरसी

बनवा के एक आरसी हमने कहा कि लो ।
पकड़ी कलाई उसकी जो वह शाख़सार-सी ।
लेकर बड़े दिमाग और देख यक-ब-यक ।
त्योरी चढ़ा के नाज़ में कुछ करके आरसी ।
झुँझला के दूर फेंक दी और यूँ कहा चै ख़ुश ।
हम मारते हैं ऐसी अंगूठे पै आरसी ।

(शाख़सार=शाख़ जैसी कोमल)

36. ज़ुल्फ़ के फन्दे

चहरे पै स्याह नागिन छूटी है जो लहरा कर।
किस पेच से आई है रुख़सार पै बल खाकर॥
जिस काकुलेमुश्कीं में फंसते हैं मलक आकर।
उस जुल्फ़ के फन्दों ने रक्खा मुझे उलझाकर॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥1॥

जिस दिन से हुआ आकर उस जुल्फ का ज़न्दानो।
इक हो गई यह मेरी ख़ातिर की परेशानी॥
भर उम्र न जावेगी अब जी से पशेमानी।
अफ़सोस, कहूं किससे मैं अपनी यह नादानी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥2॥

जिस वक्त लिखी होवे क़िस्मत में गिरफ़्तारी।
कुछ काम नहीं आती फिर अक़्ल की हुशियारी॥
यह कै़द मेरे ऊपर ऐसी ही पड़ी भारी।
रोना मुझे आता है इस बात पै हर बारी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥3॥

उस जुल्फ़ के हबों ने लाखों के तईं मारा।
अल्लाह की ख़्वाहिश से बन्दे का नहीं चारा॥
कुछ बन नहीं आता है, ताक़त है न कुछ यारा।
अब काहे को होता है इस कै़द से छुटकारा॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥4॥

उस जुल्फ़ तलक मुझको काहे को रसाई थी।
क़िस्मत ने मेरी ख़ातिर जंजीर बनाई थी॥
तक़दीर मेरे आगे जिस दम उसे लाई थी।
शायद कि अजल मेरी बनकर वही आई थी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥5॥

गर चाहे ज़नख़दाँ में मैं डूब के दुख पाता।
यूसुफ की तरह इक दिन आखि़र में निकल आता॥
उस जुल्फ़ की ज़न्दां से कुछ पेश नहीं जाता।
आखि़र यही कह कह कर फिरता हूं मैं घबड़ाता॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥6॥

इसको तो मेरे दिल के डसने की शिताबी है।
और जिसकी वह नागिन है वह मस्त शराबी है॥
इस ग़म से लहू रोकर पुर चश्मे गुलाबी है।
क्या तुर्फ़ा मुसीबत है, क्या सख़्त ख़राबी है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥7॥

हर बन्द मेरे तन का इस कै़द में गलता है।
सर पावों से जकड़ा हूं कुछ बस नहीं चलता है॥
जी सीने में तड़पे है, अश्क आंख से ढलता है।
हर वक़्त यही मिस्रा अब मुंह से निकलता है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥8॥

इस कै़द की सख्ती में संभला हूं, न संभलूंगा।
इस काली बला से मैं जुज़ रंज के क्या लूंगा॥
इस मूज़ी के चंगुल से छूटा हूं न छूटूंगा।
आखि़र को यही कह कह इक रोज़ में जी दूंगा॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥9॥

यह कै़दे फ़रंग ऐसी दुनिया में बुरी शै है।
छूटा न असीर इसका इस कै़द की वह रै है॥
अब चश्म का साग़र है और खूने जिगर मै है।
कुछ बन नहीं आता है, कैसी फिक्र करूं ऐ है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥10॥

कहने को मेरे यारो मत दिल से भूला दीजो।
जं़जीर कोई लाकर पांवों में पिन्हा दीजो॥
मर जाऊं तो फिर मेरा आसार बना दीजो।
मरक़द पै यही मिस्रा तुम मेरे खुदा दीजो॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥11॥

उस जुल्फ़ के फंदे में यों कौन अटकता है।
ज्यों चोर किसी जागह रस्से में लटकता है॥
कांटे की तरह दिल में ग़म आके खटकता है।
यह कहके “नज़ीर” अपना सर ग़म से पटकता है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥12॥

(काकुलेमुश्कीं=कस्तूरी केश, मलक=फरिश्ते,देवता,
ज़न्दानो=कै़दी, पशेमानी=लज्जा,पछतावा, हबों=साँग,
हथियार, ज़नख़दाँ=ठोड़ी का गड्ढा, आसार=निशान,
मरक़द=कब्र)

37. जब खेली होली नंद ललन

जब खेली होली नंद ललन हँस हँस नंदगाँव बसैयन में।
नर नारी को आनन्द हुए ख़ुशवक्ती छोरी छैयन में।।
कुछ भीड़ हुई उन गलियों में कुछ लोग ठठ्ठ अटैयन में ।
खुशहाली झमकी चार तरफ कुछ घर-घर कुछ चौप्ययन में।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।

जब ठहरी लपधप होरी की और चलने लगी पिचकारी भी।
कुछ सुर्खी रंग गुलालों की, कुछ केसर की जरकारी भी।।
होरी खेलें हँस हँस मनमोहन और उनसे राधा प्यारी भी।
यह भीगी सर से पाँव तलक और भीगे किशन मुरारी भी।।
डफ बाजे, राग और रंग हुए, होली खेलन की झमकन में।
गुलशोर गुलाल और रंग पड़े हुई धूम कदम की छैयन में।।

38. क्या कहें आलम में हम इन्सान या हैवान थे

क्या कहें आलम में हम इन्सान या हैवान थे
खाक थे क्या थे ग़रज़ इक आन के मेहमान थे

कर रहे थे अपन क़ब्ज़ा घेरों की इम्लाक पर
छीन ली उसने तो जाना की हम नादान थे

एक दिन एक उस्ख्वान पर जा पड़ा मेरा जो पाँव
क्या कहें उस वक़्त मेरे दिल में क्या-क्या ध्यान थे

पाँव पड़ते ही ग़रज़ उस उस्त्ख्वआं ने आह की
और कहा ज़ालिम कभी हम भी तो साहिब जान थे

दस्तो प् जानू शिरो-गर्दन शिकम पश्तो कमर
देखने को आँख ओ सुनने की खातिर कान थे

अब्रुओ बीनी जबीं नक्शों निगारे खालो रत
लाल मुरवार्रीद से बेहतर लबो दंदांन थे

रात को सोने को क्या क्या नर्मो नाज़ुक थे पलंग
दिन की खातिर बैठने को ताक और एवान थे

एक ही चक्कर अजल ने आन कर ऐसा दिया
न तो हम थे न वो सारे ऐश के सामान थे

ऐसी बेरहमी से मत रख कर पाँव हम पे ऐ “नजीर”
ओ मियां हम की कभी तेरी तरह इंसान थे

39. ईश्वर-वन्दना

इलाही तू फ़य्याज़ और करीम
इलाही तू ग़फ़्फ़ार है और रहीम
मुकद्दस, मुअल्ला, मुनज़्ज़ा, अज़ीम
न तेरा शरीक और न तेरा सहीम
तेरी ज़ाते-बाला है सबसे क़दीम

तेरे हुस्ने-कुदरत ने या किर्दगार !
किये हैं जहां में वो नक़्शो-निगार
पहुंचती नहीं अक़्ल उन्हें ज़र्रा-वार
तहय्युर में हैं देखकर बार-बार
हैं जितने जहां में ज़हीनो-फ़हीम

ज़मी पर समावात गर्दां किये
नजूम उनमें क्या-क्या दरख़्शां किये
नबातात बेहद नुमायां किये
अयां बहर से दुर्रो-मरजां किये
हजर से जवाहर भी और ज़र्रो-सीम

शिगुफ़्ता किये गुल-ब-फ़स्ले-बहार
अनादिल भी और कुमरी-ओ-कब्कसार
बरो-बरगो-नख़्लो-शजर शाख़सार
तरावत से ख़ुशबू से हंगाम-कार
रवां की सबा हर तरफ़ और नसीम

बयां कब हो ख़िलकत की अनवाअ का
जो कुछ हस्र होते तो जावे कहा
खुसूसन बनी-आदमे-ख़ुश-लक़ा
शरफ़ उन सभी में इन्हीं को दिया
ये इस्लाम-ओ-ईमानो-दीने-क़दीम

अता की इन्हें दौलते-माअरिफ़त
इबादत इताअत निको-मंज़िलत
हया, हुस्नो-उल्फ़त, अदब, मस्लहत
तमीज़ो-सुख़न खुल्क ख़ुश-मक़मत
फ़रावां दिये और नाज़ो-नईम

तेरा शुक्रे-अहसां हो किससे अदा
हमें मेह्र से तूने पैदा किया
किये और अल्ताफ़ बे-इंतहा
”नज़ीर” इस सिवा क्या कहे सर झुका
ये सब तेरे इकराम हैं, या करीम ।

(फ़य्याज़=दानी, करीम=कृपालु, ग़फ़्फ़ार=
क्षमाशील, रहीम=दयालु, मुकद्दस=
पवित्र, मुअल्ला=उच्च, मुनज़्ज़ा=पवित्र,
अज़ीम=उच्च, सहीम=हिस्सेदार, किर्दगार=
विधाता, ज़र्रा-वार=थोड़ी भी, तहय्युर=
हैरानी, ज़हीनो-फ़हीम=बुद्धिमान, समावात=
आकाश, गर्दां=घूमने वाले, नजूम=सितारे,
दरख़्शां=चमकने वाले, नबातात=वनस्पती,
अयां=प्रकट, बहर=समुद्र, दुर्रो-मरजां=
मोती-मूंगे, हजर=पत्थर, ज़र्रो-सीम=सोना-चांदी,
शिगुफ़्ता=प्रफुल्लित, अनादिल=बुलबुलें, कब्कसार=
तीतर, बरो-बर्गो-नख़्लो-शजर=फल,पत्ते,वृक्ष,पौधे,
हंगाम-कार=भरी, सबा=सुबह की हवा, नसीम=
ठंढी हवा, ख़िलक़त=सृष्टि, अनवाअ=किस्मों,
हस्र=सीमा, बनी-आदमे-ख़ुश-लक़ा=सुन्दर मानव
जाति, शरफ़=आदर, माअरिफ़त=ईश्वरीय-ज्ञान,
इबादत=पूजा, इताअत=आज्ञाकारिता,
निको-मंज़िलत=नेकी, खुल्क़=शिष्टाचार, ख़ुश-
मक़मत=दया की भावना, फ़रावां=बहुत ज़्यादा,
नाज़ो-नईम=ऐशो-इशरत, अल्ताफ़=मेहरबानियां)

40. शेख़ सलीम चिश्ती

हैं दो जहां के सुल्तां हज़रत सलीम चिश्ती
आलम के दीनो-ईमां हज़रत सलीम चिश्ती
सरदफ़्तरे-मुसलमां हज़रत सलीम चिश्ती
मकबूले-ख़ासे-यज़्दां हज़रत सलीम चिश्ती
सरदारे-मुल्के-इरफ़ां हज़रत सलीम चिश्ती॥1॥

बुर्जे़ असद की रौनक अर्शे बरी के तारे।
गुलज़ारे दीं के गुलबन अल्लाह के संवारे।
यह बात जानो दिल से कहते हैं सब पुकारे।
तुम वह वली हो बरहक़ जो फैज़ से तुम्हारे।
आलम है बाग़ो बुस्तां हज़रत सलीम चिश्ती॥2॥

शाहों के बादशा हो बा-ताज बा-लिवा हो
और किब्लए-सफ़ा हो और काबए-ज़िया हो
ख़िलक़त के रहनुमा हो, दुनिया के मुक़्तदा हो
तुम साहबे-सख़ा हो महबूबे-किब्रिया हो
है तुम से ज़ेबे-इमकां हज़रत सलीम चिश्ती॥3॥

शाहो-गदा हैं ताबेअ सब तेरी मुमलिकत के
लायक तुम्हीं हो शाहा इस कद्रो-मंज़िलत के
परवर्दा हैं तुम्हारे सब ख़्वाने-मक़मत के
शाहा शरफ तू बख़्शे ख़ालिक की सल्तनत के
और तुम हो मीरे-सामां हज़रत सलीम चिश्ती॥4॥

है नामे-पाक तेरा मशहूर शहरो-बन में
करती हैं याद तुमको ये जानें हैं जो तन में
है ख़ुल्क़ की तुम्हारे खुशबू गुलो-समन में
खिदमत में है तुम्हारी फ़िरदौस के चमन में
जन्नत के हूरो-ग़िल्मां, हज़रत सलीम चिश्ती॥5॥

काबा समझ के अपना मुश्ताक़ तेरे दर को।
करते हैं आ ज़ियारत दिल से झुकाके सर को।
औसाफ़ तेरे हर दम पाते हैं सीमो-ज़र को।
पढ़ते हैं मदह तेरी गुलशन में हर सहर को।
हो बुलबुले खु़शइलहाँ हज़रत सलीम चिश्ती॥6॥

है सल्तनत जहां की सब तेरे ज़ेरे-फ़रमां
चाकर हैं तेरे दर के फ़ग़फूर और खाक़ां
ख़्वाने-करम पे तेरे है ख़ल्क सारी मेहमां
हैं हुक्म में तुम्हारे जिन्नो-परी-ओ-इंसां
हो वक़्त के सुलेमां हज़रत सलीम चिश्ती॥7॥

तुम सबसे हो मुअज़्ज़म और सबसे हो मुकर्रम
ख़िलक़त हुई तुम्हारी सब नूर से मुजस्सम
और ख़ूबियां जहां की तुम पर हुई मुसल्लम
अब्रे-करम से तेरे दायम है सब्ज़ो-खुर्रम
आलम का सब गुलिस्तां हज़रत सलीम चिश्ती॥8॥

पुश्तो-पनाह हो तुम हर इक गदा-व-शह के
मुहताज है तुम्हारी इक लुत्फ़ की निगह के
मंजिल पे आके पहुंचे सालिक तुम्हारी रह के
ख़ाके-कदम तुम्हारी और चश्म मेहो-मह के
हो रोशनी के सामां हजरत सलीम चिश्ती॥9॥

चश्मो चिराग़ हो तुम अब जुम्ला मोमिनी के।
रौशन हैं तुमसे पर्दे सब आस्मां ज़मीं के।
बेशक ज़ियाये दिल हो हर साहिबे यक़ीं के।
ज़र्रा नहीं तफ़ावुत तुम आस्मां हो दीं के।
हो आफ़ताबे रख़्शां हज़रत सलीम चिश्ती॥10॥

आलम है सब मुअत्तर तेरे क़रम की बू से
हुरमत है दोस्तों को हज़रत तुम्हारे रू से
यह चाहता हूं अब मैं सौ दिल की आरज़ू से
रखियो ”नज़ीर” को तुम दो जग में आबरू से
ऐ मूजिदे-हर-अहसां हज़रत सलीम चिश्ती॥11॥

(सरदफ़्तरे-मुसलमां=मुसलमानों के नायक,
मकबूले-ख़ासे-यज़्दां=ईश्वर के परम प्यारे,
बुर्जे़ असद=सिंह राशि, अर्शे बरी=ऊंचे
आसमान, गुलबन=गुलाब का पौधा,
बरहक़=सच, फैज़=उपकार, बुस्तां=बाग़,
इरफ़ां=ज्ञान के, बा-लिवा=झंडे वाले,
किब्लए-सफ़ा=पवित्रता के पूज्य, काबए-
ज़िया=प्रकाश के पूज्य, मुक़्तदा=राह
दिखाने वाले, सख़ा=दानी, महबूबे-किब्रिया=
रब के प्यारे, ज़ेबे-इमकां=दुनिया की रौनक,
कद्रो-मंज़िलत=आदर, परवर्दा=पाले हुए,
ख़्वाने-मक़मत=कृपा का दान, शरफ़=इज़्ज़त,
मीरे-सामां=संसार के नायक,ख़ुल्क=सदाचार,
गुलो-समन=गुलाब-चमेली, फ़िरदौस=स्वर्ग,
मुश्ताक़=अभिलाषी, ज़ियारत=मिलना,दर्शन
करना, औसाफ़=खूबियाँ, सीमो-ज़र=चांदी-
सोना, मदह=स्तुति, सहर=सुबह, खु़शइलहाँ=
अच्छे स्वर वाली, फ़ग़फूर=पुराने चीन के
बादशाह, खाकां=पुराने,तुर्क बादशाह, ख़ल्क़=
संसार, मुअज़्ज़म=महान, मुकर्रम=सम्मानित,
मुसल्लम=पूरा, अब्रे-करम=कृपा के बादल,
दायम=सदा, सब्ज़ो-खुर्रम=प्रसन्न और हरा,
पुश्तो-पनाह=सहारा, सालिक=चलने वाले,
चश्म=आँख, मेहो-मह=सूर्य-चाँद, जुम्ला=
समग्र, मोमिनी=ईमान वाले, ज़ियाये=
रोशनी, ज़र्रा=कण, तफ़ावुत=फ़र्क, आफ़ताबे
रख़्शां=चमकता हुआ सूरज, मुअत्तर=
सुगंधित, क़रम=कृपा, मूजिदे-हर-अहसां=हर
कृपा करने वाले)

41. दीवाली

हमें अदाएँ दीवाली की ज़ोर भाती हैं ।
कि लाखों झमकें हरएक घर में जगमगाती हैं ।
चिराग जलते हैं और लौएँ झिलमिलाती हैं ।
मकां-मकां में बहारें ही झमझमाती हैं ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।1।

गुलाबी बर्फ़ियों के मुंह चमकते-फिरते हैं ।
जलेबियों के भी पहिए ढुलकते-फिरते हैं ।
हर एक दाँत से पेड़े अटकते-फिरते हैं ।
इमरती उछले हैं लड्डू ढुलकते-फिरते हैं ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।2।

मिठाईयों के भरे थाल सब इकट्ठे हैं ।
तो उन पै क्या ही ख़रीदारों के झपट्टे हैं ।
नबात, सेव, शकरकन्द, मिश्री गट्टे हैं ।
तिलंगी नंगी है गट्टों के चट्टे-बट्टे हैं ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।3।

जो बालूशाही भी तकिया लगाए बैठे हैं ।
तो लौंज खजले यही मसनद लगाए बैठे हैं ।
इलायची दाने भी मोती लगाए बैठे हैं ।
तिल अपनी रेबड़ी में ही समाए बैठे हैं ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।4।

उठाते थाल में गर्दन हैं बैठे मोहन भोग ।
यह लेने वाले को देते हैं दम में सौ-सौ भोग ।
मगध का मूंग के लड्डू से बन रहा संजोग ।
दुकां-दुकां पे तमाशे यह देखते हैं लोग ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।5।

दुकां सब में जो कमतर है और लंडूरी है ।
तो आज उसमें भी पकती कचौरी-पूरी है ।
कोई जली कोई साबित कोई अधूरी है ।
कचौरी कच्ची है पूरी की बात पूरी है ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।6।

कोई खिलौनों की सूरत को देख हँसता है ।
कोई बताशों और चिड़ों के ढेर कसता है ।
बेचने वाले पुकारे हैं लो जी सस्ता है ।
तमाम खीलों बताशों का मीना बरसता है ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।7।

और चिरागों की दुहरी बँध रही कतारें हैं ।
और हर सू कुमकुमे कन्दीले रंग मारे हैं ।
हुजूम, भीड़ झमक, शोरोगुल पुकारे हैं ।
अजब मज़ा है, अजब सैर है अजब बहारें हैं ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।8।

अटारी, छज्जे दरो बाम पर बहाली है ।
दिबाल एक नहीं लीपने से खाली है ।
जिधर को देखो उधर रोशनी उजाली है ।
गरज़ मैं क्या कहूँ ईंट-ईंट पर दीवाली है ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।9।

जो गुलाब-रू हैं सो हैं उनके हाथ में छड़ियाँ ।
निगाहें आशि‍कों की हार हो गले पड़ियाँ ।
झमक-झमक की दिखावट से अँखड़ियाँ लड़ियाँ ।
इधर चिराग उधर छूटती हैं फुलझड़ियाँ ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।10।

क़लम कुम्हार की क्या-क्या हुनर जताती है ।
कि हर तरह के खिलौने नए दिखाती है ।
चूहा अटेरे है चर्खा चूही चलाती है ।
गिलहरी तो नव रुई पोइयाँ बनाती हैं ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।11।

कबूतरों को देखो तो गुट गुटाते हैं ।
टटीरी बोले है और हँस मोती खाते हैं ।
हिरन उछले हैं, चीते लपक दिखाते हैं ।
भड़कते हाथी हैं और घोड़े हिनहिनाते हैं ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।12।

किसी के कान्धे ऊपर गुजरियों का जोड़ा है ।
किसी के हाथ में हाथी बग़ल में घोड़ा है ।
किसी ने शेर की गर्दन को धर मरोड़ा है ।
अजब दीवाली ने यारो यह लटका जोड़ा है ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।13।

धरे हैं तोते अजब रंग के दुकान-दुकान ।
गोया दरख़्त से ही उड़कर हैं बैठे आन ।
मुसलमां कहते हैं ‘‘हक़ अल्लाह’’ बोलो मिट्ठू जान ।
हनूद कहते हैं पढ़ें जी श्री भगवान ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।14।

कहीं तो कौड़ियों पैसों की खनख़नाहट है ।
कहीं हनुमान पवन वीर की मनावट है ।
कहीं कढ़ाइयों में घी की छनछनाहट है ।
अजब मज़े की चखावट है और खिलावट है ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।15।

‘नज़ीर’ इतनी जो अब सैर है अहा हा हा ।
फ़क़्त दीवाली की सब सैर है अहा हा ! हा ।
निषात ऐशो तरब सैर है अहा हा हा ।
जिधर को देखो अज़ब सैर है अहा हा हा ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।16।

42. झोंपड़ा

ये तन जो है हर इक के उतारे का झोंपड़ा
इस से है अब भी सब के सहारे का झोंपड़ा
इस से है बादशह के नज़ारे का झोंपड़ा
इस में ही है फ़क़ीर बिचारे का झोंपड़ा
अपना न मोल है न इजारे का झोंपड़ा
बाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा

इस में ही भोले-भाले इसी में सियाने हैं
इस में ही होशियार इसी में दिवाने हैं
इस में ही दुश्मन इस में ही अपने बेगाने हैं
शा-झोंपड़ा भी अपने इसी में नमाने हैं
अपना न मोल का न इजारे का झोंपड़ा
बाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा

इस में ही लोग इश्क़-ओ-मोहब्बत के मारे हैं
इस में ही शोख़ हुस्न के चाँद और सितारे हैं
इस में ही यार-दोस्त इसी में पियारे हैं
शा-झोंपड़ा भी अपने इसी में बिचारे हैं
अपना न मोल का न इजारे का झोंपड़ा
बाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा

इस में ही अहल-ए-दौलत-ओ-मुनइम अमीर हैं
इस में ही रहते सारे जहाँ के फ़क़ीर हैं
इस में ही शाह और इसी में वज़ीर हैं
इस में ही हैं सग़ीर इसी में कबीर हैं
अपना न मोल का न इजारे का झोंपड़ा
बाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा

इस में ही चोर-ठग हैं इसी में अमोल हैं
इस में ही रोनी शक्ल इसी में ढिढोल हैं
इस में ही बाजे और नक़ारे-ओ-ढोल हैं
शा-झोंपड़ा भी इस में ही करते कलोल हैं
अपना न मोल का न इजारे का झोंपड़ा
बाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा

इस में ही पारसा हैं इसी में लवंद हैं
बेदर्द भी इसी में है और दर्दमंद हैं
इस में ही सब परंद इसी में चरंद हैं
शा-झोंपड़ा भी अब इसी डर बे बंद हैं
अपना न मोल का न इजारे का झोंपड़ा
बाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा

इस झोंपड़े में रहते हैं सब शाह और वज़ीर
इस में वकील बख़्शी ओ मुतसद्दी और अमीर
इस में ही सब ग़रीब हैं इस में ही सब फ़क़ीर
शा-झोंपड़ा जो कहते हैं सच है मियाँ ‘नज़ीर’
अपना न मोल का न इजारे का झोंपड़ा
बाबा ये तन है दम के गुज़ारे का झोंपड़ा

43. पैसा

नक़्श याँ जिस के मियाँ हाथ लगा पैसे का
उस ने तय्यार हर इक ठाठ किया पैसे का
घर भी पाकीज़ा इमारत से बना पैसे का
खाना आराम से खाने को मिला पैसे का
कपड़ा तन का भी मिला ज़ेब-फ़ज़ा पैसे का॥1॥

जब हुआ पैसे का ऐ दोस्तो आ कर संजोग
इशरतें पास हुईं दूर हुए मन के रोग
खाए जब माल-पूए दूध दही मोहन-भोग
दिल को आनंद हुए भाग गए रोग और धोग
ऐसी ख़ूबी है जहाँ आना हुआ पैसे का॥2॥

साथ इक दोस्त के इक दिन जो मैं गुलशन में गया
वाँ के सर्व-ओ-सुमन-ओ-लाला-ओ-गुल को देखा
पूछा उस से कि ये है बाग़ बताओ किस का
उस ने तब गुल की तरह हँस दिया और मुझ से कहा
मेहरबाँ मुझ से ये तुम पूछा हो क्या पैसे का॥3॥

ये तो क्या और जो हैं इस से बड़े बाग़-ओ-चमन
हैं खिले कियारियों में नर्गिस-ओ-नसरीन-ओ-समन
हौज़ फ़व्वारे हैं बंगलों में भी पर्दे चलवन
जा-ब-जा क़ुमरी-ओ-बुलबुल की सदा शोर-अफ़्गन
वाँ भी देखा तो फ़क़त गुल है खिला पैसे का॥4॥

वाँ कोई आया लिए एक मुरस्सा पिंजङ़ा
लाल दस्तार-ओ-दुपट्टा भी हरा जूँ-तोता
इस में इक बैठी वो मैना कि हो बुलबुल भी फ़िदा
मैं ने पूछा ये तुम्हारा है रहा वो चुपका
निकली मिन्क़ार से मैना के सदा पैसे का॥5॥

वाँ से निकला तो मकाँ इक नज़र आया ऐसा
दर-ओ-दीवार से चमके था पड़ा आब-ए-तला
सीम चूने की जगह उस की था ईंटों में लगा
वाह-वा कर के कहा मैं ने ये होगा किस का
अक़्ल ने जब मुझे चुपके से कहा पैसे का॥6॥

रूठा आशिक़ से जो माशूक़ कोई हट का भरा
और वो मिन्नत से किसी तौर नहीं है मनता
ख़ूबियाँ पैसे की ऐ यारो कहूँ मैं क्या क्या
दिल अगर संग से भी उस का ज़ियादा था कड़ा
मोम-सा हो गया जब नाम सुना पैसे का॥7॥

जिस घड़ी होती है ऐ दोस्तो पैसे की नुमूद
हर तरह होती है ख़ुश-वक़्ती-ओ-ख़ूबी बहबूद
ख़ुश-दिली ताज़गी और ख़ुर्मी करती है दुरूद
जो ख़ुशी चाहिए होती है वहीं आ मौजूद
देखा यारो तो ये है ऐश-ओ-मज़ा पैसे का॥8॥

पैसे वाले ने अगर बैठ के लोगों में कहा
जैसा चाहूँ तो मकाँ वैसा ही डालूँ बनवा
हर्फ़-ए-तकरार किसी की जो ज़बाँ पर आया
उस ने बनवा के दिया जल्दी से वैसा ही दिखा
उस का ये काम है ऐ दोस्तो या पैसे का॥9॥

नाच और राग की भी ख़ूब-सी तय्यारी है
हुस्न है नाज़ है ख़ूबी है तरह-दारी है
रब्त है प्यार है और दोस्ती है यारी है
ग़ौर से देखा तो सब ऐश की बिस्यारी है
रूप जिस वक़्त हुआ जल्वा-नुमा पैसे का॥11॥

दाम में दाम के यारो जो मिरा दिल है असीर
इस लिए होती है ये मेरी ज़बाँ से तक़रीर
जी में ख़ुश रहता है और दिल भी बहुत ऐश-पज़ीर
जिस क़दर हो सका मैं ने किया तहरीर ‘नज़ीर’
वस्फ़ आगे मैं लिखूँ ता-ब-कुजा पैसे का॥12॥

(नक़्श=ताबीज़, जे़ब फ़िज़ा=सुन्दरता बढ़ाने वाला,
इश्रतें=खुशियां, कु़मरीयो=सफेद पक्षी, सदा=आवाज़,
मुरस्सा=जड़ाऊ, आबे-तिला=सोने का पानी, सीम=
चांदी, संग=पत्थर, नुमूद=आमद,बढ़ोतरी, खुर्रमी=
प्रसन्नता, वरूद=आगमन, तकरार=वाद-विवाद,
रब्त=लगाव-सम्बन्ध, दाम=फंदा,बंधन, असीर=
कैदी,बंदी, बस्फ़=प्रशंसा,तारीफ़, कुंजा=कहां तक,
कब तक)

44. फ़ना

दुनिया में कोई शाद कोई दर्द-नाक है
या ख़ुश है या अलम के सबब सीना-चाक है
हर एक दम से जान का हर-दम तपाक है
नापाक तन पलीद नजिस या कि पाक है
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

है आदमी की ज़ात का उस जा बड़ा ज़ुहूर
ले अर्श ता-ब-फ़र्श चमकता है जिस का नूर
गुज़रे है उन की क़ब्र पे जब वहश और तुयूर
रो रो यही कहे है हर इक क़ब्र के हुज़ूर
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

दुनिया से जब कि अंबिया और औलिया उठे
अज्साम-ए-पाक उन के इसी ख़ाक में रहे
रूहें हैं ख़ूब जान में रूहों के हैं मज़े
पर जिस्म से तो अब यही साबित हुआ मुझे
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

वो शख़्स थे जो सात विलायत के बादशाह
हशमत में जिन की अर्श से ऊँची थी बारगाह
मरते ही उन के तन हुए गलियों की ख़ाक-ए-राह
अब उन के हाल की भी यही बात है गवाह
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

किस किस तरह के हो गए महबूब-ए-कज-कुलाह
तन जिन के मिस्ल-ए-फूल थे और मुँह भी रश्क-ए-माह
जाती है उन की क़ब्र पे जिस-दम मिरी निगाह
रोता हूँ जब तो मैं यही कह कह के दिल में आह
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

वो गोरे गोरे तन कि जिन्हों की थी दिल में जाए
होते थे मैले उन के कोई हाथ गर लगाए
सो वैसे तन को ख़ाक बना कर हवा उड़ाए
रोना मुझे तो आता है अब क्या कहूँ मैं हाए
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

उम्दों के तन को ताँबे के संदूक़ में धरा
मुफ़्लिस का तन पड़ा रहा माटी-उपर पड़ा
क़ाएम यहाँ ये और न साबित वो वाँ रहा
दोनों को ख़ाक खा गई यारो कहूँ में क्या
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

गर एक को हज़ार रूपे का मिला कफ़न
और एक यूँ पड़ा रहा है बे-कस बरहना-तन
कीड़े मकोड़े खा गए दोनों के तन-बदन
देखा जो हम ने आह तो सच है यही सुख़न
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

जितने जहाँ में नाज हैं कंगनी से ता-गेहूँ
और जितने मेवा-जात हैं तर ख़ुश्क गूना-गूं
कपड़े जहाँ तलक हैं सपीदा ओ सियह नुमूं
किम-ख़्वाब ताश बादिला किस किस का नाम लूँ
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

जितने दरख़्त देखो हो बूटे से ता-ब-झाड़
बड़ पीपल आँब नीब छुआरा खजूर ताड़
सब ख़ाक होंगे जब कि फ़ना डालेगी उखाड़
क्या बूटें डेढ़ पात के क्या झाड़ क्या पहाड़
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

जितना ये ख़ाक का है तिलिस्मात बन रहा
फिर ख़ाक उस को होता है यारो जुदा जुदा
तरकारी साग पात ज़हर अमृत और दवा
ज़र सीम कौड़ी लाल ज़मुर्रद और इन सवा
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

गढ़ कोट तोप रहकला तेग़ ओ कमान-ओ-तीर
बाग़-ओ-चमन महल्ल-ओ-मकानात दिल-पज़ीर
होना है सब को आह इसी ख़ाक में ख़मीर
मेरी ज़बाँ पे अब तो यही बात है ‘नज़ीर’
जो ख़ाक से बना है वो आख़िर को ख़ाक है

45. मुफ़्लिसी

जब आदमी के हाल पे आती है मुफ़्लिसी
किस किस तरह से इस को सताती है मुफ़्लिसी
प्यासा तमाम रोज़ बिड़ाती है मुफ़्लिसी
भूका तमाम रात सुलाती है मुफ़्लिसी
ये दुख वो जाने जिस पे कि आती है मुफ़्लिसी

कहिए तो अब हकीम की सब से बड़ी है शाँ
ताज़ीम जिस की करते हैं तो अब और ख़ाँ
मुफ़्लिस हुए तो हज़रत-ए-लुक़्माँ किया है याँ
ईसा भी हो तो कोई नहीं पूछता मियाँ
हिकमत हकीम की भी ढुबाती है मुफ़्लिसी

जो अहल-ए-फ़ज़्ल आलिम ओ फ़ाज़िल कहाते हैं
मुफ़्लिस हुए तो कलमा तलक भूल जाते हैं
वो जो ग़रीब-ग़ुरबा के लड़के पढ़ाते हैं
उन की तो उम्र भर नहीं जाती है मुफ़्लिसी

मुफ़्लिस करे जो आन के महफ़िल के बीच हाल
सब जानें रोटियों का ये डाला है इस ने जाल
गिर गिर पड़े तो कोई न लिए उसे सँभाल
मुफ़्लिस में होवें लाख अगर इल्म और कमाल
सब ख़ाक बीच आ के मिलाती है मुफ़्लिसी

जब रोटियों के बटने का आकर पड़े शुमार
मुफ़्लिस को देवें एक तवंगर को चार चार
गर और माँगे वो तो उसे झिड़कें बार बार
मुफ़्लिस का हाल आह बयाँ क्या करूँ मैं यार
मुफ़्लिस को इस जगह भी चबाती है मुफ़्लिसी

मुफ़्लिस की कुछ नज़र नहीं रहती है आन पर
देता है अपनी जान वो एक एक नान पर
हर आन टूट पड़ता है रोटी के ख़्वान पर
जिस तरह कुत्ते लड़ते हैं इक उस्तुख़्वान पर
वैसा ही मुफ़्लिसों को लड़ाती है मुफ़्लिसी

करता नहीं हया से जो कोई वो काम आह
मुफ़्लिस करे है उस के तईं इंसिराम आह
समझे न कुछ हलाल न जाने हराम आह
कहते हैं जिस को शर्म-ओ-हया नंग-ओ-नाम आह
वो सब हया-ओ-शर्म उड़ाती है मुफ़्लिसी

ये मुफ़्लिसी वो शय है कि जिस घर में भर गई
फिर जितने घर थे सब में उसी घर के दर गई
ज़न बच्चे रोते हैं गोया नानी गुज़र गई
हम-साया पूछते हैं कि क्या दादी मर गई
बिन मुर्दे घर में शोर मचाती है मुफ़्लिसी

लाज़िम है गर ग़मी में कोई शोर-ग़ुल मचाए
मुफ़्लिस बग़ैर ग़म के ही करता है हाए हाए
मर जावे गर कोई तो कहाँ से उसे उठाए
इस मुफ़्लिसी की ख़्वारियाँ क्या क्या कहूँ मैं हाए
मुर्दे को बे कफ़न के गड़ाती है मुफ़्लिसी

क्या क्या मुफ़्लिसी की कहूँ ख़्वारी फकड़ियाँ
झाड़ू बग़ैर घर में बिखरती हैं झकड़ियाँ
कोने में जाले लपटे हैं छप्पर में मकड़ियाँ
पैसा न होवे जिन के जलाने को लकड़ियाँ
दरिया में उन के मुर्दे बहाती है मुफ़्लिसी

बी-बी की नथ न लड़कों के हाथों कड़े रहे
कपड़े मियाँ के बनिए के घर में पड़े रहे
जब कड़ियाँ बिक गईं तो खंडर में पड़े रहे
ज़ंजीर ने किवाड़ न पत्थर गड़े रहे
आख़िर को ईंट ईंट खुदाती है मुफ़्लिसी

नक़्क़ाश पर भी ज़ोर जब आ मुफ़्लिसी करे
सब रंग दम में कर दे मुसव्विर के किर्किरे
सूरत भी उस की देख के मुँह खिंच रहे परे
तस्वीर और नक़्श में क्या रंग वो भरे
उस के तो मुँह का रंग उड़ाती है मुफ़्लिसी

जब ख़ूब-रू पे आन के पड़ता है दिन सियाह
फिरता है बोसे देता है हर इक को ख़्वाह-मख़ाह
हरगिज़ किसी के दिल को नहीं होती उस की चाह
गर हुस्न हो हज़ार रूपे का तो उस को आह
क्या कौड़ियों के मोल बिकाती है मुफ़्लिसी

उस ख़ूब-रू को कौन दे अब दाम और दिरम
जो कौड़ी कौड़ी बोसे को राज़ी हो दम-ब-दम
टोपी पुरानी दो तो वो जाने कुलाह-ए-जिस्म
क्यूँकर न जी को उस चमन-ए-हुस्न के हो ग़म
जिस की बहार मुफ़्त लुटाती है मुफ़्लिसी

आशिक़ के हाल पर भी जब आ मुफ़्लिसी पड़े
माशूक़ अपने पास न दे उस को बैठने
आवे जो रात को तो निकाले वहीं उसे
इस डर से यानी रात ओ धन्ना कहीं न दे
तोहमत ये आशिक़ों को लगाती है मुफ़्लिसी

कैसे ही धूम-धाम की रंडी हो ख़ुश-जमाल
जब मुफ़्लिसी हो कान पड़े सर पे उस के जाल
देते हैं उस के नाच को ढट्ढे के बीच डाल
नाचे है वो तो फ़र्श के ऊपर क़दम सँभाल
और उस को उँगलियों पे नचाती है मुफ़्लिसी

उस का तो दिल ठिकाने नहीं भाव क्या बताए
जब हो फटा दुपट्टा तो काहे से मुँह छुपाए
ले शाम से वो सुब्ह तलक गो कि नाचे गाए
औरों को आठ सात तो वो दो टके ही पाए
इस लाज से इसे भी लजाती है मुफ़्लिसी

जिस कसबी रंडी का हो हलाकत से दिल हज़ीं
रखता है उस को जब कोई आ कर तमाश-बीं
इक पौन पैसे तक भी वो करती नहीं नहीं
ये दुख उसी से पूछिए अब आह जिस के तईं
सोहबत में सारी रात जगाती है मुफ़्लिसी

वो तो ये समझे दिल में कि ढेला जो पाऊँगी
दमड़ी के पान दमड़ी के मिस्सी मँगाऊँगी
बाक़ी रही छदाम सो पानी भराऊँगी
फिर दिल में सोचती है कि क्या ख़ाक खाऊँगी
आख़िर चबीना उस का भुनाती है मुफ़्लिसी

जब मुफ़्लिसी से होवे कलावंत का दिल उदास
फिरता है ले तम्बूरे को हर घर के आस-पास
इक पाव सेर आने की दिल में लगा के आस
गोरी का वक़्त होवे तो गाता है वो बभास
याँ तक हवास उस के उड़ाती है मुफ़्लिसी

मुफ़्लिस बियाह बेटी का करता है बोल बोल
पैसा कहाँ जो जा के वो लावे जहेज़ मोल
जोरू का वो गला कि फूटा हो जैसे ढोल
घर की हलाल-ख़ोरी तलक करती है ढिढोल
हैबत तमाम उस की उठाती है मुफ़्लिसी

बेटे का बियाह हो तो न ब्याही न साथी है
न रौशनी न बाजे की आवाज़ आती है
माँ पीछे एक मैली चदर ओढ़े जाती है
बेटा बना है दूल्हा तो बावा बराती है
मुफ़्लिस की ये बरात चढ़ाती है मुफ़्लिसी

गर ब्याह कर चला है सहर को तो ये बला
शहदार नाना हीजड़ा और भाट मंड-चढ़ा
खींचे हुए उसे चले जाते हैं जा-ब-जा
वो आगे आगे लड़ता हुआ जाता है चला
और पीछे थपड़ियों को बजाती है मुफ़्लिसी

दरवाज़े पर ज़नाने बजाते हैं तालियाँ
और घर में बैठी डोमनी देती हैं गालियाँ
मालन गले की हार हो दौड़ी ले डालियाँ
सुक़्क़ा खड़ा सुनाता है बातें रज़ालियाँ
ये ख़्वारी ये ख़राबी दिखाती है मुफ़्लिसी

कोई शूम बे-हया कोई बोला निखट्टू है
बेटी ने जाना बाप तो मेरा निखट्टू है
बेटे पुकारते हैं कि बाबा निखट्टू है
बी-बी ये दिल मैं कहती है अच्छा निखट्टू है
आख़िर निखट्टू नाम धराती है मुफ़्लिसी

मुफ़्लिस का दर्द दिल में कोई ठानता नहीं
मुफ़्लिस की बात को भी कोई मानता नहीं
ज़ात और हसब-नसब को कोई जानता नहीं
सूरत भी उस की फिर कोई पहचानता नहीं
याँ तक नज़र से उस को गिराती है मुफ़्लिसी

जिस वक़्त मुफ़्लिसी से ये आ कर हुआ तबाह
फिर कोई इस के हाल प करता नहीं निगाह
दालीदरी कहे कोई ठहरा दे रू-सियाह
जो बातें उम्र भर न सुनी होवें उस ने आह
वो बातें उस को आ के सुनाती हैं मुफ़्लिसी

चूल्हा तवाना पानी के मटके में आबी है
पीने को कुछ न खाने को और ने रकाबी है
मुफ़्लिस के साथ सब के तईं बे-हिजाबी है
मुफ़्लिस की जोरू सच है कि याँ सब की भाबी है
इज़्ज़त सब उस के दिल की गंवाती है मुफ़्लिसी

कैसा ही आदमी हो पर अफ़्लास के तुफ़ैल
कोई गधा कहे उसे ठहरा दे कोई बैल
कपड़े फटे तमाम बढ़े बाल फैल फैल
मुँह ख़ुश्क दाँत ज़र्द बदन पर जमा है मैल
सब शक्ल क़ैदियों की बनाती है मुफ़्लिसी

हर आन दोस्तों की मोहब्बत घटाती है
जो आश्ना हैं उन की तो उल्फ़त घटाती है
अपने की मेहर ग़ैर की चाहत घटाती है
शर्म-ओ-हया ओ इज़्ज़त-ओ-हुर्मत घटाती है
हाँ नाख़ुन और बाल बढ़ाती है मुफ़्लिसी

जब मुफ़्लिसी हुई तो शराफ़त कहाँ रही
वो क़द्र ज़ात की वो नजाबत कहाँ रही
कपड़े फटे तो लोगों में इज़्ज़त कहाँ रही
ताज़ीम और तवाज़ो की बाबत कहाँ रही
मज्लिस की जूतियों पे बिड़ाती है मुफ़्लिसी

मुफ़्लिस किसी का लड़का जो ले प्यार से उठा
बाप उस का देखे हाथ का और पाँव का कड़ा
कहता है कोई जूती न लेवे कहीं चुरा
नट-खट उचक्का चोर दग़ाबाज़ गठ-कटा
सौ सौ तरह के ऐब लगाती है मुफ़्लिसी

रखती नहीं किसी की ये ग़ैरत की आन को
सब ख़ाक में मिलाती है हुर्मत की शान को
सौ मेहनतों में उस की खपाती है जान को
चोरी पे आ के डाले ही मुफ़्लिस के ध्यान को
आख़िर नदान भीक मंगाती है मुफ़्लिसी

दुनिया में ले के शाह से ऐ यार ता-फ़क़ीर
ख़ालिक़ न मुफ़्लिसी में किसी को करे असीर
अशराफ़ को बनाती है इक आन में फ़क़ीर
क्या क्या मैं मुफ़्लिसी की ख़राबी कहूँ नज़ीर
वो जाने जिस के दिल को जलाती है मुफ़्लिसी

मनुष्य जीवन पर कविताएँ : नज़ीर अकबराबादी (Manushya Jeevan Par Kavitayen : Nazeer Akbarabadi)

1. बचपन

क्या दिन थे यारो वह भी थे जबकि भोले भाले ।
निकले थी दाई लेकर फिरते कभी ददा ले ।।
चोटी कोई रखा ले बद्धी कोई पिन्हा ले ।
हँसली गले में डाले मिन्नत कोई बढ़ा ले ।।
मोटें हों या कि दुबले, गोरे हों या कि काले ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।1।।

दिल में किसी के हरगिज़ न शर्म न हया है ।
आगा भी खुल रहा है,पीछा भी खुल रहा है ।।
पहनें फिरे तो क्या है, नंगे फिरे तो क्या है ।
याँ यूँ भी वाह वा है और वूँ भी वाह वा है ।।
कुछ खाले इस तरह से कुछ उस तरह से खाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।2।।

मर जावे कोई तो भी कुछ उनका ग़म न करना ।
ने जाने कुछ बिगड़ना, ने जाने कुछ संवरना ।।
उनकी बला से घर में हो क़ैद या कि घिरना ।
जिस बात पर यह मचले फिर वो ही कर गुज़रना ।।
माँ ओढ़नी को, बाबा पगड़ी को बेच डाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।3।।

जो कोई चीज़ देवे नित हाथ ओटते हैं ।
गुड़, बेर, मूली, गाजर, ले मुँह में घोटते हैं ।।
बाबा की मूँछ माँ की चोटी खसोटते हैं ।
गर्दों में अट रहे हैं, ख़ाकों में लोटते हैं ।।
कुछ मिल गया सो पी लें, कुछ बन गया सो खालें ।
क्या ऐश लूटते हैं मासूम भोले भाले ।।4।।

जो उनको दो सो खा लें, फीका हो या सलोना ।
हैं बादशाह से बेहतर जब मिल गया खिलौना ।।
जिस जा पे नींद आई फिर वां ही उनको सोना ।
परवा न कुछ पलंग की ने चाहिए बिछौना ।।
भोंपू कोई बजा ले, फिरकी कोई फिरा ले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।5।।

ये बालेपन का यारो, आलम अजब बना है ।
यह उम्र वो है इसमें जो है सो बादशाह है।।
और सच अगर ये पूछो तो बादशाह भी क्या है।
अब तो ‘‘नज़ीर’’ मेरी सबको यही दुआ है ।
जीते रहें सभी के आसो-मुराद वाले ।
क्या ऐश लूटते हैं, मासूम भोले भाले ।।6।।

(सलोना =नमकीन, आलम=दुनिया)

2. बचपन के मज़े

क्या बक़्त था वह हम थे जब दूध के चटोरे।
हर आन आंचलों के मामूर थे कटोरे।
पांवों में काले टीके, हाथों में नीले डोरे।
या चांद सी हो सूरत, या सांवरे व गोरे॥
क्या सैर देखते हैं यह तिफ़्ल शीर ख़ोरे॥1॥

गुल की तरह से हर दम सीने पे फूलते थे।
पी-पी के दूध माँ का खुश होके फूलते थे॥
मां बाप उनकी खि़दमत सर पर कुबूलते थे।
हाथों में खेलते थे झूलों में झूलते थे॥
क्या सैर देखते हैं यह तिफ़्ल शीर ख़ोरे॥2॥

ने दोस्ती किसी से, ने दिल में उनके कीना।
जानें न बे क़रीना, ने समझें कुछ करीना॥
ने गर्मियों से बाक़िफ़, ने जानते पसीना।
छाती से माँ की लिपटे खुश उनको दूध पीना॥
क्या सैर देखते हैं यह तिफ़्ल शीर ख़ोरे॥3॥

जो देखे उनकी सूरत, ले प्यार से खिलावे।
हाथों उपर उछाले, और छेड़ कर हंसावे।
चूमे कभी दहन को, छाती कभी लगावे।
कोई चुस्नी मुंह में देवे कोई झुनझुना बजावे।
क्या सैर देखते हैं यह तिफ़्ल शीर ख़ोरे॥4॥

छोटा सा कोई कुर्ता उनका निकालता है।
या छोटी-छोटी टोपी सर पर संभालता है।
मां दूध है पिलाती, और बाप पालता है।
नाना गले लगावे, दादा उछालता है।
क्या सैर देखते हैं यह तिफ़्ल शीर ख़ोरे॥5॥

क्या उम्र है अज़ीज़ी और क्या यह वक़्त हैगा।
जब घुटनियों पे आये फिर और कुछ तमाशा।
पांवों चले तो वां से फिर और प्यार ठहरा।
सब ज़िंदगी का ख़त है उनको “नज़ीर” अहा हा।
क्या सैर देखते हैं यह तिफ़्ल शीर ख़ोरे॥6॥

(मामूर=भरे हुए,नियुक्त, तिफ़्ल शीर ख़ोरे=
दूध पीते बच्चे, कीना=द्वेष, करीना=ढंग,
शिष्टता, दहन=मुँह)

3. जवानी

बना है अपने आलम में वह कुछ आलम जवानी का।
कि उम्रे खिज्र से बेहतर है एक एक दम जवानी का॥

नहीं बूढ़ों की दाढ़ी पर मियां यह रंग बिस्मे का।
किया है उनके एक एक बाल ने मातम जवानी का॥

यह बूढ़े गो कि अपने मुंह से शेख़ी में नहीं कहते।
भरा है आह पर इन सबके दिल में ग़म जवानी का॥

यह पीराने जहां इस वास्ते रोते हैं अब हर दम।
कि क्या-क्या इनका हंगामा हुआ बरहम जवानी का॥

किसी की पीठ कुबड़ी को भला ख़ातिर में क्या लावे।
अकड़ में नौ जवानों के जो मारे दम जवानी का॥

शराबो गुलबदन साक़ी मजे़ ऐशोतरब हर दम।
बहारे जिन्दगी कहिये तो है मौसम जवानी का॥

”नज़ीर“ अब हम उड़ाते हैं मजे़ क्या-क्या अहा! हा! हा
बनाया है अजब अल्लाह ने आलम जवानी का॥

(बरहम=अस्त-व्यस्त, ऐशोतरब=आनन्द, हर्ष उल्लास)

4. जवानी के मज़े

क्या ऐश की रखती है सब आहंग जवानी।
करती है बहारों के तई दंग जवानी॥
हर आन पिलाती है मै और बंग जवानी।
करती है कहीं सुलह कहीं जंग जवानी॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥1॥

अल्लाह ने जवानी का यह आलम है बनाया।
जो हर कहीं आशिक, कहीं रुसवा, कहीं शैदा॥
फंदे में कहीं जी है, कहीं दिल है तड़पता।
मरते हैं, सिसकते हैं, बिलखते हैं, अहा! हा! ॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥2॥

ने मै का ना माजून के मंगवाने का कुछ ग़म।
ना दिल के लगाने का, न गुल खाने का कुछ ग़म॥
गाली का न, आंखों के लड़ाने का कुछ ग़म।
हंसने का, न छाती से लिपट जाने का कुछ ग़म॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥3॥

लड़ती है कहीं आंख, कहीं दस्त कहीं सैन।
झूठा है कहीं प्यार, किसी से है लगे नैन।
वादा कहीं, इक़रार कहीं, सैन कहीं, नैन।
नै जी को फ़राग़त है न आंखों के तई चैन।
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥4॥

उल्फ़त है कहीं, मेहरो मुहब्बत है, कहीं चाह।
करता है कोई चाह, कोई देख रहा राह॥
साक़ी है सुराही है, परीज़ाद हैं हमराह।
क्या ऐश हैं, क्या ऐश हैं, क्या ऐश हैं वल्लाह॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥5॥

चहरे पे अबानी का जो आकर है चढ़ा नूर।
रह जाती है परियां भी ग़रज़ उसके तईं घूर॥
छाती से लिपटती हैं कोई हुस्न की मग़रूर।
गोदी में पड़ी लोटे है चंचल सी कोई हूर॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥6॥

गर रात किसी पास रहे ऐश में ग़ल्तां।
और वां से किसी और के मिलने का हुआ ध्यां॥
घबरा के उठे जब तो गिरे पांव पर हर आं।
कहती है “हमें छोड़ के जाते हो किधर जां”॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥7॥

रस्ते में निकलते हैं तो होती हैं यह चाहें।
वह शोख़ कि हो बंद जिन्हें देख के राहें॥
खाँसे है कोई हंस के, कोई भरती है आहें।
पड़ती है हर एक जा से निगाहों पे निगाहें॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥8॥

तनते हैं अगर ऐंठ के चलते हैं अज़ब चाल।
जो पांव कहीं, राह कहीं, सैफ़ कहीं ढाल॥
खींचे हैं कहीं बाल, कहीं तोड़ लिया गाल।
चढ़ बैठे कहीं, हाथ कहीं मुंह को दिया डाल॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥9॥

जाते हैं तवायफ़ में तो वां होती है यह चाव।
कहती है कोई “इनके लिए पान बना लाव”॥
कोई कहती है “यां बैठो,” कोई कहती है “वां आव”।
नाचे है कोई शोख़, बताती है कोई भाव॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥10॥

हंस हंस के कोई हुस्न की छल बल है दिखाती।
मिस्सी कोई सुरमा, कोई काज़ल है दिखाती॥
चितवन की लगावट, कोई चंचल है दिखाती।
कुर्ती, कोई अंगिया, कोई आंचल है दिखाती॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥11॥

कहती है कोई “रात मेरे पास न आये”।
कहती है कोई “हमको भी ख़ातिर में न लाये”।
कहती है कोई “किसने तुम्हें पान खिलाए”।
कहती है कोई “घर को जो जाये हमें खाए”।
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥12॥

आया है जो कोई हुस्न का बूटा या कोई झाड़।
जा शोख से झट लिपटे यह पंजों के तई झाड़।
अंगिया के तई चीर के कुर्ती को लिया फाड़।
इख़लास कहीं, प्यार कहीं, मार कहीं धाड़॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥13॥

क्या तुझ से “नज़ीर” अब मैं जवानी की कहूं बात।
इस पन में गुज़रती है अज़ब ऐश से औक़त॥
महबूब परीज़ाद चले आते हैं दिन रात।
सेरें हैं, बहारें, हैं, तबाजे़ है मदारात॥
इस ढब के मजे़ रखती है और ढंग जवानी।
आशिक़ को दिखाती है अज़ब रंग जवानी॥14॥

(आहंग=इरादा,वक़्त, मै=शराब, शैदा=मुग्ध,
आसक्त,पागल, माजून=कुटी हुई दवाओं का
अबलेह, फ़राग़त=फुर्सत, उल्फ़त=प्रेम, मेहरो=
मेहरबानी, साक़ी=शराब पिलाने वाली, परीज़ाद=
परी का पुत्र, हमराह=साथ, वल्लाह=ईश्वर की
शपथ, शोख़=चंचल, तवायफ़=वेश्या, पन=आयु,
उम्र, औक़त=समय)

5. बुढ़ापा

क्या क़हर है यारो जिसे आजाये बुढ़ापा।
और ऐश जवानी के तई खाये बुढ़ापा॥
इश्रत को मिला ख़ाक में ग़म लाये बुढ़ापा।
हर काम को हर बात को तरसाये बुढ़ापा॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥1॥

जो लोग ख़ुशामद से बिठाते थे घड़ी पहर।
छाती से लिपटते थे मुहब्बत की जता लहर॥
अब आके बुढ़ापे ने किया, हाय ये कुछ क़हर।
अब जिनके कने जाते हैं लगते हैं उन्हें ज़हर॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥2॥

आगे तो परीज़ाद यह रखते थे हमें घेर।
आते थे चले आप जो लगती थी ज़रा देर॥
सो आके बुढ़ापे ने किया हाय यह अन्धेर।
जो दौड़ के मिलते थे वह अब लेते हैं मुंह फेर॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥3॥

थे जब तलक अय्याम जवानी के हरे रूख।
महबूब वह मिलते थे न हो देख जिन्हें भूख॥
बैठें थे परिंद आन के जब तक था हरा रूख॥
अब क्या है जो पतझड़ हुआ, और जड़ हो गई सूख॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥4॥

आगे थे जहां गुलबदन और यूसुफे़ सानी।
देते थे हमें प्यार से छल्लों की निशानी॥
मर जायें तो अब मुंह में न डाले कोई पानी।
किस दुःख में हमें छोड़ गई ‘हाय जवानी’॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥5॥

याद आते हैं हमको जो जवानी के वो हंगाम।
और जाम दिल आराम, मजे़ ऐश और आराम॥
उन सब में जो देखो तो नहीं एक का अब नाम।
क्या हम पै सितम कर गई ये गर्दिशे-अय्याम॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥6॥

मज़लिस में जवानों की तो साग़र हैं छलकते।
चुहलें हैं बहारें हैं परीरू हैं झमकते॥
हम उनके तयीं दूर से हैं रश्क से तकते।
वह ऐशो तरब करते हैं हम सर हैं पटकते॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥7॥

अब पांव पड़ें उनके तो हरगिज़ न बुलावें।
जा बैठें तो एकदम में ख़फ़ा होके उठावें॥
इतना तो कहां अब, जो कोई जाम पिलावें।
गर जान निकलती हो तो पानी न चुआवें॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥8॥

जब ऐश के मेहमान थे, अब राम के हुए जैफ़।
अब खूने जिगर खाते हैं, जब पीते थे सौ कैफ़॥
जब ऐंठ के चलते थे सिपर बांध उठा सैफ़।
अब टेक के लाठी के तई चलते हैं सद हैफ़।
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥9॥

थे हम भी जवानी में बहुत इश्क़ के पूरे।
वह कौन से गुलरू थे जो हमने नहीं घूरे॥
अब आके बुढ़ापे ने किये ऐसे अधूरे।
पर झड़ गए, दुम उड़ गई, फिरते हैं लडूरे॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥10॥

क्या यारो, उलट हाय गया हमसे ज़माना।
जो शोख़ कि थे अपनी निगाहों के निशाना॥
छेड़े है कोई डाल के दादा का बहाना।
हंस कर कोई कहता है “कहां जाते हो नाना”॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥11॥

पूछें जिसे कहता है वह क्या पूछे है बुड्ढे?
आवें तो यह गुल हो कि कहां आवे है बुड्ढे?
बैठें तो यह हो धूम, कहां बैठे हैं बुड्ढे?
देखें जिसे कहता है, वह क्या देखे हैं बुड्ढे?
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥12॥

क्या यारो कहें गोकि बुढ़ापा है हमारा।
पर बूढ़े कहाने का नहीं तो भी सहारा॥
जब बूढ़ा हमें कहके जहां हाय! पुकारा।
काफ़िर ने कलेजे में गोया तीर सा मारा॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥13॥

खू़बां में अगर जावें तो होती है यह फकड़ी।
खीचें है कोई हाथ कोई पकड़े है लकड़ी॥
मूंछें कहीं बत्ती के लिए जाती हैं पकड़ी।
दाढ़ी को पकड़ खींच कोई झाड़े है मकड़ी॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥14॥

कहता है कोई छीन लो इस बुड्ढे की लाठी।
कहता है कोई शोख कि हां खींच लो डाढ़ी॥
इतनी किसी काफ़िर को समझ अब नहीं आती।
क्या बूढ़े जो होते हैं तो क्या उनके नहीं जी॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥15॥

एक वक़्त वह था हम भी मजे़ करते थे गिन-गिन।
महबूब परीज़ाद न रहते थे मिले बिन॥
एक वक़्त यह है हाय जो सब करते हैं अब घिन।
या एक वह अय्याम थे या एक हैं यह दिन॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥16॥

बूढ़ों में अगर जावें तो लगता नहीं वां दिल।
वां क्यों कि लगे, दिल तो है महबूबों का मायल॥
महबूबों में जावें हैं तो वह सब छेड़े हैं मिल-मिल।
क्या सख़्त मुसीबत है पड़ी आन के मुश्किल॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥17॥

पनघट को हमारी अगर असवारी गई है।
तो वां भी लगी साथ यही ख़्वारी गई है॥
सुनते हैं कि कहती हुई पनिहारी गई है।
“लो देखो बुढ़ापे में यह मत मारी गई है॥”
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥18॥

पगड़ी हो अगर लाल गुलाबी तो यह आफ़त।
कहता है हर एक देख के क्या खू़ब है रंगत॥
ठट्ठे से कोई कहता है कर शक्ल पै रहमत।
लाहौल वला देखिए, बूढ़े की हिमाक़त॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥19॥

गर ब्याह में जावें तो यह ज़िल्लत है उठाना।
छूटते ही बने बाप निकाही का निशाना॥
रिंदों में अगर जावें तो मुश्किल है फिर आना।
अफ़सोस किसी जा नहीं बूढ़े का ठिकाना॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥20॥

है झांवली ताली का जनानों में जो चर्चा।
गर उनमें कभी जावें तो है यह सितम आता॥
दाढ़ी की जगत बोले कोई आंख को मटका।
ठट्ठे से कोई कहता है आ! आ! मेरे दादा॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥21॥

दरिया के तमाशे को अगर जावें तो यारो।
कहता है हर एक देख के “जाते हो कहां को?”॥
और हँस के शरारत से कोई पूछे है बदखो।
“क्यों खैर है, क्या खि़ज्र से मिलने को चले हो?”॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥22॥

गर आज को होते वह जवानी के जमाने।
कु़दरत थी जो यूं छेड़ते भडु़ए व जनाने।
मुश्किल अभी पड़ जाती उन्हें पीछे छुड़ाने।
एक दम में अभी लगते बोही हाय! मचाने॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥23॥

गर नाच में जावें तो यह हसरत है सताती।
जो नाचे है काफ़िर वह नहीं ध्यान में लाती॥
औरों की तरफ़ जावे तो आंखें है लड़ाती।
पर हमको तो काफ़िर वह अंगूठा है दिखाती॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥24॥

गर नायिका उनमें कोई बूढ़ी है कहाती।
अलबत्ता बुढ़ापे पै वह टुक रम है खाती॥
फ़ीकी सी पुरानी सी, लगावट है जताती।
पर क़हर है, वह हमको ज़रा खुश नहीं आती।
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥25॥

चकले के जो अन्दर की वह कहलाती हैं कस्बी।
गर उनमें कभी जावें तो होती है खराबी॥
मुंह देखते ही कहती हैं सब “आओ बड़े जी”॥
“क्या आए हो यां करने को पीरी व मुरीदी”॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥26॥

गर जावें तवायफ में तो लगती हैं सुनाने।
क्या आये हो हज़रत हमें कु़रआन पढ़ाने॥
हंस-हंस कोई पूछे है नमाज़ों के दुगाने।
ठट्ठे से कोई फेंके है तस्बीह के दाने॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥27॥

गो झुक के कमर पांव से सर आन लगा है।
पर दिल में तो खूबां का वही ध्यान लगा है॥
कहते हैं, जिसे हमको यह अरमान लगा है।
कहता है वह, क्या बूढ़े को शैतान लगा है॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥28॥

नक़लें कोई इन पोपले होठों की बनावे।
चलकर कोई कुबड़े की तरह क़द को झुकावे॥
दाढ़ी के कने उंगली को ला ला के नचावे।
यह ख़्वारी तो अल्लाह! किसी को न दिखावे॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥29॥

थे जैसे जवानी में किये धूम धड़क्के।
वैसे ही बुढ़ापे में छुटे आन के छक्के॥
सब उड़ गए काफ़िर वह नज़ारे वह झमक्के।
अब ऐश जवानों को है, और बूढ़ों को धक्के॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥30॥

गर हिर्स से दाढ़ी को खि़ज़ाब अपनी लगावें।
झुर्री जो पड़ी मुंह पे उन्हें कैसे मिटावें॥
गो मक्र से हंसने के तई दांत बंधावें।
गर्दन तो पड़ी हिलती है क्या ख़ाक छिपावें॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥31॥

आंखों से ये दीदार की लज़्ज़त नहीं छुटती।
और दिल से भी महबूब की उल्फ़त नहीं छुटती॥
सब छूट गया पर दीद की यह लत नहीं छुटती।
बूढ़े हुए पर हुस्न की चाहत नहीं छुटती॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥32॥

सुनते हो जवानो का यह सखु़न कहते हैं तुमसे।
करने हों जो कर लो वह मजे़ ऐशो तरब के॥
जावेगी जवानी तो फिर अफ़सोस करोगे।
तुम जैसे हो, वैसे तो कभी हम भी जवां थे॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥33॥

अब जितने हो माशूक यह सब याद रखो बात।
जो हो सो करो चाहने वालों की मुदारात॥
महबूबो ग़नीमत है जबानी की यह औक़ात।
जब बूढ़े हुए फिर तो हुए ढाक के दो पात॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥34॥

अब जिस से रहें साफ़ तो होता है वह गँदला।
अल्लाह न दिखलाए किसी को यह मलोला॥
इस चर्ख़सितमगार ने सीने में हसद ला।
क्या हमसे जवानी का लिया आह! यह बदला॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥35॥

थे जैसे जवानी में पिये जाम सुबू के।
वैसे ही बुढ़ापे में पिये घूंट लहू के॥
जब आके गले लगते थे महबूब भबूके।
अब कहिये तो बुढ़िया भी कोई मुंह पे न थूके॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥36॥

यह होंठ जो अब पोपले यारो हैं हमारे।
इन होठों ने बोसों के बड़े रंग है मारे॥
होते थे जवानी में तो परियों के गुज़ारे।
और अब तो चुड़ैल आन के एक लात न मारे॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥37॥

थे जैसे जवानी के चढ़े ज़ोर में सरशख़।
वैसे ही बुढ़ापे को पड़ी आन के अब पख॥
तकला हुआ तन सूख, रूई बाल रगें नख़।
हल्बा हुए, चर्ख़ा हुए, लप्सी हुए चमरख॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥38॥

महफ़िल में वह मस्ती से बिगड़ना नहीं भूले।
साक़ी से प्यालों पे झगड़ना नहीं भूले॥
हंस-हंस के परीज़ादों से लउ़ना नहीं भूले।
वह गालियां, वह बोसों पे अड़ना नहीं भूले॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥39॥

क्या दौर था सर दुखने का होता था जब अफ़सोस।
हर गुंचादहन देख के करता था हद अफ़सोस॥
अब मर भी अगर जावें तो होता है कद अफ़सोस।
अफ़सोस, सद अफ़सोस, सद अफ़सोस, सद अफ़सोस॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥40॥

जब जान के बूढ़ा हमें छेड़ें हैं यह दिलख़्वाह।
और छेड़ के मज़सिल से उठाते हैं ब इकराह॥
उस वक़्त तो हम यारो! दमे सर्द से भर आह।
रो-रो के यही कहते हैं अब क्यों मेरे अल्लाह!॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥41॥

गर होती जवानी तो अभी धूम यह मचती।
छाती से लिपट दम में कड़क डालते पसली॥
जब कुर्ती और अंगिया की उड़ा डालते धज्जी।
पर क्या करें यारो कि बुढ़ापे ने बुरी की।
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥42॥

वह जोश नहीं जिसके कोई ख़ौफ़ से दहले।
वह ज़ोम नहीं जिससे कोई बात को सह ले॥
जब फूस हुए हाथ थके पांव भी पहले।
फिर जिसके जो कुछ शौक़ में आवे वही कहले॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥43॥

करते थे जवानी में तो सब आपसे आ चाह।
और हुश्न दिखाते थे वह सब आन के दिलख़्वाह॥
यह क़हर बुढ़ापे ने किया आह “नज़ीर” आह।
अब कोई नहीं पूछता अल्लाह! ही अल्लाह!॥
सब चीज़ को होता है बुरा हाय! बुढ़ापा।
आशिक़ को तो अल्लाह! न दिखलाए बुढ़ापा॥44॥

(क़हर=दैवी प्रकोप, इश्रत=खुशी,आनन्द, कने=पास,
परीज़ाद=अप्सरा-पुत्र,माशूक, अय्याम=दिन, गुलबदन=
फूल जैसे कोमल शरीर वाले, यूसुफे़ सानी=हज़रत
यूसुफ जैसे सुन्दर, गर्दिशे-अय्याम=दिनों के फेर,
साग़र=शराब के प्याले, परीरू=सुन्दरियां, रश्क=किसी
की विशेषता से ईर्ष्या न करके स्वयं वैसा बनने का
भाव, ऐशो तरब=रास-रंग, जैफ़=मेहमान, कैफ़=नशा,
सिपर=ढाल, सैफ़=तलवार, सद हैफ़=सैकड़ों अफसोस,
गुलरू=फूल जैसे सुन्दर मुख वाले, घूरे=टकटकी
लगाकर देखना, गोकि=यद्यपि, खू़बां=सुन्दरियों,
माशूकों, फकड़ी=अनादर-पूर्ण मज़ाक, घिन=घृणा,
मायल=आसक्त, लाहौल वला=घृणासूचक वाक्य,
हिमाक़त=मूर्खता, ज़िल्लत=ख्वारी, निकाही=निकाह
वाली, रिंद=शराबी,रसिया, झांवली=आंख और भौं
का इशारा, जनानों=हिजड़ों में, बदखो=बुरे और
कड़ुवे स्वभाववाला, खि़ज्र=भूले भटकों को राह
बताने वाले,अमर पैगम्बर, चकले=व्यभिचारिणी
स्त्रियों या रंडियों का अड्डा, कस्बी=पेशेवर
बाज़ारी औरत, पीरी व मुरीदी=उस्तादी शागिर्दी,
नमाज़ों के दुगाने=शुकराने की नमाज़ की दो
रकअतें, तस्बीह=माला, गो=यद्यपि, हिर्स=लोभ,
लालच,इच्छा, मक्र=धोखा,चालाकी, दांत बंधाबे=
बनावटी दांत लगवालें, दीद=दीदार, ऐशो-तरब=
आनन्द,खुशी, मुदारात=आव-भगत,सम्मान,
औक़ात=वक्त, मलोला=दुःख, चर्ख़सितमगार=
आस्मान,होनी, हसद=जलन,ईर्ष्या, जाम=शराब
पीने के प्याले, सुबू=घड़ों, बोसों=चुम्बन,
सरशख़=मजबूत, गुंचादहन=फूल जैसे मुंह
वाला, दिलख़्वाह=मनमोहक, ब इकराह=घृणा
के साथ)

6. बुढ़ापे की तअल्लियाँ

जो नौजवां हैं उनके दिल में गुमान क्या है।
जो हम में कस है उनमें ताबो तुबान क्या है।
बूढ़ा अधेड़ अमका ढमका फलान क्या है।
हमसे जो हो मुक़ाबिल पट्ठे में जान क्या है।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥1॥

हर वक़्त दिल हमारा मुग्दर ही भानता है।
तीर अब तलक हमारा तूदे ही छानता है।
हर शोख़ गुल बदन से गहरी ही छानता है।
इस बात को हमारी अल्लाह ही जानता है।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥2॥

चाहें तो घूर डालें सौ खू़बरू को दम में।
और मेले छान मारें वह ज़ोर है क़दम में।
सीना फड़क रहा है खूबां के दर्दो ग़म में।
पट्ठों में वह कहां है जो गर्मियां हैं हम में।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥3॥

दुबले हुए हैं हम तो खूबां के दर्दो ग़म से।
और झुर्रियां पड़ी हैं उनके ग़मो अलम से।
मूछें सफे़द की हैं इस हिज्र के सितम से।
बूढ़ा हमें न जानो अल्लाह के करम से।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥4॥

कोई भी बाल तन पर मेरे नहीं है काला।
खूंबां के दर्दो ग़म का उन पर पड़ा है पाला।
आकर जवां मुक़ाबिल होवे कोई हमारा।
ख़ालिक से है यक़ीं यह दिखलाए वह भी पीछा।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥5॥

ऐ यार! सौ बरस की हुई अपनी उम्र आकर।
और झुर्रियां पड़ी हैं सारे बदन के ऊपर।
दिखलाते जिस घड़ी हैं मैदाँ में ज़ोर जाकर।
रुस्तम को भी समझते अपने नहीं बराबर।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥6॥

हम और जवान मिलकर दिल के तई लगावें।
और अपने-अपने गुल से मिलने की दिल में लावें।
जाकर उन्हो के घर पर जब ज़ोर आजमावें।
वह गर दिवाल कूदें हम कोठा फांदा जावें।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥7॥

जाते हैं रोज़ जितनी खूबां की बस्तियां हैं।
हर आन दीद बाजी और बुत परस्तियां हैं।
सौ सौ तरह की चुहलें जी में उकस्तियां हैं।
क्या जोश भर रहे हैं क्या ऐश मस्तियां हैं।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥8॥

दुनियां में ताक़त अपनी मशहूर इस क़दर है।
कूंचों में और मकां में देखो जिधर उधर है।
जंगल में हाथी चीता या कोई शेर नर है।
हर एक के दिल में अपना ही ख़ौफ और ख़तर है।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥9॥

करते हैं हम जो यारो! अब धूम और धड़क्के।
देखें जवां तो उनके छुट जायें दम में छक्के।
पीते हैं मै के प्याले, चलते हैं मार धक्के।
क्या क्या “नज़ीर” हम भी करते हैं अब झमक्के।
अब भी हमारे आगे यारो! जवान क्या है॥10॥

(कस=शक्ति, ताबो तुबान=शक्ति,सामर्थ्य, तूदे=
ढेर, शोख़=चंचल, गुल बदन=फूल जैसे मुख वाला,
वाली, घूर=टकटकी लगाकर देखना, खू़बरू=
सुन्दर,सुन्दरियां, पट्ठों=जवान,युवा, हिज्र=जुदाई,
पाला=हिमपात,तुषारपात, रुस्तम=ईरान का एक
प्राचीन योद्धा और प्रसिद्ध पहलवान, गुल=फूल,
प्रिय पात्र, हर आन=हर समय, दीद बाजी=नज़र
लड़ाना,ताक झांक करना, बुत परस्तियां=बुतों की
इबादत, माशूकों की इबादत,प्रिय पात्रों की पूजा,
उकस्तियां=पैदा होना,उकसना)

7. बुढ़ापे की आशिक़ी

क़ायम है जिस्म गो कि नहीं कस, ग़नीमत अस्त।
जीते तो हैं, अगरचे नहीं बस ग़नीमत अस्त।
सौ ऐश हमको गर न मिले दम ग़नीमत अस्त।
वक़्ते खि़जां चौगुल नबूद ख़स ग़नीमत अस्त।
“पीरी के दम ज़िइश्क ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाख़े कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥1॥”

करते हैं इस बुढ़ापे में खू़बां की हम तो चाह।
अहमक़ हैं खू़ब रू जो वह हंसते हैं हम पे आह।
और वह जो कुछ शऊर से रखते हैं दस्तगाह।
सो वह तो हमको देख यह कहते हैं वाह! वाह!
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥2॥

जिन दिलवरों से यारो हम अब दिल लगाते हैं।
वह सब तरस हमारे बुढ़ापे पे खाते हैं।
बोसा भी हमको देते हैं मै भी पिलाते हैं।
और राह मुंसिफ़ी से यह कहते भी जाते हैं।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥3॥

ने तन में अब है ज़ोर न चलते हैं दस्तो पा।
और झुकते झुकते सर से क़दम साथ आ लगा।
इस वक़्त में भी इश्क़ को रखते हैं जा बजा।
क्यों यारो, सच ही कहियो यह इंसाफ़ की है जा।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥4॥

रोए जो हम चमन में सहर बैठ कर ज़रा।
बुलबुल से पूछा गुल ने कि बूढ़ा यह क्यूं रोया।
उसने कहा कि इसका किसी से है दिल लगा।
जब गुल ने हमको देख के हंस कर यही कहा।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥5॥

ताकत बदन में कहिए तो अब नाम को नहीं।
होता है अब भी सैरो तमाशा अगर कहीं।
जाते हैं लाठी टेक के दिलशाद हम वहीं।
जो हमको देखता है वह कहता है आफ़रीं।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥6॥

कल मैकदे में हम जो गए बाक़दे दुता।
और पी शराब लोट गए शोरो गुल मचा।
उस दम हमारे देख बुढ़ापे का हौसला।
हंस-हंस के जब तो पीरेमुगां ने यही कहा।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥7॥

प्यारे तुम्हारे और तो आशिक़ हैं नौ जवां।
एक हम ही सबसे बूढ़े हैं और पीरे नातवां।
वह तो रहेंगे हम हैं कुछ ही दिन के मेहमां।
बस सबको छोड़ हमसे मिलो किसलिए कि ज़ां।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥8॥

जो हैं जवान उन्हों के तो उल्फ़त हैं कारोबार।
हम बूढ़े होके इश्क़ को रखते हैं बरक़रार।
मिलते हैं दिल लगाते हैं, फिरते हैं ख़्वारो-ज़ार।
जो हम से हो सके वह ग़नीमत है मेरे यार।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥9॥

दांतों का गरचे मुंह में हमारे नहीं निशां।
बोसे पे आन अड़ते हैं तो भी हर एक आं।
इन शोखियों का वक़्त हमारे भला कहां।
पर दिल में अपने हम भी यह कहते हैं मेरी जां।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥10॥

जिनको खु़दा ने दी है जवानी की दस्तगाह।
वह तो हमेशा दिल को लगावेंगे तुम से आह।
और हम कहां फिर आवेंगे करने तुम्हारी चाह।
बस तुम अब अपने दिल में इसी पर करो निगाह।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥11॥

गो तन तमाम कांपे है और हैं सफ़ेद बाल।
तो भी निबाहते हैं मुहब्बत की चाल ढाल।
प्यारे हमारे मिलने से लाओ न कुछ मलाल।
किस वास्ते करो तुम अब इस बात पर ख्याल।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥12॥

होते हैं उल्फ़तों से जवानी में सब असीर।
हम इश्क़ से बुढ़ापे में निकले हैं बन फ़क़ीर।
जो हमको देखता है अब इस हाल में “नज़ीर”।
पढ़ता है शाद होके यही बैठ दिल पज़ीर।
पीरी के दम जे़ इश्क़ ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाखे़ कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त॥13॥

(गो कि=यद्यपि, कस=शक्ति, ग़नीमत अस्त=
अच्छा है, वक़्ते खि़जां=पतझड़ के मौसम, चौगुल=
फूल, नबूद=नहीं है, ख़स=घास,
“पीरी के दम ज़िइश्क ज़िनद बस ग़नीमत अस्त।
अज़ शाख़े कोहना मेवए नौ रस ग़नीमत अस्त=
वृद्धावस्था में प्रेम प्रसंग पर्याप्त है, अच्छा है ठीक
उसी प्रकार जिस प्रकार जीर्ण अथवा पुरानी शाखा
पर सरस फल का उत्पन्न होना पर्याप्त एवं उत्तम
है, अहमक़=बुद्धू, खू़ब रू=रूपवान, दस्तगाह=योग्यता,
मुंसिफ़ी=न्याय,इंसाफ, दस्तो पा=हाथ-पांव, दिलशाद=
प्रसन्न,खुश, आफ़रीं=शाबाश, मैकदे=मदिरालय,
बाक़दे दुता=झुका हुआ शरीर, पीरेमुगां=धर्म-गुरू,
नातवां=कमज़ोर, बरक़रार=कायम, ख़्वारो-ज़ार=
बेइज्जत और कमजोर, असीर=कै़दी,बन्दी,
दिल पज़ीर=जो दिल को पसंद हो)

8. जवानी बुढ़ापे की लड़ाई

जहां में यारो खु़दा की भी क्या खु़दाई है।
कि हर किसी को तकब्बुर है, खु़दनुमाई है।
इधर जवानी बुढ़ापे पे चढ़ के आई है।
उधर बुढ़ापे की उस पर हुई चढ़ाई है।
अजब जवानी, बुढ़ापे की अब लड़ाई है॥1॥

जवानी अपनी जवानी में हो रही सरशार।
बुढ़ापा अपने बुढ़ापे में दम रहा है मार।
हुए हैं दोनों जो लड़ने के वास्ते तैयार।
इधर जवानी ने खींची है तैश से तलवार।
बुढ़ापे ने भी उधर लाठी एक उठाई है॥2॥

इधर है तीर का क़ामत उधर वह पीठ कमां।
उधर वह टेढ़ा बदन और इधर अकड़ के निशां।
जवानी कहती है बढ़ करके सुन बुढ़ापे मियां।
कि तेरी ख़ैर इसी में है, चल सरक इस आं।
वगरना तेरी अजल मेरे हाथ आई है॥3॥

मैं आज वह हूं कि रुस्तम को खड़खड़ा डालूं।
पहाड़ होवे तो एकदम में हिल हिला डालूं।
दरख़्त जड़ से उखाडूं ज़मीं हिला डालूं।
अभी कहे तो तेरी धज्जियां उड़ा डालूं।
कि मुझको ज़ोर की, कु़ब्बत की बादशाई है॥4॥

कहा बुढ़ापे ने गर तुझमें ज़ोर है बच्चा।
तो हां जी, देखें हमारे तू समने आजा।
अगरचे ज़ोर हमारे नहीं है तन में रहा।
मसूड़ों से ही तेरी हड्डियों को डालूं चबा।
न हम से लड़ कि इसी में तेरी भलाई है॥5॥

अगरचे तू है नया, हम पुराने हैं लेकिन।
नया है नौ ही दिन आखि़र पुराना है सौ दिन।
हज़ार गो कि तेरा ज़ोर पर चढ़ा है सिन।
पै हम न छोड़ें तेरे कान अब मड़ोड़े बिन।
कि तूने आके बहुत धूम यां मचाई है॥6॥

कहा जवानी ने तेरा तो अब है क्या अहवाल।
तू मेरे कान मड़ोड़े कहां यह तेरी मज़ाल।
न तेरे पास तमंचा न तीर, सेफ़ न ढाल।
अभी घड़ी में बिखरता फिरेगा एक एक बाल।
यह डाढ़ी तूने जो मुद्दत में अब बढ़ाई है॥7॥

कहा बुढ़ापे ने सुनकर कि तू अगर है पहाड़।
तो हम भी सूख के झड़बेरी के हुए हैं झाड़।
अभी कहे तो तेरे कपड़े लत्ते डालें फाड़।
ज़रा सी बात में एकदम के बीच लेवें उखाड़।
हर एक मूंछ यह तेरी जो ताव खाई है॥8॥

यह सुनके बोली जवानी कि चल, न कह तू बात।
अभी जो आन के मारूँ तेरी कमर में लात।
कहीं हो पांव, कहीं सर, कहीं पड़ा हो हात।
जिसे तू जीना समझता है, और ख़ुशी की बात।
वह तेरा जीना नहीं है वह बेहयाई है॥9॥

यह सुनके बोला बुढ़ापा कि तूने झूठ कहा।
जो पूछे सच तो हमीं को मज़ा है जीने का।
शराब हो जो पुरानी तो उड़ चले है नशा।
पुराने जब हुए चावल तो है उन्हीं में मज़ा।
क़दीम है यह मसल हमने क्या बनाई है॥10॥

तेरी तो ख़ल्क़ में है चार दिन की सबको चाह।
जहां तू हो चुकी फिर बस वहीं है हाल तबाह।
हमीं हैं वह कि करें हैं तमाम उम्र निबाह।
तू आप ही देख गिरेबां में डाल कर मुंह आह।
कि अब है किस में वफ़ा किस में बेवफ़ाई है॥11॥

जवानी जब तो यह बोली बुढ़ापे से सुनकर।
तेरी वफ़ा से मेरी बेवफ़ाई है बेहतर।
मैं जब तलक हूं, बहारें मजे़ हैं सरतासर।
जो सल्तनत हो घड़ी भर की तो भी है खु़श्तर।
मजे़ तो लूट लिये गो कि फिर गदाई है॥12॥

यह सुनके बोला बुढ़ापा वह सल्तनत है क्या।
कि जिसके साथ लगा हो ज़वाल का धड़का।
हमें मिली वह बुजुर्गी की मंजिलत इस जा।
कि जब तलक हैं रहेंगी हमारे साथ सदा।
खु़दा ने ऐसी हमें दौलत अब दिलाई है॥13॥

कहा जवानी ने चल झूटी अब न कर तकरार।
मेरे तो वास्ते ऐशो तरब है बाग़ो बहार।
शराब नाच मजे गुलबदन गले में हार।
तेरी ख़राबी यह देखी है हमने कितनी बार।
के तूने हर कहीं ज़िल्लत ही जाके पाई है॥14॥

मुझे खु़दा ने दिया है वह मर्तबा और शान।
जिधर को जाऊं उधर ऐश रंग फूल और पान।
उछल है, कूद है, लज़्ज़त, मजे, खुशी के ध्यान।
गले लिपटते हैं महबूब गुल बदन हर आन।
घड़ी-घड़ी की नई सैर ही उड़ाई है॥15॥

कहा बुढ़ापे ने चल झूठ इतना मत बोले।
फ़िदा तू जिनपे है वह मेरे पांव हैं पड़ते।
हमें कहें हैं वह “हज़रत” तुझे कहें हैं ‘अबे’।
हज़ारों बार पड़े तुझ पै लात और घूंसे।
भला बता तू कहीं हमने मार खाई है?॥16॥

तुझे कुचलते हैं वह ख़ूबरू जो लातों में।
हम उनको मार उतारे हैं दम की बातों में।
हम ऐश दिन को उड़ाते हैं और तू रातों में।
करें हैं इश्क़ को हमजिस तरह की घातों में।
तुझे कहां अभी इस बात में रसाई है॥17॥

कि जिनके वास्ते गलियों में फिरे हैं ख़्वार।
हम उनकी लूटें हैं ऐशो तरब के बीच बहार।
तुझे तलाशो तलब में कटे हैं लैलो-निहार।
हम अपनी टट्टी में बैठे ही खेलते हैं शिकार।
तू क्या वह जाने जो कुछ हमने घात पाई है॥18॥

बुढ़ापे ने कहा उस दम जवानी से “बाबा”।
मेरा तो वस्फ़ किताबों में है लिखा हर जा।
बुजुर्गी और मशीख़त बुढ़ापे में है सदा।
तेरी जो बात का मज़कूर है कहीं आया।
तो हर तरीक़ में ख़्वारी ही तुझ पै आई है॥19॥

जुंही जवानी ने ख़्वारी का मुंह से नाम दिया।
बुढ़ापा दौड़ जवानी से बूंही आ लिपटा।
मड़ोड़ी मूंछें इधर उसने दाढ़ी को खींचा।
लड़े जो दोनों बड़ा हर तरफ़ यह शोर मचा।
कि यारो दौड़ियो, फरयाद है दुहाई है॥20॥

खड़े थे लोग हज़ारों यह दोनों लड़ते थे।
घड़ी पछाड़ते थे और घड़ी पछड़ते थे।
जो बाजू छोड़ते थे तो कमर पकड़ते थे।
हर एक तरफ़ से नए घूंसे लात लड़ते थे।
तो सब यह कहते थे क्या इनके जी में आई है॥21॥

यह मार कूट का आपस में जब हुआ चरखा।
“नज़ीर” इसमें वहीं एक अधेड़ पन आया।
कुछ इसको रोका इधर और कुछ उसको समझाया॥
तुम अपने खु़श रहो यह अपने खु़श रहें हर जा॥
मिलाप ख़ूब है, लड़ने में क्या भलाई है॥22॥

(तकब्बुर=घमंड, खु़दनुमाई=आत्म-प्रदर्शन, सरशार=
मस्त, तैश=क्रोध, क़ामत=शरीर,लम्बा डील डौल,
कमां=धनुष की तरह टेढ़ी, वगरना=अन्यथा,नहीं
तो, अजल=मौत, कु़ब्बत=शक्ति, अगरचे=यद्यपि,
सिन=अवस्था,उम्र, झड़बेरी=जंगली बेर, क़दीम=
पुरानी, मसल=कहावत,लोकोक्ति, गिरेबां=कुर्त्ते
कमीज आदि का गला, सरतासर=आदि से अन्त
तक, खु़श्तर=बहुत अच्छी, गदाई=फ़क़ीरी, ज़वाल=
पतन,अवनति, मंजिलत=आदर,सत्कार, ऐशो तरब=
आनन्द,हर्षोल्लास, गुलबदन=फूल जैसे शरीर वाले,
ज़िल्लत=ख़्वारी,अपमान, ख़ूबरू=सुन्दर,रूपवान,
रसाई=पहुंच,प्रवेश, तलब=मांगना,चाहना, लैलो-निहार=
रात-दिन, वस्फ़=गुण,तारीफ़, मशीख़त=बुजुर्गी,
बड़प्पन, मज़कूर=जिक्र, बाजू=बांह)

9. मवाज़नए ज़ोरो कमज़ोरी

ज़ोर जब तक कि हमारे बदनो तन में रहा।
पच गई दम में, अगर कैसी ही असक़ल थी दवा।
खूंदे गुलज़ारो-चमन गुलशनो बाग़ो सहरा।
दौड़े हर सैर तमाशे में खु़शी से हरज़ा।
ज़ोर की खू़बियां लाखों हैं कहूं मैं क्या क्या॥1॥

ऐशो इश्रत के मजे़ जितने कि जब ज़ोर में हैं।
खु़र्रमी खु़शदिलीयो ऐशो तरब ज़ोर में है।
लज़्ज़ते फ़रहते क्या कहिये अजब ज़ोर में हैं।
ज़िन्दगानी के मजे़ जितने हैं सब ज़ोर में हैं।
सच है यह बात कि है ज़ोर ही में ज़ोर मज़ा॥2॥

जब से कमज़ोर हुए तब से हुआ यह अहवाल।
सुस्तियो ज़ोफ़ो क़ाहत की चढ़ाई है कमाल।
हो गये सब वह उछल कूद के नक़्शे पामाल।
अब जो चाहें कि चलें फिर भी इसी तौर की चाल।
क़स्द करते हैं बहुत पर कहीं जाता है चला॥3॥

पानी पीते हैं तो बलग़म वह हुआ जाता है।
और दही चक्खे़ तो छींकों का मंढा छाता है।
पीवें शर्बत तो हवा ज़दगियां वह लाता है।
और जो कम खायें तो फिर जोफ़ से ग़श आता है।
पेट भर खावें तो फिर चाहिए चूरन को टका॥4॥

राह चलने में यह कुछ जोफ़ से होते हैं निढाल।
हर कदम आते हैं पा बोस को सौरंजो मलाल।
औरटुक तुंद हवा चलने लगी तो फ़िलहाल।
चलनी पड़ती है फिर उस वक़्त तो उस तौर की चाल।
जैसे कैफ़ी कोई चलता है बहुत पीके नशा॥5॥

ऊंची नीची जो ज़मीं आ गई रस्ते में कहीं।
उसकी यह शक्ल है क्या कहिये नक़ाहत के तईं।
यक बयक दोनों से गुज़रे तो यह ताक़त ही नहीं।
उतरें नीचे को तो गिर पड़ने के होते हैं क़रीं।
और जो ऊंचे पे रक्खें पांव दम आता है चढ़ा॥6॥

आवे गर जाड़े का मौसम तो ख़राबी यह हो।
पहने नौ सेर रुई की जो बनाकर दोतो।
तो भी हरगिज़ गुल गरमी की नहीं आती बो।
हो बदन सरद कि खूं इसमें हो ऐसा जिस को।
देखे गर बर्फ़ का थैला तो रहे सर को झुका॥7॥

और अयां होवे जो टुक आगे हवा गरमी की।
उसमें कुछ और ही होती है नक़ाहत सुस्ती।
मोम होते हैं जहां तन को ज़रा धूप लगी।
और पसीनों में यह सूरत है बदन की होती।
जैसे ग़व्वास समुन्दर में लगावे गोता॥8॥

जोफ़ के दाम में हैं अब तो कुछ इस तौर असीर।
जिसमें न ताक़ते तहरीर न ताबे तक़रीर।
ताब अफ़्सुर्द दिल वाज़र्द बदन सख़्त हकीर।
जो जो कमज़ोरियां करती हैं वह क्या कहिये “नज़ीर”?।
ऐसे बेबस हैं कि कुछ दम नहीं मारा जाता॥9॥

(असक़ल=भारी, गुलज़ारो-चमन=बाग़, सहरा=जंगल, हरज़ा=
हर जगह, खु़र्रमी=खु़शी, ऐशो तरब=आनन्द, फ़रहते=खुशियां,
ज़ोफ़ो=बुढ़ापा, क़ाहत=कमजोरी, पामाल=बरबाद, क़स्द=इरादा,
कैफ़ी=मतवाला,मत्त, नक़ाहत=कमज़ोरी, तईं=लिए, क़रीं=
समीप, दोतो=दोता,एक तरह की पोशाक, गुल गरमी=गर्मी
के फूल, अयां=प्रकट, ग़व्वास=गोताखोर, दाम=बन्धन, असीर=
कैदी,बंदी, तहरीर=लिखना, तक़रीर=बोलना, ताब=शक्ति,
अफ़्सुर्द=ठिठरा हुआ,नष्ट, वाज़र्द=सताया हुआ,पीड़ित, हकीर=
तुच्छ,बहुत छोटा)

10. लूली पीर (बूढ़ी वेश्या)

$ $ जो $ $ $ कोई हो जाती है बुढ़िया।
फिर जान कहलाने से यह शरमाती है बुढ़िया॥
हर काम में हर बात में शरमाती है बुढ़िया।
दिन रात इसी सोच में ग़म खाती है बुढ़िया॥
सर धुनती है, उकसाती है, घबराती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥1॥

जब पेट मलाई सा वह देता था दिखाई।
खाने को चली आती थी मिश्री व मलाई॥
और आके बुढ़ापे की हुई जबकि चढ़ाई।
सब उड़ गई काफ़िर, वह मलाई व मिठाई॥
इस ग़म से न पीती है, न कुछ खाती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥2॥

वह हुस्न कहां जिस से कोई पास बिठावे।
छाती वह कहां जिसपे कोई हाथ चलावे॥
जब सूख गया मुंह तो झमक ख़ाक दिखावे।
आशिक़ तो जवां काहे को फिर नाज़ उठावे॥
बूढ़े को भी हरगिज़ नहीं खुश आती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥3॥

जब मुंह में न हो दांत तो मिस्सी मले क्या ख़ाक।
और सर के झड़े बाल तो कंधी करे क्या ख़ाक॥
पलकों में सफ़ेदी हो तो काजल लगे क्या ख़ाक।
जब नाक ही सूखी हो तो फिर नथ खुले क्या ख़ाक॥
इस ख़्वारी, ख़राबी में फिर आ जाती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥4॥

जब तक कि नई उम्र थी चढ़ती थी जवानी।
हर कोई यह कहता था ‘कहां जाती हौ जानी’॥
जब बूढ़ी हुई फिर लगीं कहलाने पुरानी।
ठहरी कहीं ‘खाला’ कहीं ‘दादी’ कहीं ‘नानी’॥
हैं नाम तो अच्छे यह कि शरमाती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥5॥

बुढ़िया को बुढ़ापे में यह दुख होता है लेना।
नोची को किसी ढब की नसीहत हो जो देना॥
मुंह पीट वह हमसाये से कहती है कि भैना।
नाहक़ की लड़ाई है, न लेना है न देना॥
एक चार घड़ी से मुझे पुनवाती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥6॥

टुक देखियो! यारो! यह बुढ़ापे की है ख़्वारी।
हमसाये के सुनते ही लगी दिल में कटारी॥
नोची की तरफ़दार हो घर में से पुकारी।
क्या बात हुई तुझ से वह कुछ मुझको बतारी॥
जिस बात पे दोपहर से टर्राती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥7॥

सह कहती है ‘भैना’ यह गुजरती नहीं ढड्डो।
और क़हर खु़दा से भी यह डरती नहीं ढड्डो॥
लब अपने ज़रा बंद यह करती नहीं ढड्डो॥
इस हाल को आखि़र को पहुंच जाती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥8॥

ऐसा जो मेरे पास लगे जायगी झांपो।
एक रोज़ मुझे घर से निकलवायेगी झांपो॥
सब खा चुकी मुझको भी यह अब खायेगी झांपो।
वह कौन सा दिन होगा जो मर जायेगी झांपो॥
अब तो मुझे डायन सी नज़र आती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥9॥

नोची जो वफ़ादार कोई पास रही आ।
तो रोटी मिली वर्ना लगी कातने चरखा॥
जब कुबड़ी कमर हो गई और सर हुआ गाला।
मुंह सूख के चमरख़ हुआ और तन हुआ तकला॥
फिर रोटी को चरखे़ से कमा खाती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥10॥

क्या वक़्त बुढ़ापे का बुरा होता है ‘वल्लाह’।
बेगाने तो क्या अपने को फिर होती नहीं चाह॥
इस ख़्वार ख़राबी से भी सह कर ग़मे जांकाह।
रुक-रुक के जवानी की मुसीबत में ‘नज़ीर’ आह॥
आखि़र को इसी सोच में मर जाती है बुढ़िया।
यह दर्द वही जाने जो हो जाती है बुढ़िया॥11॥

($=कुल्लियातों में $ चिह्न वाले स्थान
खाली हैं, नथ खुले क्या ख़ाक=तबायफ़ों में
यह रिवाज है कि जवान लड़की की नथ
किसी सम्पत्तिशाली प्रेमी द्वारा खुलवाई
जाती है। वह नथ खोलने की रस्म अदा
करने के बदले में लड़की को खूब धन
दौलत देता है, नोची=नवयुवती, पुनवाती=
गालियाँ सुनवाना)

11. सच्चे नफ़्श कुश (हीजड़े)

बेटा हुआ किसी के जो सुन पावें हीजड़े।
सुनते ही उसके घर में फिर आजावें हीजड़े॥
नाचें बजाके तालियां और गावें हीजड़े।
ले लेके बेल भाव भी बतलावें हीजड़े॥
उसके बड़े नसीब जहां जावें हीजड़े॥

ज़ाहिर में गरचे पेट के अपने मजूरे हैं।
पर दिल में अपने फ़क्र के गहने को घूरे हैं॥
$ $ न इनके पास न दोनों $ $ हैं।
ख़ासे लंगोट बंद खु़दा के यह पूरे हैं॥
बेटा दुआ से बाँझ के जनवावें हीजड़े॥

पूरे फ़कीर नफ़्स कुशी का करें है शग़ल।
इनमें भी बाजे़ रखते हैं कितने खु़दा के वस्ल॥
जो नफ़्स मारते हैं वह करते हैं उनकी नक़्ल।
सच पूछिये तो नफ़्स उन्होंने किया है कत्ल॥
क्या मर्दमी कि मर्द हैं कहलावें हीजड़े॥

यूं देखने में गरचे यह हल्के से माल हैं।
नाचे हैं नेग जोग का करते सवाल हैं॥
हमको तो पर उन्हों से अदब के ख़याल हैं।
अक्सर उन्हों के भेस में साहिब कमाल हैं॥
जो कुछ मुराद मांगो यह बर लावें हीजड़े॥

बातें भी उनकी साफ़ हैं मिलना भी साफ़ है।
सीना भी उनका आइना मुखड़ा भी साफ है॥
ज़ाहिर भी उनका साफ़ है जेवडा भी साफ़ है।
आगा भी उनका साफ़ है पीछा भी साफ़ है॥
जब ऐसे जिन्दा दिल हों तो कहलावें हीजड़े॥

चलते हैं अपने हाल में क्या क्या मटकती चाल।
कुछ ऊंची ऊंची चोलियां कुछ लम्बे लम्बे बाल॥
आता है उनको देख मुजर्रद के दिल को हाल।
$ $ को लात मारके एक दम में दे निकाल॥
वह मरदुआ कि जिसके तई भावें हीजड़े॥

यह जान छल्ले अब जो कहाते हैं खु़श सफ़ीर।
है दिल हमारा उनकी मुहब्बत में अब असीर॥
मुद्दत से हो रहा है इरादा यह दिल पज़ीर।
अल्लाह हमें भी देवे जो बेटा तो ऐ ”नज़ीर“॥
हम भी बुला के खू़ब से नचवावें हीजड़े॥

(नफ़्श कुश=इन्द्रिय-दमन, मुजर्रद=एकाकी,
अविवाहित, सफ़ीर=शुभ-संदेशक, असीर=कै़द)

12. समधिन-1

करूं किस मुंह से ये यारो बयां मैं शान समधिन की।
लगी है अब तो मेरे दिल को प्यारी आन समधिन की॥
चमन में हुस्न के हों उसके रुख़ और जुल्फ़ पर कु़बाँ।
अगर देखें ज़रा सूरत गुले रेहान समधिन की॥
कमर नाजु़क मटकती चाल आंखें शोख़, तन गोरा।
नज़र चंचल, अदा अछपल, यह है पहचान समधिन की॥
सुनहरी ताश का लंहगा, रुपहली गोट की अंगिया।
चमकता हुस्न जोवन का, झमकती आन समधिन की।
मलाई सा शिकम, सीना मुसफ़्फ़ा, खु़शनुमा साके़ं।
सफ़ा जानू का आईना, मुलायम रान समधिन की॥
कहूं कुछ और भी आगे जो समधिन हुक्म फ़रमावें।
सिफ़त मंजूर है हमको तो अब हर आन समधिन की॥
बड़ा ऐहसान मानें हम तुम्हारा आज समधी जी।
मयस्सर हो अगर सोहबत हमें एक आन समधिन की॥
हमें एक दो घड़ी के वास्ते दूल्हा दिला दो तुम।
जो कुछ लंहगे के अन्दर चीज़ है पिनहान समधिन की॥
नज़ीर अब आफ़रीं है यार तेरी तब्अ को हर दम।
कही तारीफ़ तूने खू़ब आलीशान समधिन की॥

(गुले रेहान=एक सुगन्धित फूल, शिकम=पेट,
मुसफ़्फ़ा=स्वच्छ, खु़शनुमा साके़ं=पिंडलियाँ,
जानू=जाँघ, मयस्सर=उपलब्ध, पिनहान=गुप्त,
आफ़रीं=शाबाश, तब्अ=प्रकृति)

13. समधिन-2

सरापा हुस्ने समधिन गोया गुलशन की क्यारी है।
परी भी अब तो बाजी हुस्न में समधिन से हारी है।
खिची कंघी, गुंथी चोटी, अभी पट्टी लगा काजल।
कमां अब्रू नज़र जादू निगह हर एक दुलारी है।
जबी माहताब, आंखें शोख़, शीरीं लब, गोहर दन्दा।
बदन मोती, दहन गुंचा, अदा हंसने की प्यारी है।
नया कमख़्वाब का लहंगा झमकते ताश की अंगिया।
कुचें तस्वीर सी जिन पर लगा गोटा किनारी है।
मुलायम पेट मख़मल सा कली सी नाफ़ की सूरत।
उठा सीना सफ़ा पेडू़ अजब जोवन की नारी है।
लटकती चाल मदमाती चले बिछुओं को झनकाती।
भरे जोवन में इतराती झमक अंगिया की दिखलाती।
कमर लहंगे से बल खाती लटक घूंघट की भारी है।

(सरापा=सिर से पैर तक का,शिखनख, कमां अब्रू=
भवें कमान की तरह, जबीं=ललाट, माहताब=चांद,
गोहर दन्दा=मोती जैसे दांत, नाफ़=नाभि, बिछुआ=
पैर की उंगलियों में पहने जाने वाला जेवर)

नारी श्रृंगार : नज़ीर अकबराबादी (Nari Shringar : Nazeer Akbarabadi)

1. मेंहदी-1

तुमने हाथों में सनम जब से लगाई मेंहदी।
रंग में हुस्न के फूली न समाई मेंहदी॥1॥
किस तरह देखके दिल पर न क़यामत गुज़रे।
एक तो हाथ ग़ज़ब जिस पै रचाई मेंहदी॥2॥
दिल धड़कता है मेरा आज खु़दा खैर करे।
देख करती है यह किस किससे लड़ाई मेंहदी॥3॥
दिल तड़फता है मेरा जिससे कि मछली की तरह।
इस तड़ाके की वह चंचल ने लगाई मेंहदी॥4॥
हुस्न मेंहदी ने दिया आपके हाथों को बड़ा।
ऐसे जब हाथ थे जिस हक़ ने बनाई मेंहदी॥5॥
क्या खता हमसे हुई थी कि हमें देखकर आह।
तुमने ऐ जान दुपट्टा में छिपाई मेंहदी॥6॥
ग़श हुए, लोट गए, कट गए, बेताब हुए।
उस परी ने हमें जब आके दिखाई मेंहदी॥7॥
देखे जिस दिन से वह मेंहदी भरे हाथ उसके “नज़ीर”।
फिर किसी की हमें उस दिन से न भाई मेंहदी॥8॥

2. मेंहदी-2

मियां यह किस परी के हाथ पर आशिक़ हुई मेंहदी।
कि बालिन में हुई है सुर्ख़ ज़ाहिर में हरी मेंहदी॥
करे खूनीं दिलों से क्यूं न हर दम हमसरी मेंहदी।
कही, कुचली गई, टूटी, छनी, भीगी, पिसी, मेंहदी॥
जब इतने दुख सहे तन उसके हाथों में लगी मेंहदी॥1॥

हिना की मछलियां उसके कफ़े रंगी में जो देखीं।
निगाह में आनकर उस दम अ़जब रंगीनियां झमकीं॥
कहूं क्या-क्या मैं उस मेंहदी भरे हाथों की अब तेज़ी।
शफ़क़ में डूब कर जूं पंजए-ख़ुरर्शीद हो रंगी॥
चमक में रंग में सुर्खी में कुछ ऐसी ही थी मेंहदी॥2॥

हतेली चांद सी हो जिन की और नाखु़न सितारे हों।
वह पतली उंगलियां जिनसे नज़ाकत के सहारे हों॥
तलाईनुक़रई हीरों के छल्लों के करारे हों।
जो गोरे गोरे हाथ और नर्मोनाजु़क प्यारे प्यारे हों॥
तो बस वह जान हैं मेंहदी की और उनका है जी मेंहदी॥3॥

वह पहुंचे जिनमें पहुंची सो नियाज़ोइज्ज़ से पहुंची।
और इन पोरों के मिलने से बढ़ी है शान छल्लों की॥
अ़जब तुम भीगती हो और अबस पत्थर से हो पिसती।
कफ़ेनाजुक पर उसके तो है असली रंग की सुर्ख़ी॥
तुम्हारी दाल यां गलती नहीं सुनती हो बी मेंहदी॥4॥

जो देखा मैंने उस मेंहदी भरे हाथों का हिल जाना।
अंगूठी बांक छल्ले आरसी का फिर नज़र आना॥
मेरा दिल हो गया उस शम्मा रू चंचल का परवाना।
भला क्यूंकर न हूं यारो मैं उसको देख दीवाना॥
कि होवें जिस परी के परी हाथ और परी मेंहदी॥5॥

यकायक देखकर मुझको वह चंचल नाज़नी भरमी।
उधर मैंने भी देखा खू़ब उसको करके बेशर्मी॥
कहूं क्या क्या मैं उसकी अब नज़ाकत वाह और नरमी।
हुई यां तक उसे मेरी निगाहे गर्म की गर्मी॥
कि दस्ती पा में उसके देर तक मसली गई मेंहदी॥6॥

कहां तक गुलइज़ारों के भी हाथों को रसाई है।
कि जिनके वास्ते अल्लाह ने मेंहदी बनाई है॥
यह सुर्खी लाल ने पंजएमरजां ने पाई है।
“नज़ीर” उस गुलबदन ने और ही मेंहदी लगाई है॥
मुबारक बाद अच्छा वाह वा ख़ासी रची मेंहदी॥7॥

(बालिन=गुप्त रूप, हमसरी=बराबरी, पंजए-ख़ुरर्शीद=
सूर्य का हाथ, तलाईनुक़रई=सोने-चांदी की, नर्मोनाजु़क=
अत्यन्त कोमल, नियाज़ोइज्ज़=नम्र निवेदन, कफ़ेनाजुक=
कोमल हाथ, पंजएमरजां=मूँगे के हाथ)

3. हिना (मेंहदी)

कुछ दिल फ़रेब हाथ वह कुछ दिल रुवा हिना।
लगती है उस परी की अ़जब खु़शनुमा हिना॥
देखे हैं जब से दिल ने हिनाबस्ता उसके हाथ।
रातों को चौंक पड़ता है कह कर हिना हिना॥
है सुर्ख़ यां तलक कि जो छल्दे हैं नक़रई।
करती है उसके हाथ में, उनको तिला हिना॥
यह फ़नदकें नहीं मेरे क़ातिल के हाथ में।
होती है पोर पोर पै उसके फ़िदा हिना॥
खू़ने शफ़क़ में पंजए खु़र्शीद रश्क से।
डूबा ही था अगर वह न लेता छुपा हिना॥
गुरफ़े से हाथ खोल के और फिर लिया जो खींच।
बिजली सी कुछ चमक गई काफ़िर बला हिना॥
शब के खि़लाफ़ेवादा का जब बन सका न उज्ऱ।
नाचार फिर तो हंस दिया और दिखा दी हिना॥
कल मुझसे हंस के उस गुले ख़ूबी ने यूं कहा।
पांव में तू ही आज तो मेरे रचा हिना॥
वह छोटी प्यारी उंगलियां वह गोरे गोरे पांव।
हाथों में अपने ले, मैं लगाने लगा हिना॥
उस वक़्त जैसी निकलीं मेरी हसरतें “नज़ीर”।
इन लज़्ज़तों को दिल ही समझता है या हिना॥

(हिनाबस्ता=मेंहदी लगे, गुरफ़े=खिड़की,
शब=रात, खि़लाफ़ेवादा=वायदे के विरुद्ध,
उज्ऱ=बहाना,कारण)

4. मोती-1

रहे हैं अब तो पास उस शोख़ के शामो सहर मोती।
ज़बीं पर मोती और बेसर में मोती मांग पर मोती॥
इधर जुगनू, उधर कुछ बालियों में जलवागर मोती।
भरे हैं उस परी में अब तो यारो सर बसर मोती॥
गले में कान में नथ में जिधर देखो उधर मोती॥

कोई उस चांद से माथे के टीके में उछलता है।
कोई बुन्दों से मिलकर कान की नर्मों में मिलता है॥
लिपट कर धुगदुगी में कोई सीने पर मचलता है।
कोई झुमकों में झूले हैं कोई बाली में हिलता है॥
यह कुछ लज़्ज़त है जब अपना छिदावे है जिगर मोती॥

कभी वह नाज़ में हंसकर जो कुछ बातें बनाती है।
तो एक एक बात में मोती को पानी में बहाती है॥
अदाओ नाज में चंचल अ़जब आलम दिखाती है।
वह सुमरन मोतियों की उंगलियों में जब फिराती है॥
तो सदके उसके होते हैं पड़े हर पोर पर मोती॥

ग़लत है उस लबे-रंगीं को बर्गे-गुल से क्या निस्बत।
कि जिनकी है अक़ीक़ और पन्ने और याकू़त को हसरत॥
उदाहट कुछ मिसी की, और कुछ उस पर पान की रंगत।
वह हंसती है तौ खिलता है जवाहर ख़ानऐ कु़दरत॥
इधर लाल और उधर नीलम, इधर मरजां उधर मोती॥

कभी जो बाल बाल अपने में वह मोती पिरोती है।
नज़ाकत से अर्क़ की बूंद भी मुखड़े को धोती है॥
बदन भी मोती, सर ता पांव से पहने भी मोती है।
सरापा मोतियों का फिर तो एक गुच्छा वह होती है॥
कि कुछ वह खु़श्क मोती, कुछ पसीने के बह तर मोती॥

गले में उसके जिस दम मोतियों के हार होते हैं।
चमन के गुल सब उसके वस्फ़ में मोती पिरोते हैं॥
न तनहा रश्क से क़तराते शबनम दिल में रोते हैं।
फ़लक पर देख कर तारे भी अपना होश खोते हैं॥
पहन कर जिस घड़ी बैठे हैं वह रश्के क़मर मोती॥

वह जेवर मोतियों का वाह, और कुछ तन वह मोती सा।
फिर उस पर मोतिया के हार, बाजू बंद और गजरा॥
सरापा जे़बो ज़ीनत में वह अ़ालम देख कर उसका।
जो कहता हूं अरे ज़ालिम, टुक अपना नाम तो बतला॥
तो हंसकर मुझसे यूं कहती है वह जादू नज़र ‘मोती’॥

कड़े पाजे़ब, तोड़े जिस घड़ी आपस में लड़ते हैं।
तो हर झनकार में किस-किस तरह बाहम झगड़ते हैं॥
किसी दिल से बिगड़ते हैं, किसी के जी पे अड़ते हैं।
कड़े सोने के क्या मोती भी उसके पांव पड़ते हैं॥
अगर बावर नहीं देखो हैं उसकी कफ़्श पर मोती॥

ख़फ़ा हो इन दिनों कुछ रूठ बैठी है जो हम से वह।
तो उसके ग़म में जो हम पर गुजरता है सो मत पूछो॥
चले आते हैं आंसू, दिल पड़ा है हिज्र में ग़श हो।
वह दरिया मोतियों का हम से रूठा हो तो फिर यारो॥
भला क्यूंकर न बरसावे हमारी चश्मेतर मोती॥

शफ़क इत्तिफ़ाक़न जैसे सूरज डूब कर निकले।
व या अब्रे गुलाबी में कहीं बिजली चमक जावे॥
बयां हो किस तरह से, आह उस आलम को क्या कहिये।
तबस्सुम की झलक में यूं झमक जाते हैं दांत उसके॥
किसी के यक बयक जिस तौर जाते हैं बिखर मोती॥

हमें क्यूंकर परीज़ादों से बोसों के न हों लहने।
जड़ाऊ मोतियों के इस सग़जल पर बारिये गहने॥
सखु़न की कुछ जो उसके दिल में है उल्फ़त लगी रहने।
“नज़ीर” इस रेख़्ता को सुन वह हंस कर यूं लगी कहने॥
अगर होते तो मैं देती तुम्हें एक थाल भर मोती॥

(जलवागर=शोभायमान, लबे-रंगीं=सुरंग होंठ,
बर्गे-गुलगुलाब की पंखुड़ी, निस्बत=सम्बन्ध,
जवाहर ख़ानऐ कु़दरत=प्रकृति का रत्नागार,
मरजां=मूँगा, शबनम=ओस की बूंदें, बाहम=
परस्पर, कफ़्श=पादुका,जूता, चश्मेतर=सजल
नयन, शफ़क=शाम की लालिमा, इत्तिफ़ाक़न=
अकस्मात्, तबस्सुम=मुस्कान)

5. मोती-2

परीज़ादों में है नामे खु़दा जिस शान पर मोती।
कोई ऐसा नहीं मोती, मगर मोती, मगर मोती॥
झमक जावे निगाहों में जवाहर ख़ानए कु़दरत।
जो खा कर पान और मल कर किसी हंस दे मगर मोती॥
रगेगुल इस कमर के सामने भरती फिरे पानी।
लचक में और नज़ाकत में जो रखती है कमर मोती॥
इधर हर एक मकां पर मोतियों के ढेर हो जावें।
अदा से नाज़ से हंस कर क़दम रक्खे जिधर मोती॥
सदा सुनकर हर एक की चश्म से मोती टपकते हैं।
फ़क़त बैठे हो गाने में यह रखती है असर मोती॥

अ़जब नक़शा अ़जब सज धज अ़जब आंखें अ़जब नज़रें।
बड़े ताले बड़ी किस्मत जो देखे एक नज़र मोती॥
शरफ़ पन्ने को पन्ने पर शरफ़ हीरे को हीरे पर।
शरफ़ शरफन को लालों पर, रही है जिसके घर मोती॥
हर एक दन्दान मोती, हुस्न मोती, नाम भी मोती।
सरापा चश्म मोती, तिस पै पहने सरबसर मोती॥
जो खू़बां बेनज़ीर इस दौर में हैं नाजुको रंगी।
शरफ़ रखती है यारो, अब तो सबके हुस्न पर मोती॥

(रगेगुल=फूल की नस, ताले=भाग्य, शरफ़=श्रेष्ठता,
सरापा=सर से पैर तक, खू़बां=सुन्दरियाँ)

6. बाला-1

अ़जब ढंग से चमकता है वह बाला उसके बाला सा।
कि हर झोंक में होता है वह बिजली का उजाला सा॥

न बाला ही फ़क़त कुछ दिल को भटकाने में डाले है।
जो देखा खूब तो बाली भी बहलगती है बाला सा॥

वह बाला सा कद उसका और वह बाला कान का यारो।
करे हैं उस परी के बाले जोबन को दोबाला सा॥

न झमकों ही की झोंकें तीर सी लगती हैं सीने में।
करनफूलों की नोंकें भी लगा जाती हैं भाला सा॥

मुझे कल इत्तफ़ाकन देख उस ऐयार ने पूछा?
कि उसकी चश्म से बहता है क्यों अश्कों का नाला सा॥

अगर चाहे कि हमको दाम में लावे तो क्या कु़दरत।
कहां हम हुस्न के शेर और कहां मकड़ी का जाला सा॥

किसी ने कह दिया उससे “नज़ीर” इसको ही कहते हैं।
परों पर आज परियों के हैं उसके इश्क का लाला॥

जहां गोरा बदन और चांद सा रुख़सार होता है।
तो वां यह शख़्स भी रहता है उसके गिर्द हाला सा॥

बड़े हैं खू़बरू हैं इस से डरते हैं तो तुम क्या हो।
तुम्हें तो जानता है एक हलुए के निबाला सा॥

इसे हलका न जानो तुम अजी साहब क़यामत है।
यह ठिगना सा, यह दुबला सा, यह सूखा सा यह काला सा॥

7. बाला-2

कुछ आप परी कुछ वह परी कान का बाला।
हो नामे खु़दा क्यों न तेरा हुस्न दो बाला॥

है वह तो मेरी जान कि आगे को तेरे बन कर।
चलता है जिलों में तेरे परियों का रिसाला॥

बाली तो पड़ी कान में छेदे कि कलेजा।
बाले की तिलावट ने तो बस मार ही डाला॥

सूरज को शफ़क़ शाम के पर्दे में छिपा ले।
तू ओढ़ के निकले जो कभी सुर्ख़ दुशाला॥

आँखों में चमकता है सितारा सा सहर को।
सीने की सफा पर तेरे जुगनूं का उजाला॥

पत्ती की जमावट की तरह और है काफ़िर।
चोटी की गुदावट का कुछ आलम है निराला॥

मांगा जो मैं बोसा तो मटक कर कहा है वाह।
क्या तू ही नया है मेरा एक चाहने वाला॥

अँगिया की खिचावट ने दिल खींच के बांधा।
पर जाली की कुर्ती ने बड़े जाल में डाला॥

पहुंचा जो मेरा हाथ शिकम पर तो यह समझा।
मख़मल है मलाई है या रेशम का है गाला॥

इस बात को पूछा तो लगी कहने झमक कर।
चल दूर मेरी जूती यह सहती है कसाला॥

तू इश्क में बूढ़ा भी हो तो भी “नज़ीर” आह।
अब तक तेरी बातों में टपकता है छिनाला॥

8. बाला-3

अब तो हर शोख़ परीवश ने संभाला बाला।
हर कहीं ज़ोर दिखाता है उजाला बाला।
सबके बालों से तुम्हारा है निराला बाला।
तुमने जिस दिन से सनम कान में डाला बाला।
हो गया चांद से रुख़सार का हाला बाला॥

आई वह शोख़ जो कल नाज़ो अदा से इस जा।
थी वह सज धज कि परी देख के हो जाये फ़िदा।
फुरतियां ग़म्ज़ों की अब उसके कहूँ मैं क्या-क्या।
नौके मिज़गां को ख़बर होने न दी आह ज़रा।
दिल को यूं उसकी निगाह ले गई बाला बाला॥

चाल चलती है अ़जब आन से यह नाज भरी।
हर क़दम पर मेरे सीने में है ठोकर लगती।
मस्तियां वाह मैं क्या-क्या कहूं इस जोबन की।
जब हिलाती है सुराही सी वह गर्दन अपनी।
नशए हुस्न को करता है दो बाला बाला॥।

उसकी पलकों की जो लगती है मेरे दिल में नोक।
ऐ दिल उस शोख़ के तू बाले से जोबन को न टोक।
आह सीने में करूं अपने मैं किस किस की रोक।
एक तो क़हर है कानों में किरन फूल की झोक।
तिस पे काफ़िर है जिगर छेदने बाला बाला॥

बाले भटकावे के अन्दाज थे करते क्या क्या।
जुज़ खि़जल होने के कुछ जी न बन आता था।
यह जो हर झोंक में है अपनी झलक दिखलाता।
ऐ दिल उस बाले की हरगिज़ तू लगावट पे न जा।
तुझको बतलावेगा बाली पै यह बाला बाला॥

जब वह बन ठन के निकलते हैं बना हुस्न की शान।
उसकी हर आन पे होती है फ़िदा मेरी जान।
तर्ज़ चितवन की लगावट में दिखा सहरे निशान।
वह भी क्या आन का ढब है कि दिखाता हर आन।
कान के पास से सरका के दोशाला बाला॥

हो गया जब से दिल उस शोख़ के बाले में असीर।
कोई बन आती नहीं वस्ल की उसके तदबीर।
यां तक उस बाले ने की है मेरे जी में तासीर।
अब तो रह रह के मेरा दिल यही कहता है “नज़ीर”।
एक नज़र चलके मुझे उसका दिखा ला बाला॥

(परीवश=अप्सरा जैसी सुन्दर, फ़िदा=मुगध,
जुज़=अतिरिक्त्, खि़जल=लज्जित होना,
सहरे=जादुई, असीर=कै़द, वस्ल=मिलन)

9. अंगिया

सफ़ाई उसकी झलकती है गोरे सीने में।
चमक कहां है यह अलमास के नगीने में॥
न तूई है, न किनारी, न गोखरू तिस पर।
सजी है शोख़ ने अंगिया बनत के मीने में॥
जो पूछा मैं कि “कहां थी” तो हंस के यों बोली।
मैं लग रही थी इस अंगिया मुई के सीने में॥
पड़ा जो हाथ मेरा सीने पर तो हाथ झटक।
पुकारी आग लगे आह! इस करीने में॥
जो ऐसा ही है तो अब हम न रोज़ आवेंगे।
कभू जो आए तो हफ़्ते में या महीने में॥
कभू मटक, कभू बस बस, कभू प्याला पटक।
दिमाग करती थी क्या क्या शराब पीने में॥
चढ़ी जो दौड़ के कोठे पे वह परी इक बार।
तो मैंने जा लिया उसको उधर के ज़ीने में॥
वह पहना करती थी अंगिया जो सुर्ख़ लाही की।
लिपट के तन से वह तर हो गई पसीने में॥
यह सुर्ख़ अंगिया जो देखी है उस परी की “नज़ीर”।
मुझे तो आग सी कुछ लग रही है सीने में॥

10. इज़ारबन्द (कमरबन्द)

छोटा बड़ा न कम, न मंझौला इज़ार बंद।
है उस परी का सबसे अमोला अज़ार बंद॥
हर एक क़दम पे शोख़ के ज़ानू के दरमियां।
खाता है किस झलक से झकोला इज़ार बंद॥
गोटा, किनारी, बादला, मुक़्के़श के सिवा।
थे चार तोले मोती, जो तोला इज़ार बंद॥
हंसने में हाथ मेरा कहीं लग गया तो वह।
लौंडी से बोली “जा मेरा धोला इज़ार बंद”॥
“और धो नहीं, तो फेंक दे, नापाक हो गया”।
वह दूसरा जो है, सो पिरो ला इज़ार बंद॥
एक दिन कहा यह मैंने कि ऐ जान, आपका।
हमने कभी मजे़ में न खोला इज़ार बंद॥
सुनकर लगी यह कहने कि “ऐ वा छड़े च खु़श”।
ऐसा भी क्या मैं रखती हूं पोला “इज़ार बंद”॥
आ जावे इस तरह से जो अब हर किसी के हाथ।
वैसा तो कुछ नहीं मेरा भोला इज़ार बंद॥
एक रात मेरे साथ वह अय्यार, मक्रबाज़।
लेटी छुपा के अपना ममोला इज़ार बंद॥
जब सो गई तो मैंने भी दहशत से उसकी आ।
पहले तो चुपके चुपके टटोला इज़ार बंद॥
आखि़र बड़ी तलाश से उस शोख़ का “नज़ीर”।
जब आधी रात गुज़री तो खोला इज़ार बंद॥

11. पहुंची

क्यों न उसकी हो दिलरुवा पहुंची।
जिसके पहुंचे पै हो किफ़ा पहुंची।
गर पहुंच हो तो हम मलें आँखें।
ऐसी इसकी है खु़शनुमा पहुंची।
दिल को पहुंचे है रंज क्या-क्या वह।
अपनी लेता है जब छिपा पहुंची।
एक छड़ी गुल की भेजकर इसको।
फ़िक्र थी वह न पहुंची या पहुंची।
सुबह पूंछी रसीद जब तो “नज़ीर”।
दी हमें शोख ने दिखा पहुंची॥

12. आरसी

बनवा के एक आरसी हमने कहा कि लो।
पकड़ी कलाई उसकी जो वह शाख़सार सी।
लेकर बड़े दिमाग और देख यक बयक।
त्योरी चढ़ा के नाज़ में कुछ करके आरसी।
झुंझला के दूर फेंक दी और यूं कहा चै खु़श।
हम मारते हैं ऐसी अंगूठे पै आरसी।

(शाख़सार=शाख़ जैसी,कोमल)

13. आईना

ले आईने को हाथ में, और बार बार देख।
सूरत में अपनी कु़दरते परवरदिगार देख॥
ख़ालेस्याह और ख़तेमुश्कबार देख।
जुल्फ़े दराज तुर्रए अम्बर निसार देख॥
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥1॥

आईना क्या है? जान, तेरा पाक साफ़ दिल।
और ख़ाल क्या हैं? तेरे सुवैदा के रुख के तिल॥
जुल्फ़े दराज, फ़हमरसा से, रही हैं मिल।
लाखों तरह के फूल रहे हैं तुझी में खिल॥
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥2॥

मुश्के ततारो मुश्के ख़ुतन, भी तुझी में है।
याकू़त सुखऱ्ो लाल यमन भी तुझी में है।
नसरीनो मोतियाओ समन भी तुझी में हैं।
अलक़िस्सा क्या कहूं मैं, चमन भी तुझी में है।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥3॥

सूरजमुखी के गुल की अगर दिल में ताब है।
तू अपने मुंह को देख, कि खु़द आफ़ताब है।
गुल और गुलाब का भी तुझी में हिसाब है।
रुख़सार तेरा गुल है, पसीना गुलाब है।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥4॥

नरगिस के फूल पर, तू न अपना गुमान कर।
और सर्व से भी दिल न लगा अपना जान कर।
अपने सिवा किसी पे, न हरगिज तू ध्यान कर।
यह सब समा रहे हैं तुझी में तो आन कर।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥5॥

नरगिस वह क्या है? जान तेरी चश्मे खु़श निगाह।
और सर्व क्या है? यह तेरा क़द्देदराज़ आह।
गर सैरे बाग़ चाहे, तो अपनी ही कर तू चाह।
हक़ ने तुझी को बाग़, बनाया है वाह वाह।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥6॥

गर दिल में तेरे कु़मारियो बुलबुल का ध्यान है।
तो होंठ तेरे कु़मरी हैं, बुलबुल जुबान है।
है तू ही बाग़ और तू ही बाग़बान है।
बाग़ो चमन हैं जितने, तू उन सबकी जान है।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥7॥

बेला, गुलाब, सेवती, नसरीनौ नस्तरन।
दाऊदी, जूही, लालाओ, राबेल यासमन।
जितनी जहां में फूली हैं, फूलों की अंजुमन।
यह सब तुझी में फूल रही हैं चमन चमन।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥8॥

बाग़ो चमन के गुंचओ गुल में न हो असीर।
कु़मरी की सुन सफ़ीर, न बुलबुल की सुन सफ़ीर।
अपने तई तो देख कि क्या है? तू ऐ “नज़ीर”।
हैं हफेऱ्मन तरफ़ के यही मानी ऐ “नज़ीर”।
हर लहज़ा अपने जिस्म के, नक़्शो निगार देख।
ऐ गुल तू अपने हुस्न की, आप ही बहार देख॥9॥

(ख़ालेस्याह=काल तिल, ख़तेमुश्कबार=सुगन्धित
मुखावरण, लहज़ा=प्रत्येक क्षण, सुवैदा=काला तिल
जो हृदय पर होता है, दराज=लम्बे, फ़हमरसा=
कोयल जैसी काली, मुश्के ख़ुतन=तातार और
तिब्बत की कस्तूरी, रुख़सार=गाल, क़द्देदराज़=
लम्बा क़द, कु़मरी की सुन सफ़ीर=सीटी की
आवाज,पक्षियों की आवाज़)

14. जुल्फ़ के फन्दे

चहरे पै स्याह नागिन छूटी है जो लहरा कर।
किस पेच से आई है रुख़सार पै बल खाकर॥
जिस काकुलेमुश्कीं में फंसते हैं मलक आकर।
उस जुल्फ़ के फन्दों ने रक्खा मुझे उलझाकर॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥1॥

जिस दिन से हुआ आकर उस जुल्फ का ज़न्दानो।
इक हो गई यह मेरी ख़ातिर की परेशानी॥
भर उम्र न जावेगी अब जी से पशेमानी।
अफ़सोस, कहूं किससे मैं अपनी यह नादानी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥2॥

जिस वक्त लिखी होवे क़िस्मत में गिरफ़्तारी।
कुछ काम नहीं आती फिर अक़्ल की हुशियारी॥
यह कै़द मेरे ऊपर ऐसी ही पड़ी भारी।
रोना मुझे आता है इस बात पै हर बारी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥3॥

उस जुल्फ़ के हबों ने लाखों के तईं मारा।
अल्लाह की ख़्वाहिश से बन्दे का नहीं चारा॥
कुछ बन नहीं आता है, ताक़त है न कुछ यारा।
अब काहे को होता है इस कै़द से छुटकारा॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥4॥

उस जुल्फ़ तलक मुझको काहे को रसाई थी।
क़िस्मत ने मेरी ख़ातिर जंजीर बनाई थी॥
तक़दीर मेरे आगे जिस दम उसे लाई थी।
शायद कि अजल मेरी बनकर वही आई थी॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥5॥

गर चाहे ज़नख़दाँ में मैं डूब के दुख पाता।
यूसुफ की तरह इक दिन आखि़र में निकल आता॥
उस जुल्फ़ की ज़न्दां से कुछ पेश नहीं जाता।
आखि़र यही कह कह कर फिरता हूं मैं घबड़ाता॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥6॥

इसको तो मेरे दिल के डसने की शिताबी है।
और जिसकी वह नागिन है वह मस्त शराबी है॥
इस ग़म से लहू रोकर पुर चश्मे गुलाबी है।
क्या तुर्फ़ा मुसीबत है, क्या सख़्त ख़राबी है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥7॥

हर बन्द मेरे तन का इस कै़द में गलता है।
सर पावों से जकड़ा हूं कुछ बस नहीं चलता है॥
जी सीने में तड़पे है, अश्क आंख से ढलता है।
हर वक़्त यही मिस्रा अब मुंह से निकलता है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥8॥

इस कै़द की सख्ती में संभला हूं, न संभलूंगा।
इस काली बला से मैं जुज़ रंज के क्या लूंगा॥
इस मूज़ी के चंगुल से छूटा हूं न छूटूंगा।
आखि़र को यही कह कह इक रोज़ में जी दूंगा॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥9॥

यह कै़दे फ़रंग ऐसी दुनिया में बुरी शै है।
छूटा न असीर इसका इस कै़द की वह रै है॥
अब चश्म का साग़र है और खूने जिगर मै है।
कुछ बन नहीं आता है, कैसी फिक्र करूं ऐ है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥10॥

कहने को मेरे यारो मत दिल से भूला दीजो।
जं़जीर कोई लाकर पांवों में पिन्हा दीजो॥
मर जाऊं तो फिर मेरा आसार बना दीजो।
मरक़द पै यही मिस्रा तुम मेरे खुदा दीजो॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥11॥

उस जुल्फ़ के फंदे में यों कौन अटकता है।
ज्यों चोर किसी जागह रस्से में लटकता है॥
कांटे की तरह दिल में ग़म आके खटकता है।
यह कहके “नज़ीर” अपना सर ग़म से पटकता है॥
दिल बन्द हुआ, यारो! देखो तो कहां जाकर॥12॥

(काकुलेमुश्कीं=कस्तूरी केश, मलक=फरिश्ते,देवता,
ज़न्दानो=कै़दी, पशेमानी=लज्जा,पछतावा, हबों=साँग,
हथियार, ज़नख़दाँ=ठोड़ी का गड्ढा, आसार=निशान,
मरक़द=कब्र)

15. परी का सरापा

खूंरेज़करिश्मा, नाज़ो सितम, गम़जों की झुकावट वैसी ही।
मिज़गाँ की सनां, नज़रों की अनी अबरू की खिंचावट वैसी ही॥
क़त्ताल निगाह और दिष्ट ग़जब आंखों की लगावट वैसी ही।
पलकों की झपक, पुतली की फिरत, सुर्मे की लगावट वैसी ही॥
अय्यार नज़र, मक्कार अदा, त्योरी की चढ़ावट वैसी ही॥1॥

बेदर्द, सितमगर, बेपरवा, बेकल, चंचल, चटकीली सी।
दिल सख़्त क़यामत पत्थर सा और बातें नर्म रसीली सी॥
आनों की बान हटीली सी, काजल की आंख कटीली सी।
वह अंखियां मस्त नशीली सी कुछ काली सी कुछ पीली सी॥
चितवन की दग़ा, नज़रों की कपट, सैनों की लड़ावट वैसी ही॥2॥

थी खूब अदा से सर ऊपर संजाफ दुपट्टे की उल्टी।
बलदार लटें, तस्वीर जबीं जकड़ी मेंढ़ी, नीची कंघी॥
दिल लोट न जावे अब क्योंकर, और देख न उलझे कैसे जी।
वह रात अंधेरी बालों की, वह मांग चमकती बिजली सी॥
जुल्फों की खुलत, पट्टी की जमत, चोटी की गुंधावट वैसी ही॥3॥

उस काफ़िर बीनी और नथ के अन्दाज़ क़यामत शान भरे।
और गहरे चाहे ज़नखन्दाँ में, सौ आफ़त के तूफान भरे॥
वह नर्मो साफ़ सितारा से और मोती से दामान भरे।
वह कान जवाहरकान भरे कन फूलों, बाले जान भरे॥
बुन्दों की लटक, झुमकों की झमक, बाले की हिलावट वैसी ही॥5॥

चेहरे पर हुस्न की गर्मी से हर आन झमकते मोती से।
ख़ुशरंग पसीने की बूंदें, सौ बार झमकते मोती से॥
हँसने की अदा में फूल झड़ें, बातों में टपकते मोती से।
वह पतले पतले होंठ ग़जब वह दांत चमकते मोती से॥
पानों की रंगावट क़हर सितम, धड़ियों की जमावट वैसी ही॥5॥

उस सीने का वह चाक सितम, उस कुर्ती का तनजे़ब ग़जब।
उस क़द की ज़ीनत क़हर बला उस काफ़िर छवि का ज़ेब ग़जब॥
उन डिबियों का आज़ार बुरा, उन गेंदों का आसेब ग़जब।
वह छोटी छोटी सख़्त कुचें, वह कच्चे कच्चे सेब ग़जब॥
अंगिया की भड़क, गोटों की झमक, बुन्दों की कसावट वैसी ही॥6॥

थी पहने दोनों हाथों में काफ़िर जो कड़े गंगा जमुनी।
कुछ शोख़ कड़ों की झनकारें, कुछ झनके चूड़ी बाहों की॥
यह देख के आलम आशिक़ का सीने में न तड़पे क्यूं कर जी।
वह पतली पतली अंगुश्तें, पोरें वह नाजुक नाजुक सी॥
मेंहदी की रँगत, फ़न्दक की बनत, छल्लों की छलावट वैसी ही॥7॥

तक़रीर बयां से बाहर है, वह काफ़िर हुस्न, अहा! हा! हा!।
कुछ आप नई कुछ हुस्न नया, कुछ जोश जवानी उठती का॥
लपकें, झपकें उन बाहों की यारों मैं आह! कहूं क्या-क्या।
वह बांके बाजू होशरुबा आशिक़ से खेले बांक पटा॥
पहुंची की पहुंच, पहुंचे पै ग़जब, बांकों की बंधावट वैसी ही॥8॥

वह काफ़िर धज, जी देख जिसे सौ बार क़यामत का लरजे।
पाजेब,कड़े, पायल, घुंघरू, कड़ियां, छड़ियां, गजरे, तोड़े॥
हर जुम्बिश में सौ झंकारें, हर एक क़दम पर सौ झमके।
वह चंचल चाल जवानी की, ऊंची एड़ी नीचे पंजे॥
कफ़्शों की खटक, दामन की झटक, ठोकर की लगावट वैसी ही॥9॥

एक शोरे क़यामत साथ चले, निकले काफ़िर जिस दम बन ठन।
बलदार कमर रफ़्तार ग़जब, दिल की क़ातिल जी की दुश्मन॥
मज़कूर करूं मैं अब यारों उस शोख के क्या क्या चंचलपन।
कुछ हाथ हिलें कुछ पांव हिलें, फड़कें बाजू थिरके सब तन॥
गाली वह बला, ताली वह सितम, उंगली की नचावट वैसी ही॥10॥

यह होश क़यामत काफ़िर का, जो बात कहो वह सब समझे।
रूठे, मचले, सौ स्वांग करे, बातों में लड़े, नज़रों से मिले॥
यह शोख़ी फुर्ती बेताबी एक आन कभी निचली न रहे।
चंचल अचपल मटके चटके, सर खोले ढांके हँस-हँस के॥
कहकह की हंसावट और ग़ज़ब, ठट्ठों की उड़ावट वैसी ही॥11॥

कोहनी मारे, चुटकी लेले छेड़े, झिड़के, देवे गाली।
हर आन ‘चे खु़श’ हर दम ‘अच्छा’, हर बात खु़शी की चुहल भरी॥
नज़रों में साफ़ उड़ाले दिल, इस ढब की काफ़िर अय्यारी।
और हट जावे सौ कोस परे, गर बात कहो कुछ मतलब की॥
रम्ज़ो के ज़िले, गम्जों की जुगत, ठट्ठो की उड़ावट वैसी ही॥12॥

कातिल हर आन नये आलम, काफ़िर हर आन नई झमकें।
बाँकी नज़रें तिरछी, पलकें, भोली सूरत, मीठी बातें॥
दिल बस करने के लाखों ढब, जी लेने की सौ सौ घातें।
हर वक़्त फ़बन, हर आन सजन, दम दम में बदले लाख धजें॥
बाहों की झमक, घूंघट की अदा, जोबन की दिखावट वैसी ही॥13॥

जो उस पर हुस्न का आलम है, वह आलम हूर कहां पावे।
गर पर्दा मुंह से दूर करे, खुर्शीद को चक्कर आ जावे॥
जब ऐसा हुस्न भभूका हो, दिल ताब भला क्यूंकर लावे।
वह मुखड़ा चांद का टुकड़ा, सा जो, देख परी को गश आवे॥
गालों की दमक, चोटी की झमक रंगों की खिलावट वैसी ही॥14॥

तस्वीर का आलम नख सिख से छब तख्ती साफ़ परी की सी।
कुछ चीने जबीं पर ऐंठ रही और होंठों में कुछ गाली सी॥
बेदर्दी सख़्ती बहुतेरी; और मेहरों मुहब्बत थोड़ी सी।
झूठी अय्यारी नाक चढ़ी, भोली भाली पक्की बीसी॥
बातों की लगावट क़हर सितम, नज़रों की मिलावट वैसी ही॥15॥

कुछ नाज़ो अदा कुछ मग़रूरी, कुछ शर्मो हया कुछ बांकपना।
कुछ आमद हुस्न के मौसम की, कुछ काफिरजिस्म रहा गदरा॥
कुछ शोर जवानी उठती का चढ़ता है घमंड कर जूं दरिया।
वह सीना उभरा जोश भरा, वह आलम जिसका झूम रहा॥
शानो की अकड़, जोबन की तकड़, सज धज की सजावट वैसी ही॥16॥

यह काफिर गुद्दी का आलम घबराये परी भी देख जिसे।
वह गोरा साफ गला ऐसा, वह जावे मोती देख जिसे॥
दिल लोटे तड़पे हाथ मले, और ग़श खावे जी देख जिसे।
वह गर्दन ऊंची हुस्न भरी, कट जाय सुराही देख जिसे॥
दायें की मुड़त बायें की फिरत, मोढ़ों की खिंचावट वैसी ही॥17॥

इस गोरे नाजुक सीने पर वह गहने के गुलज़ार खिले।
चंपे की कली, हीरे की जड़ी तोड़े जुगनू हैकल बद्धी॥
दिल लोटे तड़पे हाथ मले और जाय नज़र हर दम फिसली।
वह पेट मलाई सा काफ़िर वह नाफ़ चमकती तारा सी॥
शोख़ी की खुलावट और सितम शर्मो की छिपावट वैसी ही॥18॥

हर आन निराली हर इक से उस शोख़ परी की महबूबी।
कुछ नाज़ो अदा की मरगूबी कुछ शर्मो हया की महबूबी॥
अब गहने की तारीफ करूँ या काफ़िर जोड़े की खूबी।
पोशाक सुनहरी इत्र भरी सर पाँव जवाहर में डूबी॥
जुगनू की दमक, हीना की सफा, कुर्ती की फँसावट वैसी ही॥19॥

जब ऐसा हुस्न का दरिया हो किस तौर न लहरों में बहिए।
गर मेहरो मुहब्बत हो भीतर और जोरो जफ़ा हो तो सहिए॥
दिल लोट गया है ग़श खाकर बस और तो आगे क्या कहिए।
मिल जाय “नज़ीर” ऐसी जो परी छाती से लिपट कर सो रहिए॥
बोसों की चपक, बग़लों की लपक, सीनों की मिलावट वैसी ही॥20॥

(खूंरेज़करिश्मा,=खून बरसाने वाला चमत्कार, गम़जों=हावभाव,
मिज़गाँ=पलक, सनां=बरछी, अनी=नोंक, अबरू=भोंह, क़त्ताल=
कत्ल करने वाली, जबीं=माथा, बीनी=नाक, ज़नखन्दाँ=ठोड़ी का
गड्ढा, ज़ीनत=सौन्दर्य, आसेब=ख़तरा,भूत-बाधा, फ़न्दक=मेंहदी
से रंगे उंगलियों के सिरे, होशरुबा=होश उड़ाने वाले, कफ़्शों=
पादुका,जूती, मज़कूर=वर्णन, रम्ज़=संकेत, ज़िले=छाया,परछाई,
शानो=माथे का बल जो अप्रसन्नता का चिह्न है, हैकल=गले
की माला, मरगूबी=रुचिकर,आकर्षण)

श्री कृष्ण पर कविताएं : नज़ीर अकबराबादी (Poems on Shri Krishna Nazeer Akbarabadi)

1. श्री कृष्ण जी की तारीफ़ में

है सबका ख़ुदा सब तुझ पे फ़िदा ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।
हे कृष्ण कन्हैया, नन्द लला !
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

इसरारे हक़ीक़त यों खोले ।
तौहीद के वह मोती रोले ।
सब कहने लगे ऐ सल्ले अला ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

सरसब्ज़ हुए वीरानए दिल ।
इस में हुआ जब तू दाखिल ।
गुलज़ार खिला सहरा-सहरा ।
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

फिर तुझसे तजल्ली ज़ार हुई ।
दुनिया कहती तीरो तार हुई ।
ऐ जल्वा फ़रोज़े बज़्मे-हुदा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मुट्ठी भर चावल के बदले ।
दुख दर्द सुदामा के दूर किए ।
पल भर में बना क़तरा दरिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

जब तुझसे मिला ख़ुद को भूला ।
हैरान हूँ मैं इंसा कि ख़ुदा ।
मैं यह भी हुआ, मैं वह भी हुआ ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

ख़ुर्शीद में जल्वा चाँद में भी ।
हर गुल में तेरे रुख़सार की बू ।
घूँघट जो खुला सखियों ने कहा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

दिलदार ग्वालों, बालों का ।
और सारे दुनियादारों का ।
सूरत में नबी सीरत में ख़ुदा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

इस हुस्ने अमल के सालिक ने ।
इस दस्तो जबलए के मालिक ने ।
कोहसार लिया उँगली पे उठा ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

मन मोहिनी सूरत वाला था ।
न गोरा था न काला था ।
जिस रंग में चाहा देख लिया ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

तालिब है तेरी रहमत का ।
बन्दए नाचीज़ नज़ीर तेरा ।
तू बहरे करम है नंद लला ।
ऐ सल्ले अला,
अल्लाहो ग़नी, अल्लाहो ग़नी ।

(ग़नी,=बेपरवाह, इसरार=भेद,
तौहीद=एक ईश्वर को मानना,
गुलज़ार=बाग़, सहरा-सहरा=
जंगल-जंगल, तजल्ली=नूर, ज़ार=
भरपूर, फ़रोज़े=रौशन करने वाले,
बज़्मे-हुदा=सत्य की महफिल,
ख़ुर्शीद=सूरज, रुख़सार=गाल,
नबी=पैग़म्बर, सीरत=स्वभाव,
अमल=काम, सालिक=साधक,
दसतो जबलए=जंगल और पहाड़,
कोहसार=पहाड़, तालिब=इच्छुक,
नाचीज़=तुच्छ, बहरे करम=दया,
का सागर)

2. जनम कन्हैया जी

है रीत जनम की यों होती, जिस घर में बाला होता है।
उस मंडल में हर मन भीतर सुख चैन दोबाला होता है॥
सब बात बिथा की भूले हैं, जब भोला-भाला होता है।
आनन्द मंदीले बाजत हैं, नित भवन उजाला होता है॥
यों नेक नछत्तर लेते हैं, इस दुनियां में संसार जनम।
पर उनके और ही लच्छन हैं जब लेते हैं अवतार जनम॥1॥

सुभ साअ़त से यों दुनियां में अवतार गरभ में आते हैं।
जो नारद मुनि हैं ध्यान भले सब उनका भेद बताते हैं।
वह नेक महूरत से जिस दम इस सृष्टि में जन्मे जाते हैं।
जो लीला रचनी होती है वह रूप यह जा दिखलाते हैं॥
यों देखने में और कहने में, वह रूप तो बाले होते हैं।
पर बाले ही पन में उनके उपकार निराले होते हैं॥2॥

यह बात कही जो मैंने, अब यों समझो इसको ध्यान लगा।
है पण्डित पुस्तक बीच लिखा, था कंस जो राजा मथुरा का॥
धन ढेर बहुत बल तेज निपट, सामान अनेक और डील बड़ा।
गज और तुरंग अच्छे नीके अम्बारी होदे जीन सजा॥
जब बन ठन ऊंचे हस्ती पर, वह पापी आन निकलता था।
सब साज़ झलाझल करता था, और संग कटक दल चलता था॥3॥

एक रोज़ जो अपने भुज बल पर, वह कंस बहुत मग़रूर हुआ।
और हंस कर बोला दुनियां में, है दूजा कौन बली मुझ सा॥
एक बान लगाकर पर्बत को, चाहूं तो अभी दूं पल में गिरा।
इस देस के बड़ बल जितने हैं, है कौन जो मुझसे होवे सिवा॥
जो दुष्ट कोई आ जुद्ध करे, कब मो पर वाका ज़ोर चले।
वह सामने मेरे ऐसा हो, जों चींटी हाथी पांव तले॥4॥

वह ऐसे ऐसे कितने ही, जो बोल गर्व के कहता था।
सब लोग सभा के सुनते थे, क्या ताब जो बोले कोई ज़रा॥
था एक पुरुष वह यों बोला, तू भूला अपने बल पर क्या?।
जो तेरा मारन हारा है, सो वह भी जनम अब लेवेगा॥
तू अपने बल पर हे मूरख, इस आन अबस अहंकार किया।
वह तुझको मार गिरावेगा यों, जैसे भुनगा मार लिया॥5॥

यह बात सुनी जब कंस ने वां, तब सुनकर उसके होश उड़े।
भय मन के भीतर आन भरा और बोल गरब सिगरे बिसरे॥
यों पूछा वह किस देस में है और कौन भवन आकर जन्मे।
कौन उसके मात पिता होवे, जो पालें उसको चाहत से॥
वह बोला मथुरा नगरी में, एक रोज़ जनम वह पावेगा।
जब स्याना होगा तब तुझको एक पल में मार गिरावेगा॥6॥

यह बात सुनाई कंस को फिर, फिर आठ लकीरें वां खींची।
बसुदेव पिता का नाम कहा, और देवकी माता ठहराई॥
उन आठ लकीरों की बातें, फिर कंस को उसने समझाई।
सब छोरा छोरी देवकी के, हैं जग में होते आठ यों ही॥
बल तेज गरब में तूने तो, सब कारज ज्ञान बिसारा है।
जो पाछे रेखा खींची है, वह तेरा मारन हारा है॥7॥

इस बात को सुनकर कंस बहुत, तब मन में अपने घबराया।
जब नारद मुनि उस पास गए, तब उनसे उसने भेद कहा॥
तब नारद मुनि ने भी उसको, कुछ और तरह से समझाया।
फिर कंस को वां इस बात सिवा कुछ और न मारग बन आया॥
जो अपनी जान बचाने का कर सोच यह उसने फंद किया।
बुलवा बसुदेव और देवकी को, एक मन्दिर भीतर बंद किया॥8॥

जब कै़द किया उन दोनों को, तब चौकीदार दिये बिठला।
एक आन न निकसन पावे यह, फिर उन सबको यह हुक्म दिया॥
सामान रसोई का जो था सब उनके पास दिया रखवा।
और द्वार दिये उस मन्दिर के, तब भारी ताले भी जड़वा॥
हुशियार लगे यों रहने वां नित चौकी के देने हारे।
क्या ताब जो कोठे छज्जे पर एक आन परिन्दा पर मारे॥9॥

भय बैठा था जो कंस के मन वह भर कर नींद न सोता था।
कुछ बात सुहाती ना उसको नित अपनी पलक भिगोता था॥
उस मन्दिर में उन दोनों के, जब कोई बालक होता था।
कंस आन उसे झट मारे था, मन मात पिता का रोता था॥
इक मुद्दत तक उन दोनों का, उस मन्दिर में यह हाल रहा।
जो बालक उनके घर जन्मा, सो मारता वह चंडाल रहा॥10॥

फिर आया वाँ एक वक़्त ऐसा जो आए गर्भ में मनमोहन।
गोपाल, मनोहर, मुरलीधर, श्रीकिशन, किशोर न कंवल नयन॥
घनश्याम, मुरारी, बनवारी, गिरधारी, सुन्दर श्याम बरन।
प्रभुनाथ बिहारी कान्ह लला, सुखदाई, जग के दुःख भंजन॥
जब साअत परगट होने की, वां आई मुकुट धरैया की।
अब आगे बात जनम की है, जै बोलो किशन कन्हैया की॥11॥

था नेक महीना भादों का, और दिन बुध, गिनती आठन की।
फिर आधी रात हुई जिस दम और हुआ नछत्तर रोहिनी भी॥
सुभ साअत नेक महूरत से, वां जनमे आकर किशन जभी।
उस मन्दिर की अंधियारी में, जो और उजाली आन भरी॥
बसुदेव से बोली देवकी जी, मत डर भय मन में ढेर करो।
इस बालक को तुम गोकुल में, ले पहुंचो और मत देर करो॥12॥

जो उसके तुम ले जाने में, यां टुक भी देर लगाओगे।
वह दुष्ट इसे भी मारेेगा, पछताते ही रह जाओगे॥
इस आन संभल कर तुम, इसको जो गोकुल में पहुंचाओगे।
इस बात में यह फल पाओगे, जो इसकी जान बचाओगे॥
वां गोकुल वासी जो इसको, ले अपनी गोद संभालेगा।
कुछ नाम वह इसका रख लेगा और मेहर दया से पालेगा॥13॥

जो हाल यह वां जा पहुंचेगा, तो इसका जी बच जावेगा।
जो करम लिखी है तो फिर भी, मुख हमको आन दिखावेगा॥
जिस घर के बीच पलेगा यह, वह घर हमको बतलावेगा।
हम इससे मिलने जावेंगे, यह हमसे मिलने आवेगा॥
नाम काम हमें कुछ दावा से न झगड़ा और परेखे से।
जब देखने को मन भटके गा, सुख पावेंगे उसके देखे से॥14॥

है आधी रात अभी तो यां ले जाओ इसे तुम हाल उधर।
लिपटा लो अपनी छाती से, दे आओ जाके और के घर॥
मन बीच उन्हों के था यह डर, दिन होवेगा तो कंस आकर।
एक आन में उसको मारेगा, रह जावेंगे हम आंसू भर॥
यह बात न थी मालूम उन्हें यह बालक जग निस्तारेगा।
कब मार सकेगा कंस इसे, यह कंस को आपही मारेगा॥15॥

जब देवकी ने बसदेव से वां, रो रो कर तब यह बात कही।
वह बोले क्यों कर ले जाऊं, है बाहर तो चौकी बैठी॥
और द्वार लगे हैं ताले कुल, कुछ बात नहीं मेरे बस की।
तब देवकी बोली “ले जाओ मन ईश्वर की रख आस अभी”॥
वह बालक को जब ले निकले, सब सांकर पट पट छूट गए।
थे ताले जितने द्वार लगे, उस आन झड़ाझड़ टूट गए॥16॥

जब आए चौकीदारों में तब वां भी यह सूरत देखी।
सब सोते पाए उस साअत, हर आन जो देते थे चौकी॥
जब सोता देखा उन सबको, हो निरभै निकले वां से भी।
फिर आए जमना तीर ज्योंहीं, फिर जमना देखी बहुत चढ़ी॥
यह सोच हुआ मन बीच उन्हें, पैर इस जल में कैसे धरिए।
है रैन अंधेरी संग बालक, इस बिपता में अब क्या करिए॥17॥

यों मन में ठहरा फिर चलिए, फिर आप ही मन मज़बूत हुआ।
भगवान दया पर आस लगा, वां जमना जी पर ध्यान धरा॥
यह जों जों पांव बढ़ाते थे, वह पानी चढ़ता आता था।
यह बात लगी जब होने वां, बसुदेव गए मन में घबरा॥
तब पांव बढ़ाए बालक ने जो आपसे और भीगे जल में।
जब जमना ने पग चूम लिये, जा पहुंचे पार वह इक पल में॥18॥

जब आन बिराजे गोकुल में, सब फाटक वां भी पाए खुले।
तब वां से चलते चलते, वह फिर नन्द के द्वारे आ पहुंचे॥
वां नन्द महल के द्वारे भी, सब देखे पट-पट द्वार खुले।
जो चौकी वाले सोते थे, अब कौन उन्हें रोके टोके॥
जब बीच महल के जा पहुंचे, सब सोते वां घर वाले थे।
हर चार तरफ़ उजियाली थी, जों सांझ में दीवे बाले थे॥19॥

इक और अचम्भा यह देखो, जो रात जनम श्रीकिशन की थी।
उस रात जशोदा के घर भी जन्मी थी यारो इक लड़की॥
वां सोते देख जशोदा को और बदली कर इस बालक की।
उस लड़की को वह आप उठा, ले निकले आये मथुरा जी॥
जब लड़की लाए मन्दिर में, सब ताले मन्दिर लाग उठे।
जो चौकी देने वाले थे, फिर वह भी उस दम जाग उठे॥20॥

जब भोर हुई तब घबरा कर, सुध कंस ने ली उस मन्दिर की।
जब ताले खुलवा बीच गया, तब लड़की जन्मी एक देखी॥
ले हाथ फिराया चक्कर दे तो पटके, वह बिन पटके ही।
यों जैसे बिजली कौंदे हैं जब छूट हवा पर जा पहुंची॥
यह कहती निकली “ऐ मूरख, क्या तूने सोच बिचारा है।
वह जीता अब तो सीस मुकुट, जो तेरा मारन हारा है”॥21॥

जब कंस ने वां यह बात सुनी, मन बीच बहुत सा लजियाया।
जो कारज होने वाला है, वह टाले से कब है टलता॥
सौ फ़िक्र करो, सौ पेच करो, सौ बात सुनाओ, हासिल क्या।
हर आन वही यां होना है, जो माथे के है बीच लिखा॥
हैं कहते बुद्धि जिसे अब यां, वह सोच बड़े ठहराती है।
तक़दीर के आगे पर यारो, तदबीर नहीं काम आती है॥22॥

अब नन्द के घर की बात सुनो, वां एक अचम्भा यह ठहरा।
जो रात को जन्मी थी लड़की और भोर को देखा तो लड़का॥
घुड़नाले छूटी नाच हुआ, और नोबत का गुल शोर मचा।
फिर किशन गरग ने नाम रखा, सब कुनबे के मिल बैठे आ॥
नंद और जसोदा और कवात, करने वां हेरा फेर लगे।
पकवान मिठाई मेवे के, नर नारी आगे ढेर लगे॥23॥

सब नारी आई गोकुल की और पास पड़ोसिन आ बैठीं।
कुछ ढोल मज़ीरे लाती थीं, कुछ गीत जचा के गाती थीं॥
कुछ हर दम मुख इस बालक का बलिहारी होकर देख रहीं।
कुछ थाल पंजीरी के रखतीं, कुछ सोंठ सठौरा करतीं थीं॥
कुछ कहती थी “हम बैठे हैं नेग आज के दिन का लेने को”।
कुछ कहतीं “हम तो आए हैं, आनन्द बधावा देने को”॥24॥

कोई घुट्टी बैठी गरम करे, कोई डाले इस्पन्द और भूसी।
कोई लायी हंसली और खडुवे, कोई कुर्ता टोपी मेवा घी॥
कोई देखे रूप उस बालक का, कोई माथा चूमे मेहेर भरी।
कोई भोंवों की तारीफ़ करे कोई आंखों की, कोई पलकों की॥
कोई कहती उम्र बड़ी होवे, ऐ बीर! तुम्हारे बालक की।
कोई कहती ब्याह बहू लाओ, इस आस मुरादों वाले की॥25॥

कोई कहती बालक खू़ब हुआ ऐ बहना! तेरी नेक रती।
यह बाले उनको मिलते हैं, जो दुनियां में हैं बड़ भागी॥
इस कुनबे को भी शान बढ़ी और भाग खड़े इस घर के भी।
यह बातें सबकी सुन सुनकर, यह बात जसोदा कहती थी॥
ऐ बीर! यह बालक जो ऐसा, अब मेरे घर में जन्मा है।
कुछ और कहूं मैं क्या तुमसे, भगवान को मोपे कृपा है॥26॥

थी कोने कोने खु़शवक़्ती और तबले ताल खनकते थे।
कोई नाच रही, कोई कूद रही, कोई हंस-हंस के कुछ रूप सजे॥
हर चार तरफ आनन्दें थीं, वां घर में नंद-जसोदा के।
कुछ आंगन बीच बिराजें थीं, कोई बैठी कोठे और छज्जे॥
सौ खू़बी और खु़श हाली से दिखलाती थी सामान खड़ी।
सच बात है बालक होने की, है दुनियां में आनन्द बड़ी॥27॥

फिर और खु़शी की बात हुई जब रीत हुई दधिकांदों की।
रखवाई दूध की मटकी भर और डाली हल्दी बहुतेरी॥
यह इस पर फेंके भर-भर कर, वह उस पर डाले घड़ी-घड़ी।
कोई पीछे मुख और बाहन को कोई सिखरनी फेंकें और मठड़ी॥
इस विधि की भी रंग रलियों में रूप और हुआ नर-नारी का।
और तन के अबरन यों भीगे ज्यों रंग हो केसर क्यारी का॥28॥

सुख मंडल में यह धूम मची, और बाहर नेगी जोगी भी।
कुछ नाचें भांड भगतिए भी, कुछ हिजड़े पावें बेल बड़ी॥
आनन्द बधावे बाज रहे, नरसिंगे सुरना और तुरई।
रंगीन सुनहरे पालने भी ले हाथ खड़े कितने बिरती॥
हर आन उठाती थीं मानिक, क्या गिनती रूपे-सोने की।
नंद और जसोदा ने ऐसी, की शादी बालक होने की॥29॥

जो नेगी-जोगी थे उनको उस आन निपट खु़श हाल किया।
पहराये बागे रेशम के, और ज़र भी बख़्शा बहुतेरा॥
और जितने नाचने वाले, असबाब उन्हें भी खू़ब दिया।
मेहमान जो घर में आए थे, सब उनका भी अरमान रखा॥
दिन-रात छटी के होने तक, मन खु़श किया लोग-लुगाई का।
भर थाल रुपे और मोहरें दीं, जब नेग चुकाया दाई का॥30॥

नंद और जसोदा बालक को, वां हाथों छांव में थे रखते।
नित प्यार करें तन मन वारें, सुनहरी अबरन गहने बाँके॥
जी बहलाते मन परचाते और खू़ब खिलौने मंगवाते।
हर आन झुलाते पालने में, वह ईधर और ऊधर बैठे॥
कर याद “नज़ीर” अब हर साअत, उस पालने और उस झूले की।
आनन्द से बैठो चैन करो, जय बोलो कान्ह झंडूले की॥31॥

(साअ़त=पल, खु़शवक़्ती=शुभ समय, असबाब=सामान)

3. बालपन-बाँसुरी बजैया का

यारो सुनो ! ये दधि के लुटैया का बालपन ।
और मधुपुरी नगर के बसैया का बालपन ।।
मोहन-सरूप निरत करैया का बालपन ।
बन-बन के ग्‍वाल गौएँ चरैया का बालपन ।।

ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।1।।

ज़ाहिर में सुत वो नंद जसोदा के आप थे ।
वरना वह आप माई थे और आप बाप थे ।।
परदे में बालपन के यह उनके मिलाप थे ।
जोती सरूप कहिए जिन्‍हें सो वह आप थे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।2।।

उनको तो बालपन से न था काम कुछ ज़रा ।
संसार की जो रीति थी उसको रखा बचा ।।
मालिक थे वो तो आपी उन्‍हें बालपन से क्‍या ।
वाँ बालपन, जवानी, बुढ़ापा, सब एक सा ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।3।।

मालिक जो होवे उसको सभी ठाठ याँ सरे ।
चाहे वह नंगे पाँव फिरे या मुकुट धरे ।।
सब रूप हैं उसी के वह जो चाहे सो करे ।
चाहे जवाँ हो, चाहे लड़कपन से मन हरे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।4।।

बाले हो ब्रज राज जो दुनियाँ में आ गए ।
लीला के लाख रंग तमाशे दिखा गए ।।
इस बालपन के रूप में कितनों को भा गए ।
इक यह भी लहर थी कि जहाँ को जता गए ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।5।।

यूँ बालपन तो होता है हर तिफ़्ल का भला ।
पर उनके बालपन में तो कुछ और भेद था ।।
इस भेद की भला जी, किसी को ख़बर है क्या ।
क्या जाने अपने खेलने आए थे क्या कला ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।6।।

राधारमन तो यारो अजब जायेगौर थे ।
लड़कों में वह कहाँ है, जो कुछ उनमें तौर थे ।।
आप ही वह प्रभू नाथ थे आप ही वह दौर थे ।
उनके तो बालपन ही में तेवर कुछ और थे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।7।।

वह बालपन में देखते जिधर नज़र उठा ।
पत्थर भी एक बार तो बन जाता मोम सा ।।
उस रूप को ज्ञानी कोई देखता जो आ ।
दंडवत ही वह करता था माथा झुका झुका ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।8।।

परदा न बालपन का वह करते अगर ज़रा ।
क्‍या ताब थी जो कोई नज़र भर के देखता ।।
झाड़ और पहाड़ देते सभी अपना सर झुका ।
पर कौन जानता था जो कुछ उनका भेद था ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।9।।

मोहन, मदन, गोपाल, हरी, बंस, मन हरन ।
बलिहारी उनके नाम पै मेरा यह तन बदन ।।
गिरधारी, नंदलाल, हरि नाथ, गोवरधन ।
लाखों किए बनाव, हज़ारों किए जतन ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।10।।

पैदा तो मधु पुरी में हुए श्याम जी मुरार ।
गोकुल में आके नन्द के घर में लिया क़रार ।।
नन्द उनको देख होवे था जी जान से निसार ।
माई जसोदा पीती थी पानी को वार वार ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।11।।

जब तक कि दूध पीते रहे ग्वाल ब्रज राज ।
सबके गले के कठुले थे और सबके सर के ताज ।।
सुन्दर जो नारियाँ थीं वे करती थीं कामो-काज ।
रसिया का उन दिनों तो अजब रस का था मिज़ाज ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।12।।

बदशक्ल से तो रोके सदा दूर हटते थे ।
और ख़ूबरू को देखके हँस-हँस चिमटते थे ।।
जिन नारियों से उनके ग़मो-दर्द बँटते थे ।
उनके तो दौड़-दौड़ गले से लिपटते थे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।13।।

अब घुटनियों का उनके मैं चलना बयाँ करूँ ।
या मीठी बातें मुँह से निकलना बयाँ करूँ ।।
या बालकों में इस तरह से पलना बयाँ करूँ ।
या गोदियों में उनका मचलना बयाँ करूँ ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।14।।

पाटी पकड़ के चलने लगे जब मदन गोपाल ।
धरती तमाम हो गई एक आन में निहाल ।।
बासुक चरन छूने को चले छोड़ कर पताल ।
अकास पर भी धूम मची देख उनकी चाल ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।15।।

थी उनकी चाल की जो अ़जब, यारो चाल-ढाल ।
पाँवों में घुंघरू बाजते, सर पर झंडूले बाल ।।
चलते ठुमक-ठुमक के जो वह डगमगाती चाल ।
थांबे कभी जसोदा कभी नन्द लें संभाल ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।16।।

पहने झगा गले में जो वह दखिनी चीर का ।
गहने में भर रहा गोया लड़का अमीर का ।।
जाता था होश देख के शाही वज़ीर का ।
मैं किस तरह कहूँ इसे चॊरा अहीर का ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।17।।

जब पाँवों चलने लागे बिहारी न किशोर ।
माखन उचक्के ठहरे, मलाई दही के चोर ।।
मुँह हाथ दूध से भरे कपड़े भी शोर-बोर ।
डाला तमाम ब्रज की गलियों में अपना शोर ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।18।।

करने लगे यह धूम, जो गिरधारी नन्द लाल ।
इक आप और दूसरे साथ उनके ग्वाल बाल ।।
माखन दही चुराने लगे सबके देख भाल ।
की अपनी दधि की चोरी घर घर में धूम डाल ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।19।।

थे घर जो ग्वालिनों के लगे घर से जा-बजा ।
जिस घर को ख़ाली देखा उसी घर में जा फिरा ।।
माखन मलाई, दूध, जो पाया सो खा लिया ।
कुछ खाया, कुछ ख़राब किया, कुछ गिरा दिया ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।20।।

कोठी में होवे फिर तो उसी को ढंढोरना ।
गोली में हो तो उसमें भी जा मुँह को बोरना ।।
ऊँचा हो तो भी कांधे पै चढ़ कर न छोड़ना ।
पहुँचा न हाथ तो उसे मुरली से फोड़ना ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।21।।

गर चोरी करते आ गई ग्वालिन कोई वहाँ ।
और उसने आ पकड़ लिया तो उससे बोले हाँ ।।
मैं तो तेरे दही की उड़ाता था मक्खियाँ ।
खाता नहीं मैं उसकी निकाले था चूँटियाँ ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।22।।

गर मारने को हाथ उठाती कोई ज़रा ।
तो उसकी अंगिया फाड़ते घूसे लगा-लगा ।।
चिल्लाते गाली देते, मचल जाते जा बजा ।
हर तरह वाँ से भाग निकलते उड़ा छुड़ा ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।23।।

ग़ुस्से में कोई हाथ पकड़ती जो आन कर ।
तो उसको वह सरूप दिखाते थे मुरलीधर ।।
जो आपी लाके धरती वह माखन कटोरी भर ।
ग़ुस्सा वह उनका आन में जाता वहीं उतर ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।24।।

उनको तो देख ग्वालिनें जी जान पाती थीं ।
घर में इसी बहाने से उनको बुलाती थीं ।।
ज़ाहिर में उनके हाथ से वह ग़ुल मचाती थीं ।
पर्दे में सब वह किशन के बलिहारी जाती थीं ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।25।।

कहतीं थीं दिल में दूध जो अब हम छिपाएँगे ।
श्रीकिशन इसी बहाने हमें मुँह दिखाएँगे ।।
और जो हमारे घर में यह माखन न पाएँगे ।
तो उनको क्या गरज़ है यह काहे को आएँगे ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।26।।

सब मिल जसोदा पास यह कहती थी आके बीर ।
अब तो तुम्हारा कान्ह हुआ है बड़ा शरीर ।।
देता है हमको गालियाँ फिर फाड़ता है चीर ।
छोड़े दही न दूध, न माखन, मही न खीर ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।27।।

माता जसोदा उनकी बहुत करती मिनतियाँ ।
और कान्ह को डराती उठा बन की साँटियाँ ।।
जब कान्हा जी जसोदा से करते यही बयाँ ।
तुम सच न जानो माता, यह सारी हैं झूटियाँ ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।28।।

माता कभी यह मेरी छुंगलियाँ छुपाती हैं ।
जाता हूँ राह में तो मुझे छेड़ जाती हैं ।।
आप ही मुझे रुठातीं हैं आपी मनाती हैं ।
मारो इन्हें ये मुझको बहुत सा सताती हैं ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।29।।

माता कभी यह मुझको पकड़ कर ले जाती हैं ।
गाने में अपने साथ मुझे भी गवाती हैं ।।
सब नाचती हैं आप मुझे भी नचाती हैं ।
आप ही तुम्हारे पास यह फ़रयादी आती हैं ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।30।।

एक रोज़ मुँह में कान्ह ने माखन झुका दिया ।
पूछा जसोदा ने तो वहीं मुँह बना दिया ।।
मुँह खोल तीन लोक का आलम दिखा दिया ।
एक आन में दिखा दिया और फिर भुला दिया ।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।31।।

थे कान्ह जी तो नंद जसोदा के घर के माह ।
मोहन नवल किशोर की थी सबके दिल में चाह ।।
उनको जो देखता था सो कहता था वाह-वाह ।
ऐसा तो बालपन न हुआ है किसी का आह ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।32।।

सब मिलकर यारो किशन मुरारी की बोलो जै ।
गोबिन्द छैल कुंज बिहारी की बोलो जै ।।
दधिचोर गोपी नाथ, बिहारी की बोलो जै ।
तुम भी ‘नज़ीर’ किशन बिहारी की बोलो जै ।।
ऐसा था बाँसुरी के बजैया का बालपन ।
क्या-क्या कहूँ मैं किशन कन्हैया का बालपन ।।33।।

(तिफ़्ल=बच्चा, जाये गौर=विचार करने योग्य,
क़रार=ठहराव, निसार=न्यौछावर, निहाल=समृद्ध,
फ़रयादी=गुहार लेकर)

4. बाँसुरी

जब मुरलीधर ने मुरली को अपनी अधर धरी।
क्या-क्या प्रेम प्रीति भरी इसमें धुन भरी॥
लै उसमें राधे-राधे की हर दम भरी खरी।
लहराई धुन जो उसकी इधर और उधर ज़री॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥1॥

कितने तो उसकी सुनने से धुन हो गए धनी।
कितनों की सुध बिसर गई जिस दम बह धुन सुनी॥
कितनों के मन से कल गई और व्याकुली चुनी।
क्या नर से लेके नारियां, क्या कूढ़ क्या गुनी॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥2॥

जिस आन कान्हा जी को यह बंसी बजावनी।
जिस कान में वह आवनी वां सुध भुलावनी॥
हर मन की होके मोहनी और चित लुभावनी।
निकली जहां धुन, उसकी वह मीठी सुहावनी॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥3॥

जिस दिन से अपनी बंशी वह श्रीकिशन ने सजी।
उस सांवरे बदन पे निपट आन कर फबी॥
नर ने भुलाया आपको, नारी ने सुध तजी।
उनकी उधर से आके वह बंसी जिधर बजी॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥4॥

ग्वालों में नंदलाल बजाते वह जिस घड़ी।
गौऐं धुन उसकी सुनने को रह जातीं सब खड़ी॥
गलियों में जब बजाते तो वह उसकी धुन बड़ी।
ले ले के इतनी लहर जहां कान में पड़ी॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥5॥

बंसी को मुरलीधर जी बजाते गए जिधर।
फैली धुन उसकी रोज़ हर एक दिल में कर असर॥
सुनते ही उसकी धुन की हलावत इधर उधर।
मुंह चंग और नै की धुनें दिल से भूल कर॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥6॥

बन में अगर बजाते तो वां थी यह उसकी चाह।
करती धुन उसकी पंछी बटोही के दिल में राह॥
बस्ती में जो बजाते तो क्या शाम क्या पगाह।
पड़ते ही धुन वह कान में बलिहारी होके वाह॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥7॥

कितने तो उसकी धुन के लिए रहते बेक़रार।
कितने लगाए कान उधर रखते बार-बार॥
कितने खड़े हो राह में कर रहते इन्तिज़ार।
आए जिधर बजाते हुए श्याम जी मुरार॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥8॥

मोहन की बांसुरी के मैं क्या क्या कहं जतन।
लय उसकी मन की मोहनी धुन उसकी चित हरन॥
उस बांसुरी का आन के जिस जा हुआ बजन।
क्या जल पवन “नज़ीर” पखेरू व क्या हिरन॥
सब सुनने वाले कह उठे जय जय हरी-हरी।
ऐसी बजाई किशन कन्हैया ने बांसरी॥9॥

(हलावत=मिठास)

5. खेलकूद कन्हैया जी का (कालिय-दमन)

तारीफ़ करूं मैं अब क्या क्या उस मुरली अधर बजैया की।
नित सेवा कुंज फिरैया की और बन बन गऊ चरैया की॥
गोपाल बिहारी बनवारी दुख हरना मेहर करैया की॥
गिरधारी सुन्दर श्याम बरन और हलधर जू के भैया की॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥1॥

एक रोज़ खु़शी से गेंद तड़ी की, मोहन जमुना तीर गए।
वां खेलन लागे हंस-हंस के, यह कहकर ग्वाल और बालन से॥
जो गेंद पड़े जा जमना में फिर जाकर लावे जो फेकें।
वह आपी अन्तरजामी थे क्या उनका भेद कोई पावे॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥2॥

वां किशन मदन मनमोहन ने सब ग्वालन से यह बात कही।
और आपही से झट गेंद उठा उस काली दह में डाल दई॥
फिर आपही झट से कूद पड़े और जमुना जी में डुबकी ली।
सब ग्वाल सखा हैरान रहे, पर भेद न समझें एक रई॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥3॥

यह बात सुनी ब्रज बासिन ने, तब घर घर इसकी धूम मची।
नंद और जसोदा आ पहुंचे, सुध भूल के अपने तन मन की॥
आ जमुना पर ग़ुल शोर हुआ और ठठ बंधे और भीड़ लगी।
कोई आंसू डाले हाथ मले, पर भेद न जाने कोई भी॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥4॥

जिस दह में कूदे मन मोहन, वां आन छुपा था एक काली।
सर पांव से उनके आ लिपटा, उस दह के भीतर देखते ही॥
फन मारे कई और ज़ोर किये और पहरों तक वां कुश्ती की।
फुंकारे ली बल तेज किये, पर किशन रहे वां हंसते ही॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥5॥

जब काली ने सो पेच किये फिर एक कला वां श्याम ने की।
इस तौर बढ़ाया तन अपना जो उसका निकसन लागा जी॥
फिर नाथ लिया उस काली को एक पल भर भी ना देर लगी।
वह हार गया और स्तुति की, हर नागिन भी फिर पांव पड़ी॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥6॥

उस दह में सुन्दर श्याम बरन उस काली को जब नाथ चुके।
ले नाथ को उसकी हाथ अपने, हर फन के ऊपर निरत गए॥
कर अपने बस में काली को मुसकाने मुरली अधर धरे।
जब बाहर आये मनमोहन, सब खु़श हो जय जय बोल उठे॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥7॥

थे जमुना पर उस वक़्त खड़े, वां जितने आकर नर नारी।
देख उनको सब खु़श हाल हुए, जब बाहर निकले बनवारी॥
दुख चिन्ता मन से दूर हुए आनन्द की आई फिर बारी।
सब दर्शन पाकर शाद हुए और बोले जय जय बलिहारी॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥8॥

नंद ओर जसोदाा के मन में, सुध भूली बिसरी फिर आई।
सुख चैन हुए दुख भूल गए कुछ दान और पुन की ठहराई॥
सब ब्रज बासिन के हिरदै में आनन्द ख़ुशी उस दम छाई।
उस रोज़ उन्होंने यह भी “नज़ीर” एक लीला अपनी दिखलाई॥
यह लीला है उस नंद ललन, मनमोहन जसुमत छैया की।
रख ध्यान सुनो डंडौत करो, जय बोलो किशन कन्हैया की॥9॥

6. कन्हैया जी की रास

क्या आज रात फ़रहतो इश्रत असास है।
हर गुल बदन का रंगींओज़र्री लिबास है॥
महबूब दिलबरों का हुजूम आस पास है।
बज़्मेतरब है ऐश है फूलों की बास है॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥1॥

बिखरे पड़ें हैं फ़र्श पे मुक़्कैश और ज़री।
बजते हैं ताल घुंघरुओं मरदंग खंजरी॥
सखियाँ फिरें हैं ऐसी कि जूं हूर और परी।
सुन सुन के उस हुजूम में मोहन की बांसरी॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥2॥

आए हैं धूम से जो तमाशे को गुल बदन।
गोया कि खिल रहे हैं गुलों के चमन-चमन॥
करते हैं नृत्य कुंज बिहारी व सद बरन।
और घुंघरुओं की सुन के सदाएँ छनन छनन॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥3॥

पहुंचे हैं आस्मां तईं मरदंग की गमक।
आवाज़ घुंघरुओं की क़यामत झनक झनक॥
करती है मस्त दिल को मुकुट की हर एक झलक।
ऐसा समां बंधा है कि हर दम ललक ललक॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥4॥

हलक़ा बनाके किशन जो नाचे हैं हाथ जोड़।
फिरते हैं इस मजे़ से कि लेते हैं दिल मरोड़॥
आकर किसी को पकड़े हैं, दे हैं किसी को छोड़।
यह देख देख किशन का आपस में जोड़ जोड़॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥5॥

नाचे हैं इस बहार से बन ठन के नंद लाल।
सर पर मुकुट बिराजे हैं, पोशाक तन में लाल॥
हंसते हैं छेड़ते हैं हर एक को दिखा जमाल।
सखियों के साथ देख के यह कान्ह जी का हाल॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥6॥

है रूप किशन जी का जो देखो अजब अनूप।
और उनके साथ चमके है सब गोपियों का रूप॥
महताबियां छूटें हैं गोया खिल रही है धूप।
इस रोशनी में देख के वह रूप और सरूप॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥7॥

हंसती हुई जो फिरती हैं साथ उनके गोपियां।
हैं राधा उनमें ऐसी कि तारों में चन्द्रमा॥
करती है कृष्ण जी से हर एक आन, आन बां।
आपस में उनके रम्ज़ोइशारात का करके ध्यां॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥8॥

यूं यक तरफ़ खु़शी से जो करते हैं नृत्य कान्ह।
और यक तरफ़ को राधिका जी बा हज़ार शान॥
आपस में गोपियों के खुले हैं निशान बान।
दिल से पसन्द करके उस अन्दाज का समान॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥9॥

गर मान-लीला देखो तो दिल से है पुर बहार।
और राधे जी का रूठना और किशन की पुकार॥
बाहम कब्त का पढ़ना व अन्दोहे बे शुमार।
इस हिज्र इस फ़िराक़ पे, सौ जी से हो निसार॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥10॥

लीला यहां तलक हैं कहां तक लूं उनका नाम।
करते हैं किशन राधे बहम उनका इख़्तिताम॥
दर्शन उन्होंके देख के हैं मस्त ख़ासो आम।
दंडौत करके बादएफ़र्हत के पी के जाम॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥11॥

इस शहर में ‘नज़ीर’ जो बेकस ग़रीब है।
रहता है मस्त हाल में अपने बगै़र मै॥
शब कोा गया था रास में कुछ करके राह तै।
जाकर जो देखता है तो वां सच है, करके जै॥
हर आन गोपियों का यही मुख बिलास है।
देखो बहारें आज कन्हैया की रास है॥12॥

(फ़रहतो-इश्रत=आनन्द-प्रसन्नता, रंगींओज़र्री=
भड़कीला और सुनहरा, बज़्मेतरब=खुशी की
महफ़िल, रम्ज़ोइशारात=रहस्य और संकेत,
बाहम कब्त=तिरस्कार भरी शिकायत,
इख़्तिताम=समाप्ति, बादएफ़र्हत=आनन्द-मदिरा)

7. ब्याह कन्हैया का

जहां में जिस वक़्त किशन जी की, अवस्था सुध बुध की यारो आई।
संभाला होश और हुए सियाने, वह बालपन की अदा भुलाई॥
हुआ क़द उनका कुछ इस तरह से, कि कु़मरी जिसकी फ़िदा कहाई।
निकालीं तर्जे़ फिर और ही कुछ, बदन की सज धज नई बनाई॥
हुए खु़शी नंद अपने मन में बहुत हुई खु़श जशोदा माई॥1॥

जो सुध संभाली तो किशन क्या क्या, लगे फिर अपनी छबें दिखाने।
जगह-जगह पर लगे ठिठकने, अदा से बंसी लगे बजाने॥
वह बिछड़ी गौओं को साथ लेकर, लगे खु़शी से बनों में जाने।
जो देखा नंद और जसोदा ने यह कि श्याम अब तो हुए सियाने॥
यह ठहरी दोनों के मन में आकर करें अब उनकी कहीं सगाई॥2॥

फिर आप ही वह यह मन में सोचे कि इनकी अब ऐसी जा हो निस्बत।
बड़ा हो घर दर, बड़े हों सामां, बहुत हो दौलत, बहुत हो हश्मत॥
हमारे गोकुल में है जो ख़ूबी, इसी तरह की हो उसकी हुर्मत।
वह लड़की जिससे कि हो सगाई, सो वह भी ऐसी हो खूबसूरत॥
हैं जैसे सुन्दर किशोर मोहन नवल दुलारे, कंुवर कन्हाई॥3॥

कई जो नारी वह बूढ़ियां थीं, जसोदा जी ने उन्हें बुलाया।
किसी को ईधर किसी को उधर सगाई ढूंढ़न कहीं भिजाया॥
जो भेद था अपने मन के भीतर, सो उन सभों के तईं जताया।
फिरीं बहुत ढूंढ़ती वह नारी यह थाा जसोदा ने जो सुनाया॥
न देखा वैसा घर इक उन्होंने न वैसी कोई दुलारी पाई॥4॥

वह नारियां जब यूंही आई तो बोली यूं और एक नारी।
है वह जो बरसाना इसमें हैगी बृषभानु की नवल दुलारी॥
है राधिका नाम उसका कहते बहुत है सुन्दर निपट पियारी।
कही यह मैंने तो बात तुमसे अब आगे मर्ज़ी जो हो तुम्हारी॥
करो सगाई लगन की उस जा कि इसमें हैगी बहुत भलाई॥5॥

यह सुन जसोदा ने जब खु़शी हो उधर को नारी कई पठाई।
चलीं वह गोकुल से दिल में खु़श हो वहीं वह बरसाने बीच आई॥
जहां वह घर कि बयां किया था वह नारियां सब उधर को धाई।
उन्होंने आदर बहुत सा करके मन्दिर के भीतर वह सब बिठाई॥
जो बैठी यह तो लगीं सुनाने, इधर उधर की बहुत बड़ाई॥6॥

जो कह चुकीं यह इधर उधर की तो फिर सगाई की बात खोली।
बड़े हो तुम भी, बड़े हैं वह भी, यह बात होवे तो खू़ब होगी॥
है जैसा सुन्दर उन्होंका लड़का, तुम्हारी सुन्दर है वैसी लड़की।
इधर भी दौलत उधर भी हश्मत, खुशी व खूबी तरह तरह की॥
उन्होंने अपनी बहुत जमाई, पर उनके दिल में न कुछ समाई॥7॥

जो राधिका की वह मां थीं कीरत यह सुनके बातें वह बोलीं हँस कर।
वह ऐसे क्या हैं जो अब हमारे जस और दौलत के हों बराबर॥
हैं जैसे वह तो सो ऐसे हैंगे हमारे घर के तो कितने चाकर।
हम अपनी लड़की उन्हें न देंगे, वह ऐसा क्या घर वह ऐसा क्या बर॥
करो हमारे न घर में तुम यां, अब इस सगाई की तब कहाई॥8॥

सुना जब उन नारियों ने यह तो चलीं इधर से वह शर्म खायी।
बहुत ही मन में हो सुस्त अपने, वह फिरके गोकुल के बीच आई॥
सुनी जो बातें थी वां उन्होंने, वह सब जसोदा को आ सुनाई।
यह बातें सुनकर जसोदा मन में बहुत ख़फ़ा हो बहुत लजाई॥
सिवाय ख़फगी[4] के आगे कुछ वां, जसोदा माई से बन न आई॥9॥

जब उस सगाई न होने से वां बुरा जसोदा ने मन में माना।
तो भेद उनका कला से अपनी यह बिन जताये ही हरि ने जाना॥
कहा यह मन में कि कोई लीला को चाहिए अब उधर दिखाना।
बना के मोहन सरूप नित प्रति ही खू़ब बरसाने बीच जाना॥
गए वही हरि फिर उस मकां में और अपनी बंसी वह जा बजाई॥10॥

बजी जो मोहन की बांसुरी वां तो धुन कुछ इसकी अजब ही निकली।
पड़ी वह जिस-जिस के कान में आ, उसे सुध अपने बदन की बिसरी॥
भुलाई बंसी ने कुछ तो सुध-बुध, उधर झलक जो सरूप की थी।
हर एक तरफ़ को हर एक मकां पर, झलक वह हरि की कुछ ऐसी झमकी॥
कि जिसकी हर एक झलक के देखे, तमाम बस्ती वह जगमगाई॥11॥

सहेलियों संग राधिका जी, कहीं उधर को जो आन निकली।
सरूप देखा वह किशन जी का, उधर से उनकी सुनी वह मुरली॥
जूं ही वहाँ राधिका जी आई, सो ऐसी मोहन ने मोहनी की।
दिखाया अपना सरूप ऐसा, कि उनकी सूरत को देखते ही॥
इधर तो राधा के होश खोये, हर एक सहेली की सुध भुलाई॥12॥

दिखाके रूप और बजा के मुरली, फिर आये गोकुल में नंद लाला।
फिर एक कला की वह कितने दिन में, कि राधा गोरी को माँदा डाला॥
बहुत दवाऐं उन्होंने की वां, पै फ़ायदे ने न सर निकाला।
फिर आप मोहन ने बैद बनकर, दवा की थैली को वां संभाला॥
पुकारे बरसाने बीच जाकर कि अच्छी करते हैं हम दवाई॥13॥

इधर थे हारे दवाएं करके, सुनी उन्होंने जो बात उनकी।
बुलाके जल्दी मन्दिर के भीतर दिखाई राधा जो वह दुखी थी॥
उन्होंने वा कुछ दवा भी दी और दिखाए कुछ छू छू मंतरे भी।
पढ़ंत क्या थी वह एक कला थी, हुई वहीं अच्छी राधिका जी॥
हर एक ने की वाह-वाह हर दम, और अपनी गर्दन बहुत झुकाई॥14॥

हुई जो चंगी वह राधिका जी, तो सब मन्दिर में खु़शी बिराजी।
वह वृषभानु और सभी कुटुम के, यह बात मन बीच आके ठहरी॥
कि राधिका की सगाई इनसे करें तो हैगी यह बात अच्छी।
जो रस्म होती सगाई की है, वह सब उन्होंने खु़शी से कर दी॥
“नज़ीर” कहते हैं इस तरह से हुई है श्री किशन की सगाई॥15॥

(निस्बत=सम्बन्ध,रिश्ता, हश्मत=मान सम्मान,
हुर्मत=सम्मान, ख़फगी=अप्रसन्नता)

8. दसम कथा (रुक्मनी का ब्याह)

ऐ दोस्तो! यह हाल सुनो ध्यान रख ज़रा।
और हर तरफ़ से ध्यान के तईं टुक इधर को ला॥
चर्चा है इसका वास्ते सबके तईं भला।
कहता हूं मैं यह अगले ज़माने का माजरा।
है नाम इस बयान का यारो दसम कथा॥1॥

सुकदेव ने कथा यह पहले परीक्षत से है कही।
उसने सुनी तो उसका हुआ दिल बहुत खु़शी॥
फिर भीकम एक राजा मन्दिर की थी मन्दिरी।
थे पांच बेटे उसके बहुत सुन्दर और बली॥
घर बार उसका दौलतोहश्मत से भर रहा॥2॥

बेटा बड़ा था सो उसका रुकम था नाम।
और रुक्मनी है बेटी बहुत खू़ब ख़राम॥
रूप और सरूप उसमें थे सर पांव से तमाम।
सखियों सहेलियों में वह रहती थीं खु़श ख़राम॥
गहना लिबास तन पै बहुत था झमक रहा॥3॥

नारद मुनि इक दिन आये जहां पर थी रुक्मनी।
और उससे बात उन्होंने वह श्री किशन की कही॥
लीला सुनाई वह सभी रूप और सरूप की।
जब रुक्मनी ने खू़बी वह श्रीकिशन की सुनी॥
सुनते ही उनकी हो गई जी जान से फ़िदा॥4॥

ठहरी यह रुक्मनी के वहीं दिल में आन कर।
बरनी जभी मैं जाऊं मिले जब वह मुझको बर॥
दिन रात ध्यान अपना लगी रखने वह उधर।
आंखों को अपनी करने लगी आंसुओं से तर॥
बेचैन दिल में रहने लगी सब से ही ख़फ़ा॥5॥

छुपती नहीं छुपाये से सूरत जो चाह की।
सखियां सहेलियां जो थीं और लड़कियां सभी॥
देखी जो रुक्मनी की उन्होंने यह बेकली।
जाना कि रुक्मनी का लगा साथ हरि के जी॥
कहने लगीं उन्हीं की वह बातें बना बना॥6॥

बोलीं वह सब कृश्न तो अवतार हैं बड़े।
जो खू़बियां हैं उनमें कहां तक कोई कहे॥
रूप और सरूप उनके की क्या क्या सिफ़त करे।
लीला हुई है उनसे जो हों कब वह और से॥
मां देवकी है उनकी वह वसुदेव जी पिता॥7॥

जन्मे वह मधुपुरी में तो जब आधी रात थी।
बसुदेव उनको ले चले गोकुल उसी घड़ी॥
जमुना ने उनके छू के चरन जल्द राह दी।
पहुंचे जो घर में नंद जसोदा के कान्ह जी॥
सब नेगियों ने नेग बधाई का वां लिया॥8॥

बसुदेव जी ने भेजा गरग पण्डिता को वां।
जो नाम उनका जाके वहां पर करे बयां॥
सुभ नाम जो कि होवे बयां कर उसे अयां।
गोकुल में आ मिसर ने बहुत होके शादमां॥
उनका श्रीकृष्न नाम बहुत सोध कर रखा॥9॥

थे बालपन में झूलते हर दम कृष्ण जी।
जब कंस ने यह पूतना भेजी कि लेवे जी॥
उसने जो छाती ज़हर भरी उनके मुंह में दी।
मुंह लगते ही उन्होंने वह जान उसकी खेंच ली॥
उसके पिरान कढ़ गए और कुछ न बस चला॥10॥

कागासुर आया दृष्ट लिया उसको मार भी।
फिर तृनावर्त्त की भी हवा दूर की सभी॥
सकटासुर आया उसकी भी गाड़ी उलट ही दी।
आया सिरीधर उसकी भी मट्टी ख़राब की॥
जितने वह दुष्ट आये सभों को उलट दिया॥11॥

फिर पांव चलने लगे जो धरती पै नंदलाल।
आये वह जिनकी गोद में उनको किया निहाल॥
स्याने हुए तो साथ लिये अपने ग्वाल बाल।
मुरली की धुन सुनाके किया सबका जी निहाल॥
गौएं चराई बन में वह बंसी बजा-बजा॥12॥

धमका के ग्वालिनों से लिये दूध और दही।
खाने खिलाए उनको जो थे साथ में सभी॥
जब ग्वालिनों ने आके जसोदा से यह कही।
झिड़का उन्होंने सांटी उठाकर जो उस घड़ी॥
त्रिलोक खोल मुंह उन्हें हरि ने दिखा दिया॥13॥

जमला व अर्जुन और वह दो देवता जो थे।
दो ताड़ बन गए थे किसी के सराप से॥
मुद्दत तलक वह बन में यूंही थे खड़े हुए।
लीला से अपनी कृश्न ने उस बन में आन के॥
वैसा ही देवता उन्हें एक पल में कर दिया॥14॥

राछस बहुत जो किशन पै आने लगे वहां।
नंद और जसोदा की लगी देख उनसे जाने जां॥
लेकर कुटुम सब अपना जो वे खु़र्द और कलां।
आकर वह वृन्दावन के लगे रहने दरमियां॥
गोकुल का बास सबने उसी दिन से फिर तजा॥15॥

ले ग्वाल बाल जाने लगे श्याम मन हरन।
गौऐं लगे चराने जहां है यह गोवरधन॥
वां भी बधासुर आया बकासुर भी बगुला बन।
मारा और उसकी चोंच को चीरा समेत तन॥
आया अधासुर उसके भी सर को उड़ा दिया॥16॥

दिखलाई अपनी हरि ने जो लीला वह बछ हरन।
देख उसको सबने चूम लिये कृश्न के चरन॥
ढिंग राक्षस आया फिर जो बनाकर वह मक्रोफ़न।
मारा उसे भी हरि ने जहां है यह ताल बन॥
काली को दह में नाथ किया नीर निरमला॥17॥

गौऐं खड़े चराते थे बन में जो श्याम जी।
उस बन में एक दिन जूं ही आग आन कर लगी॥
सब ग्वाल बाल छक रहे गौऐं खड़ी सभी।
लीला से वां भी हरि ने वह देख उनकी बेबसी॥
उस आग से सभों को लिया आन में बचा॥18॥

फिर की जो लीला चीर हरन हरि ने खू़ब तर।
सुरपति ने फिर वह कोप किया उनपे आन कर॥
पर्वत को वां उठा लिया बंसी ऊपर अधर।
फिर सर्द समय में श्याम ने ली नारियां सुन्दर॥
मुरली बजा के नृत्य किया रास को बना॥19॥

मारा वह सांप पांव पे लिपटा जो नंद के।
लीं गोपियां छुड़ा वहीं फिर शंख चूड़ से॥
हरका सुर और केशी व भौमासुर आ गए।
अपने से मक्र हरि से उन्होंने बहुत किये॥
हरि ने उन्हें भी मार के भू पर दिया गिरा॥20॥

एक रोज़ वृन्दावन से ले आये उन्हें जो वां।
चलने को साथ उनके हटीं सब वह गोपियां॥
जमना में फिर नहाये जो एक रोज़ शादमां।
हरि ने दिखाये वां उन्हें लीला से यह निशां॥
जो हरि ही हरि दिखाई दिये उनको जा बजा॥21॥

जब वृन्दावन में आये तो धोबी को कंस के।
मारा वहीं और उसके लिये चीर जितने थे॥
सूजी से ले लिबास दिये फिर बहुत उसे।
चन्दन जो कुब्जा लाई तो खु़श होके श्याम ने॥
सब खो दिया जहां तईं कुबड़ापन उसका था॥22॥

ड्योढ़ी पे आये जब तो वह तोड़ा धनुष के तईं।
रंग भूमि में गिरा दिया परबल को बर जमीं॥
दर्शन दिये वह राजा जो कै़दी थे सहमगी।
फिर कंस के भी केस पकड़ खींच कर वहीं॥
सर उसका एक इशारे में तन से जुदा किया॥23॥

फिर आये वां जहां थे वह बसुदेव देवकी।
चरनों पै सीस रख के बहुत सी असीस ली॥
यह बातें हरि की सुनके वहां रुक्मनी ने भी।
चाहा यही कि देखूं मैं सूरत कृश्न की॥
बेताबोबेक़रार लगी रहने सुख गवा॥24॥

उसको यह बातें कृश्न की खु़श आई थीं सभी।
सुनती वह साथियों से उन्हीं को घड़ी घड़ी॥
मां बाप रुक्मनी के भी और चारों भाई भी।
बर रुक्मनी के हों वही थे चाहते यही॥
पर रुक्म जो बड़ा था सो पसंद उसको यह न था॥25॥

रखता था नाम उसका तो जदु बंस है जनम।
कांधे पे उसके कामरी रहती है दम ब दम॥
गौवें चराता फिरता है बन बन में रख क़दम।
दौलत में और ज़ात में उससे बड़े हैं हम॥
शिशुपाल चन्देरी का जो बर हो तो है भला॥26॥

यह बातें वां रुकम से जो सुनती थी रुक्मनी।
बेकल बहुत वह होती थी और दिल में कुढ़ती थी॥
जब बेकली बहुत हुई और रह सका न जी।
एक चिट्ठी अपने हाल की हरि के तईं लिखी॥
बाम्हन के हाथ द्वारिका में दी वहीं भिजा॥27॥

बाम्हन जो हरि की ड्योढ़ी पे आ पहुंचा राह से।
देखा तो वहां है चेरी और चाकर बहुत खड़े॥
जाने में थे मन्दिर के जो दरबान रोकते।
सुनकर ख़बर यह हरि ने बुलाया वही उसे॥
परनाम करके ऊंचे मकां पर दिया बिठा॥28॥

बाम्हन की विनती करके लगे कहने किशन जी।
तुमने हमारे हाल पै कृपा बड़ी यह की॥
उसने जबानी कहके जो अहवाल था सभी।
फिर रुक्मनी की चिट्ठी जो लाया सो हरि को दी॥
हरि ने पढ़ा उसे तो यह अहवाल था लिखा॥29॥

“ऐ ब्रजराज” “कृष्ण” “मनोहर” मदन गोपाल।
मैं दर्शनों की आपके मुस्ताक़ हूं कमाल॥
दिन रात तुमसे मिलने को रहती हूं मैं निढाल।
दर्शन से अपने मुझको भी आकर करो निहाल॥
सब ध्यान में तुम्हारे ही रहता है मन लगा॥30॥

शिशुपाल ब्याहने को मेरे अब तो आता है।
सब राजे और साथ जरासंध लाता है॥
यह ग़म तो मेरे दिल को निहायत सताता है।
इस अपनी बेबसी पै मुझे रोना आता है॥
तुम हरि हो मेरे मन की करो दूर सब बिथा॥31॥

ऐ किशन जी तुम आओ कि अब वक़्त है यही।
अपने चरन से लाज रखो मेरी इस घड़ी॥
हरि ने वह चिट्ठी पढ़के मंगा रथ वह जगमगी।
होकर सवार जल्द चले वां से किशन जी॥
बाम्हन भी अपने साथ वह रथ में लिया बिठा॥32॥

शिशुपाल इसमें आन के पहुंचा शिताब वां।
अगवानी उसकी लेने को भीकम गया वो बाँ॥
बाजे मंदीले घर में लगीं गाने नारियां।
आंखों में रुक्मनी के यह आंसू हुए रवां॥
सुन्दरि का मुंह वह आंसू के बहने से भर गया॥33॥

जो जो वह हरि के आने में वां देर होती थी।
कोठे पर अपने रुक्मनी वां चढ़के रोती थी॥
तकती थी हरि की राह न खाती न सोती थी।
बेकल की तरह फिरती थी और होश खोती थी॥
कुछ रुक्मनी को रोने सिवा बन न आता था॥34॥

कहती थी क्यूं यह कृष्ण मुरारी ने देर की।
मोहन नवल किशोर बिहारी ने देर की॥
ब्रज राज, रूप, मुकुट संवारी ने देर की।
या चाह के असर यह हमारी ने देर की॥
बाम्हन जो मैंने भेजा था वह भी नहीं फिरा॥35॥

इसमें मुकन्दपुर के जो हरि आये अनक़रीब।
झलके कलस वह रथ के, हुई रोशनी अजीब॥
खु़श रुक्मनी का जी हुआ जूं गुल से अंदलीब।
बोली खुशी हो मन में कि, जागे मेरे नसीब॥
बाम्हन ने भी वह आने को हरि के दिया सुना॥36॥

बन ठन के जब ख़ुशी से वह पूजा के तईं चली।
साथ उसके नारियां, चलीं गाती बहुत ख़ुशी॥
सुन्दरि की जाती पांव की पायल जो बाजती।
रूप और सरूप उसका बयां क्या करे कोई॥
पहुंची खु़शी से वां जहां थी पूजने की जा॥37॥

जिस जिसको पूजा वां यही उसने किया बयां।
किरपा करो जो मुझको मिलें ब्रज राज यां॥
लेने को दर्सन उसके हुई हूं मैं नीमज़ां।
जल्दी मिलाओ तुम जो रहे लाज मेरी यां॥
हर देवता से वह यही करती थी इल्तिजा॥38॥

जब देवी देवता की यह परिक्रमा दे चुकी।
सुन्दरि दुलारी आगे को चल कर ठिठक रही॥
इस वास्ते कहीं मुझे दर्शन दे किशन जी।
तो देख वह सरूप मेरी होवे ज़िन्दगी॥
बच जावे जी यह लाज भी मेरे रहे बजा॥39॥

सुन्दर नवेली रूप का मैं क्या करूं बयां।
मुख वां झमक रहा था कि जूं माह आसमां॥
पोशाक भी बदन पै चमकती थी ज़रफ़िशां।
सर से पांव से भरी थी वह गहने के दरमियां॥
क्या वस्फ़ उसका हो सके जे़बोनिगार का॥40॥

देखा जो मुकन्दपुर के लोगों ने हरि को वां।
सब दर्शन उनके पाके हुए जी में शादमां॥
आपस में सब वह कहते थे नर और नारियां।
बर रुकमनी के यह हों तो हर मन को सुख हो यां॥
हर दम इसी मुराद की मांगें थे सब दुआ॥41॥

भीकम जो हरि के लेने को आया बहुत खु़शी।
दर्शन जो हरि के पाये तो विनती बहुत सी की॥
इतने में रुकमनी जो थी हरि के लिए खड़ी।
दर्शन जो पाये आगया वां उसके जी में जी॥
हरि ने पकड़ के हाथ लिया रथ में वां बिठा॥42॥

शिशुपाल अपने लेके कटक आ गया वहां।
बान उसके हरि ने काट भगाया उसे निदाँ॥
आया रुकम जो बान धनुक लेके और सनां।
उसको भी हरि ने बांध लिया काट उसकी बाँ॥
विनती से रुकमनी ने दिया उसका जी छुटा॥43॥

शिशुपाल का भी हरि ने दिया पल में गरब खो।
जो था गुरूर उसका सो सब डाला दम में धो॥
आया रुकम वली जो बहुत करके गरब को।
बालों से उसके हाथ बंधे और रहा वह रो॥
सच कहते हैं कि गरब है, जग में बहुत बुरा॥44॥

जब रुकमनी से कहने लगे हंस के वां यह हरि।
शिशुपाल को गरब ने किया सब में ख़्वारतर॥
खोया रुकम को और जरासंघ को उधर।
आये थे जिस गरब से वह लड़ने को अब इधर॥
आखि़र उसी गरब ने दिया उनका सर झुका॥45॥

शिशुपाल और रुकम का हुआ जब यह हाल वां।
बलदेव जी ने उनके कटक सब भगाए वां॥
ले रुकमनी को हरि हुए फिर द्वारिका वाँ।
जब आन पहुंचे खु़श हुए सब नर व नारियां॥
देखा जमाल उनका तो पाया बहुत भला॥46॥

फिर देवकी जो आई बहुत होके खु़श इधर।
पानी पिया उन्होंने वहीं हरि पे वार कर॥
सब नारियां भी आन के बैठीं इधर उधर।
जितना सहन था घर का रहा सब वह उनसे भर॥
शादी के बाजे बजने लगे शोरो गुल मचा॥47॥

सब द्वारिका में धूम यह शादी की मच गई।
बाजे, मजीरे तबले दमामें और तुरई॥
दर पर बरातियों की बहुत भीड़ आ लगी।
सोभा से द्वारा पर वह बंधन बार भी बंधी॥
पण्डित बुला सगुन से वह फेरे दिये फिरा॥48॥

बैठे थे द्वारका के वहां, खु़र्द और कबीर।
होते थे राग रंग खु़शी थे जवानों पीर॥
सामान थे हज़ारों ही शादी के दिलपज़ीर।
जो खू़बियां हुई सो वह क्या क्या कहे “नज़ीर”॥
इस ठाठ से वह ब्याह अ़जब कृष्ण का हुआ॥49॥

(माजरा=कथा,कहानी,किस्सा, दौलतोहश्मत=धन-
सम्मान, शादमां=प्रसन्न, खु़र्द और कलां=छोटे-बड़े,
मक्रोफ़न=धोखा और चतुराई, लिबास=वस्त्र,
बेताबोबेक़रार=बेचैन, जबानी=मौखिक, मुस्ताक़=
अभिलाषी, कमाल=अत्याधिक, शिताब=शीघ्र,
अनक़रीब=समीप, अंदलीब=बुलबुल, नसीब=भाग्य,
नीमज़ां=अर्द्धमुई, ज़रफ़िशां=सुनहरी, वस्फ़=प्रशंसा,
जे़बोनिगार=सुन्दरता, सनां=तीर,भाला, ख़्वारतर=
अपमानित, खु़र्द और कबीर=छोटे और बड़े,
जवानों पीर=युवक और वृद्ध, दिलपज़ीर=मनोरम)

9. हरि की तारीफ़

मैं क्या क्या वस्फ़ कहुं, यारो उस श्याम बरन अवतारी के।
श्रीकृष्ण, कन्हैया, मुरलीधर मनमोहन, कुंज बिहारी के॥
गोपाल, मनोहर, सांवलिया, घनश्याम, अटल बनवारी के।
नंद लाल, दुलारे, सुन्दर छबि, ब्रज, चंद मुकुट झलकारी के॥
कर घूम लुटैया दधि माखन, नरछोर नवल, गिरधारी के।
बन कुंज फिरैया रास रचन, सुखदाई, कान्ह मुरारी के॥
हर आन दिखैया रूप नए, हर लीला न्यारी न्यारी के।
पत लाज रखैया दुख भंजन, हर भगती, भगता धारी के॥
नित हरि भज, हरि भज रे बाबा, जो हरि से ध्यान लगाते हैं।
जो हरि की आस रखते हैं, हरि उनकी आस पुजाते हैं॥1॥

जो भगती हैं सो उनको तो नित हरि का नाम सुहाता है।
जिस ज्ञान में हरि से नेह बढ़े, वह ज्ञान उन्हें खु़श आता है॥
नित मन में हरि हरि भजते हैं, हरि भजना उनको भाता है।
सुख मन में उनके लाता है, दुख उनके जी से जाता है॥
मन उनका अपने सीने में, दिन रात भजन ठहराता है।
हरि नाम की सुमरन करते हैं, सुख चैन उन्हें दिखलाता है॥
जो ध्यान बंधा है चाहत का, वह उनका मन बहलाता है।
दिल उनका हरि हरि कहने से, हर आन नया सुख पाता॥
हरि नाम के ज़पने से मन को, खु़श नेह जतन से रखते हैं।
नित भगति जतन में रहते हैं, और काम भजन से रखते हैं॥2॥

जो मन में अपने निश्चय कर हैं, द्वारे हरि के आन पड़े।
हर वक़्त मगन हर आन खु़शी कुछ नहीं मन चिन्ता लाते॥
हरि नाम भजन की परवाह है, और काम उसी से हैं रखते।
है मन में हरि की याद लगी, हरि सुमिरन में खुश हैं रहते॥
कुछ ध्यान न ईधर ऊधर का, हरि आसा पर हैं मन धरते।
जिस काम से हरि का ध्यान रहे, हैं काम वही हर दम करते॥
कुछ आन अटक जब पड़ती है, मन बीच नहीं चिन्ता करते।
नित आस लगाए रहते हैं, मन भीतर हरि की किरपा से॥
हर कारज में हरि किरपा से, वह मन में बात निहारत हैं।
मन मोहन अपनी किरपा से नित उनके काज संवारत हैं॥3॥

श्री कृष्ण की जो जो किरपा हैं, कब मुझसे उनकी हो गिनती।
हैं जितनी उनकी किरपाएं, एक यह भी किरपा है उनकी॥
मज़कूर करूं जिस किरपा का, वह मैंने हैं इस भांति सुनी।
जो एक बस्ती है जूनागढ़, वां रहते थे महता नरसी॥
थी नरसी की उन नगरी में, दूकान बड़ी सर्राफे की।
व्योपार बड़ा सर्राफ़ी का था, बस्ता लेखन और बही॥
था रूप घना और फ़र्श बिछा, परतीत बहुत और साख बड़ी।
थे मिलते जुलते हर एक से और लोग थे उनसे बहुत ख़ुशी॥
कुछ लेते थे, कुछ देते थे, और बहियां देखा करते थे।
जो लेन देन की बातें थीं, फिर उनका लेखा करते थे॥4॥

दिन कितने में फिर नरसी का, श्री कृष्ण चरन से ध्यान लगा।
जब भगती हरि के कहलाये, सब लेखा जोखा भूल गया॥
सब काज बिसारे काम तजे हरि नांव भजन से लागा।
जा बैठे साधु और संतों में, नित सुनते रहते कृष्ण कथा॥
था जो कुछ दुकां बीच रखा, वह दरब जमा और पूंजी का।
मद प्रेम के होकर मतवाले, सब साधों को हरि नांव दिया॥
हो बैठे हरि के द्वारे पर सब मीत कुटुम से हाथ उठा।
सब छोड़ बखेड़े दुनियां के, नित हरि सुमरन का ध्यान लगा॥
हरि सुमरन से जब ध्यान लगा, फिर और किसी का ध्यान कहां।
जब चाहत की दूकान हुई, फिर पहली वह दूकान कहां॥5॥

क्या काम किसी से उस मन को, जिस मन को हरि की आस लगी।
फिर याद किसी की क्या उसको, जिस मन ने हरि की सुमरन की॥
सुख चैन से बैठे हरि द्वारे, सन्तोख मिला आनन्द हुई।
व्योपार हुआ जब चाहत का, फिर कैसी लेखन और बही॥
न कपड़े लत्ते की परवा, न चिन्ता लुटिया थाली की।
जब मन को हरि की पीत हुई, फिर और ही कुछ तरतीब हुई॥
धुन जितनीं लेन और देन की थी, सब मन को भूली और बिसरी।
नित ध्यान लगा हरि किरपा से, हर आन खु़शी और ख़ुश वक्ती॥
थी मन में हरि की पीत भरी, और थैले करके रीते थे।
कुछ फ़िक्र न थी, सन्देह न था, हरि नाम भरोसे जीते थे॥6॥

नित मन में हरि की आस धरे, ख़ुश रहते थे वां वो नरसी।
एक बेटी आलख जन्मी थी, सो दूर कहीं वह ब्याही थी॥
और बेटी के घर जब शादी, वां ठहरी बालक होने की।
तब आई ईधर उधर से सब नारियां इसके कुनबे की॥
मिल बैठी घर में ढोल बजा, आनन्द ख़ुशी की धूम मची।
सब नाचें गायें आपस में, है रीत जो शादी की होती॥
कुछ शादी की खु़श वक़्ती थी, कुछ सोंठ सठोरे की ठहरी।
कुछ चमक झमक थी अबरन की कुछ ख़ूबी काजल मेंहदी की॥
है रस्म यही घर बेटी के, जब बालक मुंह दिखलाता है।
तब सामाँ उसकी छोछक का ननिहाल से भी कुछ जाता है॥7॥

वां नारियां जितनी बैठी थीं, समध्याने में आ नरसी के।
जब नरसी की वां बेटी से, यह बोलीं हंस कर ताना दे॥
कुछ रीत नहीं आई अब तक, ऐ लाल तुम्हारे मैके से।
और दिल में थी यह जानती सब वह क्या हैं और क्या भेजेंगे॥
तब बोली बेटी नरसी की, उन नारियों के आकर आगे।
वह भगती हैं, बैरागी हैं, जो घर में था सो खो बैठे॥
वह बोलीं कुछ तो लिख भेजो, यह बोली क्या उनको लिखिए।
कुछ उनके पास धरा होता, तो आप ही वह भिजवा देते॥
जो चिट्ठी में लिख भेजूँगी, वह बांच उसे पछतावेंगे।
एक दमड़ी उनके पास नहीं, वह छोछक क्या भिजवावेंगे॥8॥

उन नारियों को भी करनी थी, उस वक़्त हंसी वां नरसी की।
बुलवा के लिखैया जल्दी से, यह बात उन्होंने लिखवा दी॥
सामान हैं जितने छोछक के, सब भेजो चिट्ठी पढ़ते ही।
सब चीजे़ इतनी लिखवाई, बन आएं न उनसे एक कमी॥
कुछ जेठ जिठानी का कहना, कुछ बातें सास और ननदों की।
कुछ देवरानी की बात लिखी, कुछ उनकी जो जो थे नेगी॥
थी एक टहलनी घर की जो सब बोलीं, तू भी कुछ कहती।
वह बोली उनसे हंस कर वां ‘मंगवाऊं’ क्या मैं पत्थर जी’॥
वह लिखना क्या था वां लोगो, मन चुहल हंसी पर धरना था।
इन चीज़ों के लिख भेजने से, शर्मिन्दा उनको करना था॥9॥

जब चिट्ठी नरसी पास गई, तब बांचते ही घबराय गए।
लजियाए मन में और कहा यह हो सकता है क्या मुझ से॥
यह एक नहीं बन आता है, हैं जो जो चिट्ठी बीच लिखे।
है यह तो काम काठेन इस दम, वां क्यूंकर मेरी लाज रहे॥
वह भेजे इतनी चीज़ों को, यां कुछ भी हो मक़दूर जिसे।
कुछ छोटी सी यह बात नहीं, इस आन भला किससे कहिये॥
इस वक़्त बड़ी लाचारी है, कुछ बन नहीं आता क्या कीजे।
फिर ध्यान लगा हरि आसा पर, और मन को धीरज अपने दे॥
वह टूटी सी एक गाड़ी थी, चढ़ उस पर बे विसवास चले।
सामान कुछ उनके पास न था, रख श्याम की मन में आस चले॥10॥

हरि नाम भरोसा रख मन में, चल निकले वां से जब नरसी।
गो पल्ले में कुछ चीज़ न थी, पर मन में हरि की आसा थी॥
थी सर पर मैली सी पगड़ी, और चोली जामे की मसकी।
कुछ ज़ाहिर में असबाब न था, कुछ सूरत भी लजियाई सी॥
थे जाते रस्ते बीच चले, थी आस लगी हरि किरपा की।
कुछ इस दम मेरे पास नहीं, वां चाहिएं चीजे़ं बहुतेरी॥
वां इतना कुछ है लिख भेजा, मैं फ़िक्र करूं अब किस किस की।
जो ध्यान में अपने लाते थे, कुछ बात वहीं बन आती थी॥
जब उस नगरी में जा पहुंचे, सब बोले नरसी आते हैं।
और लाने की जो बात कहो, एक टूटी गाड़ी लाते हैं॥11॥

कोई बात न आया पूछने को, जाके देखा नरसी को।
और जितना जितना ध्यान किया, कुछ पास न देखा उनके तो॥
जब बेटी ने यह बात सुनी, कह भेजा क्या क्या लाये हो?
जो छोछक के सामान किये, सब घर में जल्दी भिजवा दो॥
दो हंस-हंस अपने हाथों से, यां देना है अब जिस जिस को।
यह बोले तब उस बेटी से, हरि किरपा ऊपर ध्यान धरो॥
था पास क्या बेटी अब लाने को कुछ मत पूछो।
कुछ ध्यान जो लाने का होवे, “श्री कृष्ण कहो” “श्री कृष्ण कहो”॥
इस आन जो हरि ने चाहा है, एक पल में ठाठ बनावेंगे।
है जो जो यां से लिख भेजा, एक आन में सब भिजवा देंगे॥12॥

श्रीकृष्ण भरोसे जब नरसी, यह बात जो मुंह से कह बैठे।
क्या देखते हैं वां आते ही, सब ठाठ वह उस जा आ पहुंचे॥
कुछ छकड़ों पर असबाब कसे, कुछ भैसों पर कुछ ऊँट लदे।
थे हंसली खडु़ए सोने के, और ताश की टोपी और कुर्ते॥
कुल कपड़ों पर अंबार हुए और ढेर किनारी गोटों के।
कुछ गहनें झमकें चार तरफ़, कुछ चमके चीर झलाझल के॥
था नेग में देना एक जिसे, सो उसको बीस और तीस दिये।
अब वाह वाह की एक धूम मची ओर शोर अहा! हा! के ठहरे॥
थी वह जो टहलनी उनके हां वह भोली जिस दम ध्यान पड़ी।
सो उसके लिए फिर ऊपर से एक सोने की सिल आन पड़ी॥13॥

वां जिस दम हरि की किरपा ने, यूं नरसी की तब लाज रखी।
उस नगरी भीतर घर-घर में तब नरसी की तारीफ़ हुई॥
बहुतेरे आदर मान हुए, और नाम बड़ाई की ठहरी।
जो लिख भेजी थी ताने से, हरि माया से वह सांच हुई।
सब लोग कुटम के शाद हुए, खुश वक़्त हुई फिर बेटी भी।
वह नेगी भी खु़श हाल हुए, तारीफें कर कर नरसी की॥
वां लोग सब आये देखने, को, और द्वारे ऊपर भीड़ लगी।
यह ठाठ जो देखे छोछक के, सब बस्ती भीतर धूम पड़ी।
जो हरि काम रखें उनका फिर पूरा क्यूं कर काम न हो।
जो हर दम हरि का नाम भजें, फिर क्यूंकर हरि का नाम न हो॥14॥

श्रीकृष्ण ने वां जब पूरी की, सब नरसी के मन की आसा।
एक पल में कर दी दूर सभी, जो उनके मन की थी चिन्ता॥
यह ऐसी छोछक ले जाते, सो इनमें था मक़दूर यह क्या।
यह आदर मान वहां पाते, यह इनसे कब हो सकता था॥
जो हरि किरपा ने ठाठ किया, वह एक न इनसे बन आता।
यह इतनी जिसकी धूम मची, सो ठाठ वह था हरि किरपा का।
यह किरपा उन पर होती है, जो रखते हैं हरि की आसा।
हरि किरपा का जो वस्फ़ कहूं, वह बातें हैं सब ठीक बजा॥
है शाह “नज़ीर” अब हर दम वह, जो हरि के नित बलिहारी हैं।
श्रीकृष्ण कहो, श्रीकृष्ण कहो, श्रीकृष्ण बडे़ अवतारी हैं।15॥

(वस्फ़=गुण,प्रशंसा, मज़कूर=चर्चा,जिक्र,वर्णन, शादी=ख़ुशी,
शाद=प्रसन्न, मक़दूर=सामर्थ्य)

10. श्रीकृष्ण व नरसी मेहता

दुनियां के शहरों में मियां, जिस जिस जगह बाज़ार हैं।
किस किस तरह के हैं हुनर, किस किस तरह के कार हैं॥
कितने इसी बाज़ार में, ज़र के ही पेशेवार हैं।
बैठें हैं कर कर कोठियां, ज़र के लगे अम्बार हैं॥
सब लोग कहते हैं उन्हें, यह सेठ साहूकार हैं॥1॥

हैं फ़र्श कोठी में बिछे, तकिये लगे हैं ज़रफ़िशां।
बहियां खुलीं हैं सामने लिखते हैं लक्खी कारवां॥
कुछ पीठ की कुछ पर्त की, आती हैं बातें दरमियां।
लाखों की लिखते दर्शनी, सौ सैकड़ों की हुंडियां॥
क्या क्या मिती और सूद की, करते सदा तक़रार हैं॥2॥

कुछ मोल मज़कूर है, कुछ ब्याज का है ठक ठका।
फैलावटें घर बीच की बीजक का चर्चा हो रहा॥
दल्लाल हुंडी पीठ के बाम्हन परखिये सुध सिवा।
आढ़त बिठाते हर जगह, चिट्ठी लिखाते जा बजा॥
कुछ रखने वाले के पते, कुछ जोग के इक़रार हैं॥3॥

थोड़ी सी पूंजी जिनके है, बैठे हैं वह भी मिलके यां।
ईधर टके दस बीस के, ऊधर धरी हैं कौड़ियां॥
और जो हैं हद टुट पूंजिये वह कौड़ियों की थैलियां।
कांधों पै रख जाते हैं वां, लगती जहां हैं गुदड़ियां॥
देखा तो यह सब पेट के, धन्धें हैं और बिस्तार हैं॥4॥

है यह जो सर्राफ़ा मियां, हैं इनमें कितने और भी।
हित के परेखे का दरब, चाहत की चोखी अशरफ़ी॥
जो ज्ञानी ध्यानी हैं बड़े, कहते उन्हीं को सेठ जी।
धन ध्यान के कुछ ढेर हैं, कोठी भी है कोठी बड़ी॥
मन के प्रेम और प्रीत का करते सदा व्योपार हैं॥5॥

हैं रूप दर्शन आस के, चित के रूपे मन में भरे।
हुंडी लिखें उस साह को, जाते ही जो पल में मिले॥
लेखन से लेखा चाह का, चित की सूरत में लिख रहे।
जिस लोक में है मन लगा, उस बास की बंसनी बजे॥
नित प्रेम की हों बीच में, बहियां धरीं दो चार हैं॥6॥

बीजक लगाते हैं जहां, धोका नहीं पज़ता ज़रा।
जिस बात की मद्दें लिखें, वह ठीक पड़ती हैं सदा॥
है जमा दिल हर बात से, मन अस्ल मतलब से लगा।
हाजत तक़ाजे की नहीं, लेना सब आता है चला॥
जो बात करने जोग हैं, उसमें बड़े हुशियार हैं॥7॥

रहते हैं खु़श जी में सदा, दिल गीर कुछ रहते नहीं।
व्योपार करते हैं बड़े, हर आन रहते हैं वहीं॥
झगड़ा नहीं करते ज़रा, गुस्सा नहीं होते कहीं।
मत की सुनी से मन लगा, सुख चैन है जी के तईं॥
खोटे मिलत से काम क्या, उनके खरे हितकार हैं॥8॥

करते हैं नित उस काम को, जो है समाया ज्ञान में।
जो ध्यान है मन में बंधा, रहते हैं खुश उस ध्यान में॥
सन्देह का पैसा टका, रखते नहीं दूकान में।
नित मन की सुमरन साध कर, हर वक़्त में हर आन में॥
जिस नार का आधार है, उससे लगाये नार हैं॥9॥

जिस मन हरन महबूब से, मन की लगाई चाह है।
सब लेन की और देन की, उनको उसी से राह है॥
जो दिल की लेखन से लिखा, उससे वही आगाह है।
उनको उसी से साख है, उनकी वही एक राह है॥
कौड़ी से लेकर लाख तक, उनके वही व्योपार हैं॥10॥

इस भेद का ऐ दोस्तों, इस बात में देखो पता।
थे नरसी महता एक जो, सर्राफ़ी करते थे सदा॥
महफू़ज थे खु़श हाल थे, दूकान में ज़र था भरा।
श्री कृष्ण जी के ध्यान में, रहता था उनका मन लगा॥
सुन लो यह उनकी प्रीत और परतीत के अबकार हैं॥11॥

जूं जूं बढ़ा हिरदै में मत, मधु प्रेम का प्याला पिया।
पैसा टका जो पास था, सब साधु सन्तों को दिया॥
सब कुछ तजा हरि ध्यान में, और नाम हरि का ले लिया।
नित दास मतवाले बने, हरि का भजन हरदम किया॥
परघट किये सब देह पर जो नेह के आसार हैं॥12॥

सब तज दिया हरि ध्यान में, यह पीत का ठहरा जतन।
करते भजन श्रीकृष्ण का, हर हाल में रहते मगन॥
नरसी की परसी हो गई, देकर मदनमोहन को मन।
चाहत में सांवल साह की, अपना भुलाया तन बदन॥
सब भगत बातें साथ लीं, जो इष्ट में दरकार हैं॥13॥

दिन रात की माला फिरी श्रीकृष्ण जी श्रीकृष्ण जी।
ठहरा जु़बां पर हर घड़ी, श्रीकृष्ण जी, श्रीकृष्ण जी॥
कहता सदा सीने में जी, श्रीकृष्ण जी, श्रीकृष्ण जी।
जाते जहां कहते यही, श्रीकृष्ण जी, श्रीकृष्ण जी॥
जो प्रेम के पूरे हुए, उनके यही अतवार हैं॥14॥

कहते हैं यू एक देस में, रहते जो कितने साधु थे।
वह दर्शनों के वास्ते जब द्वारिका जी को चले॥
आ पहुंचे उस गारी में जब, नरसी जहां थे हित भरे।
उतरे खु़शी से आन कर, और वां कई दिन तक रहे॥
पूजा भजन करने लगे, साधुओं के जो अतवार हैं॥15॥

वह साधु जो उतरे थे वां, कुछ थे रूपे उनके कने।
चाहा उन्होंने दर्शनी, हुंडी लिखा लें सेठ से॥
लेवें रुपे हुंडी दिखा, जब द्वारिका में पहुंच के।
कारज संवारें धरम के, जो नेक नामी वां मिले॥
करते हैं कारज प्रेम के, जाके जो उस दरबार हैं॥16॥

लोगों से जब इस बात का, साधुओं ने वां चर्चा किया।
और हर किसी के उस घड़ी, घर पूछा साहूकार का॥
उस छोटी नगरी में बड़ा, नरसी का यह व्योपार था।
श्रीकृष्ण जी की चाह में बैठे थे सब अपना गवां॥
मुफ़्लिस से कब वह काम हों, करते जो अब ज़रदार हैं॥17॥

कितने जो ठट्ठे बाज़ थे जिस दम उन्होंने यह सुना।
दिल में हंसी की राह से, साधुओं से यूं जाकर कहा॥
एक नरसी महता है बड़े, सर्राफ़ यां के वाह! वा।
तुम दर्शनी हुंडी जो है, लो हाथ से उनके लिखा॥
है साख उनकी यां बड़ी, जितने यह साहूकार हैं॥18॥

वह साधु क्या जानें कि यां, यह करते हैं हमसे हंसी।
लेकर रूपे और पूछने, आये बहुत होकर खु़शी॥
नरसी के आये पास जब, यह दिल की बात अपने कही।
लिख दो हमें किरपा से तुम, इस वक़्त हुंडी दर्शनी॥
हम द्वारिका को आजकल जल्दी से चलने हार हैं॥19॥

नरसी ने यूं सुनकर कहा, मैं तो ग़रीब अदना हूं जी।
साधू मेरी दूकान तो मुद्दत से है ख़ाली पड़ी॥
ने है मेरी आड़त कहीं, ने मीत मेरा है कोई।
ने पास मेरे लेखनी, ने एक टूटी सी बही॥
यह बात वां कहिये जहां, नित हुंडियां हर बार हैं॥20॥

जाकर लिखाओ और से, परतीत साधू क्या मेरी।
है मेरे पड़ रहने को यां, टूटी सी अब एक झोपड़ी॥
तन पर मेरे कपड़ा नहीं, ने घर में थाली, करछली।
मैं तो सिड़ी, ख़व्ती सा हूं, क्या साख मेरी बात की॥
सब नाम रखते हैं, मुझे जो मेरे नातेदार हैं॥21॥

यह बात सुनकर साधु वां, नसी से बोले उस घड़ी।
लिख दो हमें किरपा से तुम, हमको यह हुंडी दर्शनी॥
कर याद सांवल साह की, नरसी ने वां हुंडी लिखी।
साधुओं ने हुंडी लेके वां से द्वारिका की राह ली॥
कहते चले लेने रुपै, अब वां तो बेतकरार हैं॥22॥

लोगों ने जाना अब बहुत, नरसी की ख़्वारी होवेगी।
लिख दी उन्होंने अब ज़ो यां, काहे को यह हुंडी पटी॥
यह द्वारिका से साधु यां, आवेंगे फिर कर जिस घड़ी।
पकड़ेंगे उनको आनकर, लोगों में होवेगी हंसी॥
खोये हैं पति इन्सान की, झूठे जो कारोबार हैं॥23॥

नरसी ने वह लेकर रुपै, रख ध्यान हरि की आस का।
थे जितने साधु और संत वां, सबको लिया उस दम बुला॥
पूरी कचौरी और दही, शक्कर, मिठाई भी मंगा।
सबको खिलाया कितने दिन, और सब ग़रीबों से कहा॥
मन मानता खाओ पियो, यह जो लगे अंबार हैं॥24॥

बर्फ़ी, जलेबी और लड्डू, सबको वहां बरता दिये।
जब सोच आया मन में यूं, होता है क्या अब देखिये॥
वह साधु हुंडी दर्शनी, ले द्वारका में जब गये।
कोठी को सांवल साह की, वां ढूंढते हर जा फिरे॥
हम जिनको हैं यां ढूंढते, यां वह नहीं ज़िनहार हैं॥25॥

बे आस होकर जिस घड़ी, वह साधु बैठे सर झुका।
इतने में देखा दूर से, एक रथ है वां जाता चला॥
कलसी झमकती जगमगा, छतरी सुनहरी ख़ुशनुमा।
एक शख़्स बैठा उसमें है, सांवल बरन मोहन अदा॥
रथ की झलक से उसकी वां, रौशन अजब अनवार है॥26॥

वह साधु देख उस ठाठ को, कुछ मन में घबरा से गये।
जल्दी उठे और सामने, रथ के हुए आकर खड़े॥
पूछा उन्होंने कौन हो, तब साधु यूं कहने लगे।
नरसी की हुंडी दर्शनी, है जोग सांवल साह के॥
सी हमको वह मिलते नहीं, अब हम बहुत नाचार हैं॥27॥

यह कहके हुंडी दर्शनी, जिस दम उन्होंने दी दिखा।
श्रीकृष्ण जी ने प्यार से, हर हर्फ़ हुंडी का पढ़ा॥
जितने रुपै थे वां लिखे, वह सब दिये उनको दिला।
वह ख़ुश हुए जब कृष्ण ने, यूं हंस के साधुओं से कहा॥
यह अब जिन्होंने है लिखी, हम उनसे रखते प्यार हैं॥28॥

अब जो मिलोगे उनसे तुम, कहियो हमारी ओर से।
जो थे रुपै तुमने लिखे, वह हमने सब उनको दिये॥
यह काम क्या तुमने किया, थोड़े रुपै जो अब लिखे।
आगे को अब समझो यही, इतने रुपै क्या चीज़ थे॥
लाखों लिखोगे तुम अगर, देने को हम तैयार हैं॥29॥

वह साधु अपने ले रुपे, फिर शहर के भीतर गए।
कारज जो करने थे उन्हें, मन मानते वह सब किये॥
फिर द्वारिका से चलके वह, नरसी की नगरी में गये।
नरसी से लोगों ने कहा, नरसी बहुत दिल में डरे॥
दूंगा कहां से मैं रुपे, यह तो बिपत के भार हैं॥30॥

जब साधु मिलने को गये, नरसी वहीं छुपने लगे।
वह मिनतियां करने लगे, और पांव नरसी के छुए॥
परशाद लाये और रुपे, कुछ रूबरू उनके धरे।
और जो सन्देसा था दिया, सब वह बचन उनसे कहे॥
नरसी ने जाना कृष्ण की किरपा के यह असरार हैं॥31॥

मन में जो नरसी खु़श हुए, सब साधु यूं कहने लगे।
सब हमने भर पाये रुपे, और हरि के दर्शन भी किये॥
हुंडी बड़ी लिखते रहो, हरि ने कहा है आप से।
नरसी यह बोले उनसे वां, अब किससे हो किरपा सके॥
जो जो कहा सब ठीक है, वह तो महा औतार हैं॥32॥

नरसी की सांवल साह ने जब इस तरह की पत रखी।
और यूं कहा आगे को तुम, लिखते रहो हुंडी बड़ी॥
बलिहारी नरसी हो गए, श्रीकृष्ण ने कृपा यह की।
जिसको “नज़ीर” ऐसों की है, जी जान से चाहत लगी॥
वह सब तरह हर हाल में, उसके निबाहन हार हैं॥33॥

(ज़रफ़िशां=सुनहरी, तक़रार=विवाद, मज़कूर=वर्णन,
हाजत=आवश्यकता, तक़ाजे=बार-बार कहना, महफू़ज=
सुरक्षित, मुफ़्लिस=ग़रीब, ज़रदार=धनवान, बेतकरार=
निर्विवाद, ख़्वारी=अपमान, ख़ुशनुमा=सुन्दर, शख़्स=
व्यक्ति, अनवार=तेज,प्रकाश, हर्फ़=अक्षर, असरार=
भेद,रहस्य)

11. सुदामा चरित

हर दम सुदामा याद करे कृष्ण मुरारी।
रहता है मस्त हाले दलिद्दर में भारी॥
और दिल में किसी आन नहीं सोच बिचारी।
करता है गुजर मांग के वह भीख भिखारी॥
हर आन दिल में कहता है धन है तू बिहारी॥ हरदम ॥1॥

देखो सुदामा तन पै तो साबुत न चीर है।
फेंटा बंधा है सिर के ऊपर सो भी लीर है॥
जामे के टुकड़े उड़ गये दामन धजीर है।
गर जिस्म उसका देखो तो दुर्बल हक़ीर है॥
सौ पेवंदों से सी सी के धोती को सुधारी॥ हरदम ॥ 2॥

जागह तवे की ठीकरा हैगा दराड़ दार।
लुटिया है एक छोटी सी सो भी है छेददार॥
लोहे की करछी तिसके भी फटे हुए किनार।
पेवन्ददार हांडी रसोई का यह सिंगार॥
पथरौटा फूटा तिसको भी थाती सी सुधारी॥ हरदम ॥3॥

छप्पर पै गौर कीजिये चलनी सा हो रहा।
तिसको भी घास पात से सारा रफ़ू किया॥
फूटी दिवार चारों तरफ़ जो खंडहर पड़ा।
स्यारों ने घर किया वहां पंछी ने घोंसला॥
अब ऐसी झोंपड़ी जो सुदामा ने सुधारी॥ हरदम ॥4॥

गोशे के बीच अपने लिए ख़्वाबगाह करी।
पाये दिवार लकड़ी लगा खाट सी धरी॥
तिस पर है फर्श ओढ़ने को गेंहू की नरी।
सोवे हैं रात उस पै जपें मुंह से उठ हरी॥
साधुओं के बीच रह के उमर अपनी गुज़ारी॥ हरदम॥5॥

उनको जब इस तरह से हुआ दर्द दुख कमाल।
एक रोज दिल में स्त्री के यों हुआ ख़्याल॥
हैंगे क़दीम यार तुम्हारे मदन गुपाल।
जाओ उन्हों के पास करेंगे बहुत निहाल॥
तुमसे उन्हों से गहरी हमेशा है यारी॥ हरदम॥6॥

औरत की बात सुनके सुदामा दिया जवाब।
तुमको है ज़र की चाह, वह पानी का जो हुबाब॥
कहने लगी जब स्त्री हमको कहां है ताब।
जब देखा हाल आपका हमने निपट खराब॥
तब अर्ज़ की है जाने की, तक़सीर हमारी॥ हरदम॥7॥

उनपे मुकुट जड़ाऊ है और सिर मेरा खाली।
कुंडल है उनके कानों में मुझपै नहीं बाली॥
उनपै पीतंबर हैगा मैं कमली रखूं काली।
वे हैं बड़े तुम छोटे यों बोली वह घर वाली॥
क़दमों में उनके जाओं ख़बर लेंगे तुम्हारी॥ हरदम॥8॥

तेरी यह बात ख़ूब मैं समझा हूं नेकतर।
अब हाल पर तू मेरे नहीं करती है नज़र॥
वे तीन लोकनाथ हैं मुझसे मिले क्यों कर।
फिर जन कहे हैं जाओ वहां तुम जो बेख़तर॥
हर एक तरह से खड़ी समझावे है नारी॥ हरदम॥9॥

ज़र बिन धरम करम नहीं होता है कुछ यहां।
ज़र बिन नहीं मिले हैं आदर किसी मकां॥
ज़र से जो ऐस चाहो मिले हें जहां तहां।
तुम हरि के पास जाओ कहै कामिनी वहां॥
बख़्सेंगे ज़र बहुत सा तुम्हें वे गिरवरधारी॥ हरदम॥10॥

ज़र के लिए तो दिल में हज़ारों फ़िकर करें।
ज़र के लिए तो यार से हरगिज़ नहीं मिलें॥
इससे भला है मरना नहीं जाके कुछ कहैं।
उसही का नाम दिल में सदा अपने हम जपें॥
है विर्त अपनी मांगना हर रोज़ बज़ारी॥ हरदम॥11॥

देकर जवाब स्त्री कहती है वे हैं स्याम।
लाखों उन्होंने भगतों के अपने किये हैं काम॥
यह बात जाके पूछ लो नहीं ख़ास है, यह आम।
मानो हमारी सीख उधर को करो पयाम॥
इस बात से दिल में कभी हूजे नहीं आरी॥ हरदम॥12॥

वे जादोंनाथ हैंगे बड़े कृष्ण कन्हाई।
क्या लीजे भेंट घर में नहीं दे हैं दिखाई॥
जब स्त्री पड़ोस से एक तौफ़ा ले आई।
चादर में चौतह चावलों की किनकी बंधाई॥
फिर की है सुदामा ने जो चलने की तैयारी॥ हरदम॥13॥

ले बग़ल में बिरंज सुदामा वहां चले।
रस्ते में शाम जब हुई एक शहर में बसे॥
वहां से द्वारिका रखा श्रीकृष्ण ने उसे।
सोते हुए सुदामा सबेरे जभी उठे॥
चारों तरफ़ से द्वारका सोने की निहारी॥ हरदम॥14॥

दिल में कहै सुदामा यह देखू हूं मैं क्या ख़्वाब।
जब कृष्ण जी नज़र पड़े करने लगा हिजाब॥
हरि ने जो अपने पास बुलाया वहीं शिताब।
चरनों को धोके सिरपै चढ़ाया सभों ने आब॥
दरसन को मिलके आई हैं रानी जो थीं सारी॥ हरदम॥15॥

खु़श होके सुदामा से कृष्ण उठ लिपट गए।
दोनों के गले मिलते ही आनंद सुख भए॥
मिलते हैं कब किसी को ह्यां भागों से आ गए।
आदर से आप ले गए सिंहासन पर नए॥
जब छेम कुसल पूछी रही वह न नदारी॥ हरदम॥16॥

नहाने को उनके बास्ते पानी गरम किया।
भोजन अनेक तरह का तैयार कर लिया॥
स्नान ध्यान करके सुदामा ने जल पिया।
बागा तरह तरह का सुदामा को जब दिया॥
उनमें लगा है बादला गोटा और किनारी॥ हरदम॥17॥

श्रीकृष्ण बोले दो जो हमें दीना है भाभी।
यह बात सुन सुदामा ने गांठ और भी दाबी॥
हरि ने चला के हाथ वहीं खेंच ली आपी।
दो मुट्ठी मुंह में डालते धरती सभी कांपी॥
और तीसरी के भरते ही रुकमनि जी पुकारी॥ हरदम॥18॥

ताना दिया फिर वोंही कि देखे तुम्हारे यार।
आए हैं मांगते हुए ऐसे ख़राब ख़्वार॥
तिर्लोक दे चुकोगे कुछ अपना भी है सुमार।
श्रीकृष्ण बोले तुमको क्या अपना करो जो कार॥
यह मंगता नहीं हैगा सुन प्रान पियारी॥ हरदम॥19॥

ऐसे निहंग लाड़ले देखे कहीं कहीं।
ख़ुश है यह अपने हाल में परवाह इन्हें नहीं।
कुछ मिल गया तो खाया नहीं बिस्तरा ज़मीं।
एक दममें चाहे जो मिलें इनको है क्या कमी॥
ये जब के यार हैंगे कोई यार न थारी॥ हरदम॥20॥

श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा को बुलवा कहा पुकार।
सोने के महल ख़ूब सुदामा के हों तैयार।
एक दममें बाग़ो महल बनाए बहार दार।
कोठे किवाड़ खिड़कियां छज्जे बहारदार॥
चौबारे मीने बंगले जड़ाऊ हैं अटारी॥ हरदम॥21॥

फिर गुफ़्तगू में बात लड़कपन की चलाई।
वह दिन भी तुमको याद है कुछ या नहीं भाई॥
भेजा गुरू ने लकड़ी को मेंह आंधी ले आई।
मुट्ठी चने की बैठ वहां तुमने जो खाई॥
और हमने रात काटी है पी पानी वह खारी॥ हरदम॥22॥

कुछ दिन सुदामा कृष्ण के ह्वां द्वारका रहे।
पटरानी भाई बंधु सभी टहल में लगे॥
घर घर दिखाई द्वारिका सब संग हरि फिरे।
मांगी बिदा सुदामा ने चलने की कृष्ण से॥
सब आन के हाज़िर हुए जो जो थे दरबारी॥ हरदम॥23॥

पहुंचावने सुदामा को जादों चले सारे।
बलदेव कृष्ण दोनों भये पांवो नियारे॥
और संग साथ बली बड़े जोधा जो भारे।
नग्गर शहर सभी हुआ आ शहर दुआरे॥
होते विदा के सबने किया चश्मों को जारी॥ हरदम॥24॥

रुख़सत हुआ सुदामा वहां सेति जब चला॥
जब राह बीच आया हुआ सोच यह बड़ा॥
औरत कहेगी लाए हो क्या मुझको दो दिखा।
इस जिंदगी से मौत भली क्या कहेंगे जा॥
किस वास्ते वह रांड़ बहुत हैगी खहारी॥ हरदम॥25॥

यह सोच करते करते पुरी पास आ गई।
देखे तो घर न छप्पर आफ़त बड़ी भई॥
ने ब्राह्मनी निशान न घर क्या कहूं दई।
दीना हमें सो देखा करी घात यह नई॥
वह भी लिया यह मार अज़ब भीतरी मारी॥ हरदम॥26॥

फिरता महल के गिर्द सुदामा नज़र पड़ी।
देखें तो एक स्त्री कोठे पे है खड़ी॥
वह वहां से बुलावे सुदामा को हर घड़ी।
दिल में सुदामा कहै यह रानी है कोई बड़ी॥
जाऊं जो घर में मारेंगे दरबान हज़ारी॥ हरदम॥27॥

क्या बार-बार मुझको बुलाये है क्या सबब।
शायद मुझे पसंद किया अपने दिल में अब॥
इतने में वह महल से उतर पास आई जब।
कहने लगी यह देखो विभव है उन्हीं की सब॥
माया यह हरि की देख हमें ऐसी बिसारी॥ हरदम॥28॥

फिर बांह पकड़ ले गई चौकी पे बिठाया।
खुशबू लगा उबटन मला ख़ूब न्हिलाया॥
ले टहलुए ने खूब पितंबर जो पहराया।
पूजा करी सुदामा ने हरि ध्यान लगाया॥
खि़दमत में चेरियां खड़ी ले हाथ में झारी॥ हरदम॥29॥

नित उठ सुदामा अपन करें येही खटकरम।
और पुन्न दान पूजा करें उसका जो धरम॥
हरि बिन नहीं तो जाने कोई उसका अब मरम।
कई दिन गुज़ारे इस तरह भोजन किये गरम॥
सोवे यह हरि के ध्यान में खा पान सुपारी॥ हरदम॥30॥

इस तरह जो ‘नज़ीर’ रहें हरि के ध्यान में।
यह भक्ति जोग हैगा कठिन कर धियान में॥
यह बात है लिखी हुई वेद औ पुरान में।
श्रीकृष्ण नाम ले ले हरेक आन आन में॥
बैकुंठ धाम पावें जो हैं हरि के पुजारी॥ हरदम॥31॥

(दुर्बल-हक़ीर=निर्बल-तुच्छ, गोशे=कोना, ख़्वाबगाह=
सोने का स्थान, हुबाब=पानी का बुलबुला, ताब=
शक्ति, तक़सीर=ख़ता,त्रुटि, नेकतर=अत्यधिक भली,
बेख़तर=निर्भय, ज़र=धन, बिरंज=चावल, हिजाब=
लज्जा,छुपना, शिताब=शीघ्र, गुफ़्तगू=बात-चीत,
रुख़सत=बिदा, सबब=कारण)

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