घनानंद की प्रसिद्ध कविताएँ, Ghananand Poem in Hindi

Ghananand Poem in Hindi – यहाँ पर आपको Ghananand Famous Poems in Hindi का संग्रह दिया गया हैं. घनानंद के जन्म समय को लेकर विभिन्न मत हैं. अनुमान के अनुसार इनका जन्म काल (1673 से 1760) माना जाता हैं. ये ‘आनंदघन’ नाम से भी प्रसिद्ध हैं.

घनानंद रीतिकाल के तीन प्रमुख काव्यधाराओं – रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त के अंतिम काव्यधारा के अग्रणी कवि हैं।

आइए अब यहाँ पर Ghananand ki Kavita in Hindi में दिए गए हैं. इसे पढ़ते हैं.

हिंदी कविता (Hindi Poetry) – Ghananand

1. बहुत दिनान को अवधि आसपास परे

बहुत दिनान को अवधि आसपास परे,
खरे अरबरन भरे हैं उठि जान को।
कहि कहि आवन छबीले मनभावन को,
गहि गहि राखति ही दै दै सनमान को
झूठी बतियानि को पत्यानि तें उदास ह्वै के,
अब ना घिरत घन आनंद निदान को।
अधर लगे हैं आनि करि कै पयान प्रान,
चाहत चलन ये सँदेसो लै सुजान को।
(कहते हैं कि मरते समय इन्होंने अपने रक्त
से यह कवित्त लिखा था)

2. कान्ह परे बहुतायत में

कान्ह परे बहुतायत में,
इकलैन की वेदन जानौ कहा तुम?
हौ मनमोहन, मोहे कहूँ न,
बिथा बिमनैन की मानौ कहा तुम?
बौरे बियोगिन्ह आप सुजान ह्वै,
हाय कछू उर आनौ कहा तुम?
आरतिवंत पपीहन को
घनआनंद जू! पहिचानो कहा तुम?

3. कारी कूर कोकिला कहाँ को बैर काढ़ति री

कारी कूर कोकिला कहाँ को बैर काढ़ति री,
कूकि-कूकि अबही करेजो किन कोरि रै।
पैंड़ परै पापी ये कलापी निसि द्यौस ज्यों ही,
चातक रे घातक ह्वै तुहू कान फोरि लै
आनंद के घन प्रान जीवन सुजान बिना,
जानि कै अकेली सब घेरो दल जोरि लै।
जौ लौं करै आवन विनोद बरसावन वे,
तौ लौं रे डरारे बजमारे घन घोरि लै

4. ए रे बीर पौन! तेरो सबै ओर गौन

ए रे बीर पौन! तेरो सबै ओर गौन,
वारि तो सों और कौन मनै ढरकौं ही बानि दै।
जगत के प्रान, ओछे बड़े को समान, घन
आनंदनिधान सुखदान दुखियानि दै
जान उजियारे, गुनभारे अति मोहि प्यारे
अब ह्वै अमोही बैठे पीठि पहिचानि दै।
बिरहबिथा की मूरि ऑंखिन में राखौं पूरि,
धूरि तिन्ह पाँयन की हा हा! नैकु आनि दै

5. पूरन प्रेम को मंत्र महा पन

पूरन प्रेम को मंत्र महा पन
जा मधि सोधि सुधारि है लेख्यो।
ताही के चारु चरित्र विचित्रनि
यों पचि कै रचि राखि बिसेख्यो
ऐसो हियो हित पत्र पवित्र जो
आन कथा न कहूँ अवरेख्यो।
सो घनआनंद जान अजान लौं
टूक कियो, पर बाँचि न देख्यो

6. आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलौं

आनाकानी आरसी निहारिबो करौगे कौलौं?
कहा मो चकित दसा त्यों न दीठि डोलिहै?
मौन हू सों देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू,
कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै
जान घनआनंद यों मोहि तुम्हें पैज परी,
जानियैगो टेक टरें कौन धौं मलोलिहै।
रुई दिए रहौगे कहाँ लौं बहरायबे की?
कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोलिहै

7. अंतर में बासी पै प्रवासी कैसो अंतर है

अंतर में बासी पै प्रवासी कैसो अंतर है,
मेरी न सुनत दैया! आपनीयौ ना कहौ।
लोचननि तारे ह्वै सुझायो सब, सूझौ नाँहिं,
बूझि न परति ऐसी सोचनि कहा दहौ
हौ तौ जानराय, जाने जाहु न, अजान यातें,
आनंद के घन छाया छाय उघरे रहौ।
मूरति मया की हा हा! सूरति दिखैये नेकु,
हमैं खोय या बिधि हो! कौन धौं लहालहौ

8. मूरति सिंगार की उजारी छबि आछी भाँति

मूरति सिंगार की उजारी छबि आछी भाँति,
दीठि लालसा के लोयननि लैलै ऑंजिहौं।
रतिरसना सवाद पाँवड़े पुनीतकारी पाय,
चूमि चूमि कै कपोलनि सों माँजिहौं
जान प्यारे प्रान अंग अंग रुचि रंगिन में,
बोरि सब अंगन अनंग दुख भाँजिहौं।
कब घनआनंद ढरौही बानि देखें,
सुधा हेत मनघट दरकनि सुठि राँजिहौं

9. निसि द्यौस खरी उर माँझ अरी

निसि द्यौस खरी उर माँझ अरी
छबि रंगभरी मुरि चाहनि की।
तकि मोरनि त्यों चख ढोरि रहैं,
ढरिगो हिय ढोरनि बाहनिकी
चट दै कटि पै बट प्रान गए
गति सों मति में अवगाहनि की।
घनआनंद जान लख्यो जब तें
जक लागियै मोहि कराहनि की

10. गुरनि बतायौ, राधा मोहन हू गायौ

गुरनि बतायौ, राधा मोहन हू गायौ
सदा सुखद सुहायौ बृंदाबन गाढ़े गहि रे।
अदभुत अभूत महिमंडन परे ते परे,
जीवन कौ लाहु हाहा क्यौं न ताहि लहि रे।।
आनँद कौ घन छायौ रहत निरंतर ही
सरस सुदेय सों पपीहा पन बहि रे।
जमुना के तीर केलि कोलाहल भीर,
ऐसे पावन पुलिन पै पतित! परि रहि रे।।

11. परकारज देह को धारे फिरौ परजन्य

परकारज देह को धारे फिरौ परजन्य!
जथारथ ह्वै दरसौ।
निधि नीर सुधा के समान करौ,
सबही बिधि सुंदरता सरसौ
घनआनंद जीवनदायक हो,
कबौं मेरियौ पीर हिये परसौ।
कबहूँ वा बिसासी सुजान के ऑंगन में
अंसुवान को लै बरसौ

12. अति सूधो सनेह को मारग है

अति सूधो सनेह को मारग है,
जहँ नैकु सयानप बाँक नहीं।
तहँ साँचे चलै तजि आपनपौ,
झिझकैं कपटी जो निसाँक नहीं
घनआनंद प्यारे सुजान सुनौ,
इत एक तें दूसरो ऑंक नहीं।
तुम कौन सी पाटी पढ़े हौ लला,
मन लेहु पै देहु छटाँक नही

13. लाजनि लपेटि चितवनि भेद-भाय भरी

लाजनि लपेटि चितवनि भेद-भाय भरी
लसति ललित लोल चख तिरछानि मैं।
छबि को सदन गोरो भाल बदन, रुचिर,
रस निचुरत मीठी मृदु मुसक्यानी मैं।
दसन दमक फैलि हमें मोती माल होति,
पिय सों लड़कि प्रेम पगी बतरानि मैं।
आनँद की निधि जगमगति छबीली बाल,
अंगनि अनंग-रंग ढुरि मुरि जानि मैं।

14. वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि

वहै मुसक्यानि, वहै मृदु बतरानि,
वहै लड़कीली बानि आनि उर मैं अरति है।
वहै गति लैन औ बजावनि ललित बैन,
वहै हँसि दैन, हियरा तें न टरति है।
वहै चतुराई सों चिताई चाहिबे की छबि,
वहै छैलताई न छिनक बिसरति है।
आनँदनिधान प्रानप्रीतम सुजानजू की,
सुधि सब भाँतिन सों बेसुधि करति है।।

15. छवि को सदन मोद मंडित बदन-चंद

छवि को सदन मोद मंडित बदन-चंद
तृषित चषनि लाल, कबधौ दिखाय हौ।
चटकीलौ भेष करें मटकीली भाँति सौही
मुरली अधर धरे लटकत आय हौ।
लोचन ढुराय कछु मृदु मुसिक्याय, नेह
भीनी बतियानी लड़काय बतराय हौ।
बिरह जरत जिय जानि, आनि प्रान प्यारे,
कृपानिधि, आनंद को धन बरसाय हौ।

16. झलकै अति सुन्दर आनन गौर

झलकै अति सुन्दर आनन गौर,
छके दृग राजत काननि छ्वै।
हँसि बोलनि मैं छबि फूलन की बरषा,
उर ऊपर जाति है ह्वै।
लट लोल कपोल कलोल करैं,
कल कंठ बनी जलजावलि द्वै।
अंग अंग तरंग उठै दुति की,
परिहे मनौ रूप अबै धर च्वै।।

17. जासों प्रीति ताहि निठुराई सों निपट नेह

जासों प्रीति ताहि निठुराई सों निपट नेह,
कैसे करि जिय की जरनि सो जताइये।
महा निरदई दई कैसें कै जिवाऊँ जीव,
बेदन की बढ़वारि कहाँ लौं दुराइयै।
दुख को बखान करिबै कौं रसना कै होति,
ऐपै कहूँ बाको मुख देखन न पाइयै।
रैन दिन चैन को न लेस कहूँ पैये भाग,
आपने ही ऐसे दोष काहि धौं लगाइयै।

18. भए अति निठुर, मिटाय पहचानि डारी (कवित्त)

भए अति निठुर, मिटाय पहचानि डारी,
याही दुख में हमैं जक लागी हाय हाय है।
तुम तो निपट निरदई, गई भूलि सुधि,
हमैं सूल सेलनि सो क्योहूँन भुलाय है।
मीठे मीठे बोल बोलि ठगी पहिलें तौ तब,
अब जिय जारत कहौ धौ कौन न्याय है।
सुनी है कै नाहीं, यह प्रगट कहावति जू,
काहू कलपायहै सु कैसे कल पाय है।

19. भोर तें साँझ लों कानन ओर निहारति (सवैया)

भोर तें साँझ लों कानन ओर निहारति बावरी नैकु न हारति।
साँझ तें भोर लों तारनि ताकिबो तारनि सों इकतार न टारति।
जौ कहूँ भावतो दीठि परै घनआनँद आँसुनि औसर गारति।
मोहन सोहन जोहन की लगियै रहै आँखिन के उर आरति।।

20. हीन भएँ जल मीन अधीन कहा (सवैया)

हीन भएँ जल मीन अधीन कहा कछु मो अकुलानि समाने।
नीर सनेही कों लाय अलंक निरास ह्वै कायर त्यागत प्रानै।
प्रीति की रीति सु क्यों समुझै जड़ मीत के पानि परें कों प्रमानै।
या मन की जु दसा घनआनँद जीव की जीवनि जान ही जानै।।

21. मीत सुजान अनीत करौ जिन (सवैया)

मीत सुजान अनीत करौ जिन, हा हा न हूजियै मोहि अमोही।
डीठि कौ और कहूँ नहिं ठौर फिरी दृग रावरे रूप की दोही।
एक बिसास की टेक गहे लगि आस रहे बसि प्रान-बटोही।
हौं घनआनँद जीवनमूल दई कित प्यासनि मारत मोही।।

22. पहिले घन-आनंद सींचि सुजान (सवैया)

पहिले घन-आनंद सींचि सुजान कहीं बतियाँ अति प्यार पगी।
अब लाय बियोग की लाय बलाय बढ़ाय, बिसास दगानि दगी।
अँखियाँ दुखियानि कुबानि परी न कहुँ लगै, कौन घरी सुलगी।
मति दौरि थकी, न लहै ठिकठौर, अमोही के मोह मिठामठगी।।

23. क्यों हँसि हेरि हियरा (सवैया)

क्यों हँसि हेरि हर्यो हियरा अरू क्यौं हित कै चित चाह बढ़ाई।
काहे कौं बालि सुधासने बैननि चैननि मैननि सैन चढ़ाई।
सौ सुधि मो हिय मैं घन-आनँद सालति क्यौं हूँ कढ़ै न कढ़ाई।
मीत सुजान अनीत की पाटी इते पै न जानियै कौनै पढ़ाई।।

24. प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ (कवित्त)

प्रीतम सुजान मेरे हित के निधान कहौ
कैसे रहै प्रान जौ अनखि अरसायहौ।
तुम तौ उदार दीन हीन आनि परयौ द्वार
सुनियै पुकार याहि कौ लौं तरसायहौ।
चातिक है रावरो अनोखो मोह आवरो
सुजान रूप-बावरो, बदन दरसायहौ।
बिरह नसाय, दया हिय मैं बसाय, आय
हाय ! कब आनँद को घन बरसायहौ।।

25. तब तौ छबि पीवत जीवत है (सवैया)

तब तौ छबि पीवत जीवत है अब सोचन लोचन जात जरे
हित-पोष के तोष सुप्राण पले बिललात महादुख दोष भरे।
‘घनआनन्द’ मीत सुजान बिना सबही सुखसाज समाज टरे
तब हार पहाड़ से लागत है अब आनि के बीच पहार परे।

26. पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों (सवैया)

पहिले अपनाय सुजान सनेह सों क्यों फिरि तेहिकै तोरियै जू।
निरधार अधार है झार मंझार दई, गहि बाँह न बोरिये जू ।
‘घनआनन्द’ अपने चातक कों गुन बाँधिकै मोह न छोरियै जू ।
रसप्याय कै ज्याय, बढाए कै प्यास, बिसास मैं यों बिस धोरियै जू।

27. ‘घनाआनँद’ जीवन मूल सुजान की (सवैया)

‘घनाआनँद’ जीवन मूल सुजान की, कौंधनि हू न कहूँ दरसैं ।
सु न जानिये धौं कित छाय रहे, दृग चातक प्रान तपै तरसैं ।
बिन पावस तो इन्हें थ्यावस हो न, सु क्यों करि ये अब सो परसैं।
बदरा बरसै रितु में घिरि कै, नितहीं अँखियाँ उघरी बरसैं ।

28. राति-द्यौस कटक सचे ही रहे

राति-द्यौस कटक सचे ही रहे, दहै दुख
कहा कहौं गति या वियोग बजमर की ।
लियो घेरि औचक अकेली कै बिचारो जीव,
कछु न बसाति यों उपाव बलहारे की ।
जान प्यारे, लागौ न गुहार तौ जुहार करि,
जूझ कै निकसि टेक गहै पनधारे की ।
हेत-खेत धूरि चूर चूर ह्वै मिलैगी, तब
चलैंगी कहानी ‘घनआनन्द’ तिहारे की।

29. मेरोई जिव जो मारतु मोहिं तौ

मेरोई जिव जो मारतु मोहिं तौ,
प्यारे, कहा तुमसों कहनो है।
आँखिनहू यह बानि तजी,
कुछ ऐसोइ भोगनि को लहनौ है ।
आस तिहारियै ही ‘घनआनन्द’,
कैसे उदास भयो रहनौ है ।
जानि के होत इते पै अजान जो,
तौ बिन पावक ही दहनौ है।

30. इन बाट परी सुधि रावरे भूलनि

इन बाट परी सुधि रावरे भूलनि,
कैसे उराहनौ दीजिए जू।
इक आस तिहारी सों जीजै सदा,
घन चातक की गति लीजिए जू।
अब तौ सब सीस चढाये लई,
जु कछु मन भाई सो कीजिये जू।
‘घनआनन्द’ जीवन -प्रान सुजान,
तिहारिये बातनि जीजिये जू।

31. पीरी परी देह छीनी, राजत सनेह भीनी

पीरी परी देह छीनी, राजत सनेह भीनी,
कीनी है अनंग अंग-अंग रंग बोरी सी ।
नैन पिचकारी ज्यों चल्यौई करै रैन-दिन,
बगराए बारन फिरत झकझोरी सी ।
कहाँ लौं बखानों ‘घनआनँद’ दुहेली दसा,
फाग मयी भी जान प्यारी वह भोरी सी ।
तिहारे निहारे बिन, प्रानन करत होरा,
विरह अँगारन मगरि हिय होरी सी ।

32. सौंधे की बास उसासहिं रोकत

सौंधे की बास उसासहिं रोकत, चंदन दाहक गाहक जी कौ ।
नैनन बैरी सो है री गुलाल, अधीर उड़ावत धीरज ही कौ ।
राग-विराग, धमार त्यों धार-सी लौट परयौ ढँग यों सब ही कौ ।
रंग रचावन जान बिना, ‘घनआनँद’ लागत फागुन फीकौ ।

33. जिन आँखिन रूप-चिन्हार भई

जिन आँखिन रूप-चिन्हार भई,
तिनको नित ही दहि जागनि है।
हित-पीरसों पूरित जो हियरा,
फिरि ताहि कहाँ कहु लागनि है।
‘घनआनन्द’ प्यारे सुजान सुनौ,
जियराहि सदा दुख दागनि है।
सुख में मुख चंद बिना निरखे,
नखते सिख लौं बिख पागनि है।

34. जिय की बात जनाइये क्यों करि

जिय की बात जनाइये क्यों करि,
जान कहाय अजाननि आगौ।
तीरन मारि कै पीरन पावत,
एक सो मानत रोइबो रागौ।
ऐसी बनी ‘घनआनन्द’ आनि जु,
आनन सूझत सो किन त्यागौ।
प्रान मरेंगे भरेंगे बिथा पै,
अमोही से काहू को मोह न लागौ।

35. बरसैं तरसैं सरसैं अरसैं न

बरसैं तरसैं सरसैं अरसैं न, कहूँ दरसैं इहि छाक छईं।
निरखैं परखैं करखैं हरखैं उपजी अभिलाषनि लाख जईं।
घनआनँद ही उनए इनि मैं बहु भाँतिनि ये उन रंग रईं।
रसमूरति स्यामहिं देखत ही सजनी अँखियाँ रसरासि भईं।

36. स्याम घटा लपटी थिर बीज कि सौहै

स्याम घटा लपटी थिर बीज कि सौहै अमावस-अंक उज्यारी।
धूप के पुंज मैं ज्वाल की माल सी पै दृग-सीतलता-सुख-कारी।
कै छवि छायो सिंगार निहारि सुजान-तिया-तन-दीपति प्यारी।
कैसी फ़बी घनआनँद चोपनि सों पहिरी चुनि साँवरी सारी।

37. प्रेम को महोदधि अपार हेरि कै, बिचार

प्रेम को महोदधि अपार हेरि कै, बिचार,
बापुरो हहरि वार ही तैं फिरि आयौ है।
ताही एकरस ह्वै बिबस अवगाहैं दोऊ,
नेही हरि राधा, जिन्हैं देखें सरसायौ है।
ताकी कोऊ तरल तरंग-संग छूट्यौ कन,
पूरि लोक लोकनि उमगि उफ़नायौ है।
सोई घनआनँद सुजान लागि हेत होत,
एसें मथि मन पै सरूप ठहरायौ है।

38. वैस की निकाई, सोई रितु सुखदायी

वैस की निकाई, सोई रितु सुखदायी, तामें –
वरुनाई उलहत मदन मैमंत है ।
अंग-अंग रंग भरे दल-फल-फूल राजैं,
सौरभ सरस मधुराई कौ न अंत है ।
मोहन मधुप क्यों न लटू ह्वै सुभाय भटू,
प्रीति कौ तिलक भाल धरै भागवंत है ।
सोभित सुजान ‘घनाआनँद’ सुहाग सींच्यौ,
तेरे तन-बन सदा बसत बसंत है ।

39. सावन आवन हेरि सखी

सावन आवन हेरि सखी,
मनभावन आवन चोप विसेखी ।
छाए कहूँ घनआनँद जान,
सम्हारि की ठौर लै भूल न लेखी ।
बूंदैं लगै, सब अंग दगै,
उलटी गति आपने पापन पेखी ।
पौन सों जागत आगि सुनी ही।
पै पानी सों लागत आँखिन देखी ।

40. अरी, निसि नींद न आवै, होरी खेलन की चोप

अरी, निसि नींद न आवै, होरी खेलन की चोप ।
स्याम सलौना, रूप रिझौना, उलह्यौ जोबन कोप ।
अबहीं ख्याल रच्यौ जु परस्पर, मोहन गिरिधर भूप ।
अब बरजत मेरी सास-नँनदिया, परी विरह के कूप ।
मुरली टेर सुनाइ, जगावै सोवत मदन अनूप ।
पै जिय सोच रही हौं अपने, जाय मिलौं हरि हूप ।
इत डर लोग, उत चोंप मिलन की, निरख-निरखि वो रूप ।
‘आनँदघन’ गुलाल घुमड़न में, मिलि हौं अँग-अँग गूप ।

(राग खंभाती)

41. पिय के अनुराग सुहाग भरी

पिय के अनुराग सुहाग भरी, रति हेरौ न पावत रूप रफै ।
रिझवारि महा रसरासि खिलार, सुगावत गारि बजाय डफै ।
अति ही सुकुमार उरोजन भार, भर मधुरी ड्ग, लंक लफै ।
लपटै ‘घनआनँद’ घायल ह्वैं, दग पागल छवै गुजरी गुलफै ।

42. खेलत खिलार गुन-आगर उदार राधा

खेलत खिलार गुन-आगर उदार राधा
नागरि छबीली फाग-राग सरसात है ।
भाग भरे भाँवते सों, औसर फव्यौ है आनि,
‘आनँद के घन’ की घमंड दरसात है ।
औचक निसंक अंक चोंप खेल धूँधरि सिहात है ।
केसू रंग ढोरि गोरे कर स्यामसुंदर कों,
गोरी स्याम रंग बीचि बूड़ि-बूड़ि जात है ।

43. बैस नई, अनुराग मई

बैस नई, अनुराग मई, सु भई फिरै फागुन की मतवारी ।
कौंवरे हाथ रचैं मिंहदी, डफ नीकैं बजाय रहैं हियरा रीन ।
साँवरे भौंर के भाय भरी, ‘घनाआनँद’ सोनि में दीसत न्यारी ।
कान्ह है पोषत प्रान-पियें, मुख अंबुज च्वै मकरंद सी गारी ।

44. राधा नवेली सहेली समाज में

राधा नवेली सहेली समाज में, होरी कौ साज सजें अतो सोहै ।
मोहन छैल खिलार तहाँ रस-प्यास भरी अँखियान सों जोहै ।
डीठि मिलें, मुरि पीठि दई, हिय-हेत की बात सकै कहि कोहै ।
सैनन ही बरस्यौ ‘घनआनँद’, भीजनि पै रँग-रीझनि मोहै ।

45. पकरि बस कीने री नँदलाल

पकरि बस कीने री नँदलाल ।
काजर दियौ खिलार राधिका, मुख सों मसलि गुलाल ।
चपल चलन कों अति ही अरबर, छूटि न सके प्रेम के जाल ।
सूधे किये बंक ब्रजमोहन, ‘आनँदघन’ रस-ख्याल ।

(राग केदारौ)

46. कहाँ एतौ पानिप बिचारी पिचकारी धरै

कहाँ एतौ पानिप बिचारी पिचकारी धरै,
आँसू नदी नैनन उमँगिऐ रहति है ।
कहाँ ऐसी राँचनि हरद-केसू-केसर में,
जैसी पियराई गात पगिए रहति है ।
चाँचरि-चौपहि हू तौ औसर ही माचति, पै-
चिंता की चहल चित्त लगिऐ रहति है ।
तपनि बुझे बिन ‘आनँदघन’ जान बिन,
होरी सी हमारे हिए लगिऐ रहति है ।

47. ‘घनआनँद’ प्यारे कहा जिय जारत

‘घनआनँद’ प्यारे कहा जिय जारत, छैल ह्वै फीकिऐ खौरन सों ।
करि प्रीति पतंग कौ रंग दिना दस, दीसि परै सब ठौरन सों ।
ये औसर फागु कौ नीकौ फब्यौ, गिरधारीहिं लै कहूँ टौरन सों ।
मन चाहत है मिलि खेलन कों, तुम खेलत हौ मिलि औरन सों ।

48. दसन बसन बोली भरि ए रहे गुलाल

दसन बसन बोली भरि ए रहे गुलाल
हँसनि लसनि त्यों कपूर सरस्यौ करै ।
साँसन सुगंध सौंधे कोरिक समोय धरे,
अंग-अंग रूप-रंग रस बरस्यौ करै ।
जान प्यारी तो तन ‘अनंदघन’ हित नित,
अमित सुहाय आग फाग दरस्यौ करै ।
इतै पै नवेली लाज अरस्यौ करै, जु प्यारौ-
मन फगुवा दै, गारी हू कों तरस्यौ करै ।

49. होरी के मदमाते आए

होरी के मदमाते आए, लागै हो मोहन मोहिं सुहाए ।
चतुर खिलारिन बस करि पाए, खेलि-खेल सब रैन जगाए ।
दृग अनुराग गुलाल भराए, अंग-अंग बहु रंग रचाए ।
अबीर-कुमकुमा केसरि लैकै, चोबा की बहु कींच मचाए ।
जिहिं जाने तिहिं पकरि नँचाए, सरबस फगुवा दै मुकराए ।
‘आनँदघन’ रस बरसि सिराए, भली करी हम ही पै छाए ।

(राग रामकली)

50. मोसों होरी खेलन आयौ

मोसों होरी खेलन आयौ ।
लटपटी पाग, अटपटे बैनन, नैनन बीच सुहायौ ।
डगर-डगर में, बगर-बगर में, सबहिंन के मन भायौ ।
‘आनँदघन’ प्रभु कर दृग मींड़त, हँसि-हँसि कंठ लगायौ ।

(राग कान्हरौ)

51. जा हित मात कौं नाम जसोदा

जा हित मात कौं नाम जसोदा, सुबंस कौ चन्द्रकला -कुलधारी ।
सोभा-समूहमयी ‘घनआनन्द’ मूरति रंग अनंग जिवारि ।
जान महा सहजै रिझवार, उदार विलास सु रासबिहारी।
मेरो मनोरथ हूँ पुरवौ तुमहीं, मो मनोरथ पूरनकारी ।

52. जिनको नित नीके निहारत हीं

जिनको नित नीके निहारत हीं, तिनको अँखियाँ अब रोवति हैं ।
पल पाँवरे पाइनि चाइनि सों, अंसुवनि की धारनिधोवति हैं ।
‘घनआनन्द’ जान सजीवनि कों, सपने बिन पायेइ खोवति हैं ।
न खुली मूँदी जानि परैं दुख ये, कछु हाइ जगे पर सोवति हैं ।

53. धुनि पुरि रहै नित काननि में

धुनि पुरि रहै नित काननि में, अज कों उपराजिबोई सी करै ।
मन मोहन गोहन जोहन के, अभिलाख समाजिबोई सी करै ।
‘घनआनन्द’ तिखिये ताननि सों, सर से सुर साजिबोई सी करै ।
कित तें यह बैरिन बांसुरिया, बिन बाजेई बाजिबोई सी करे ।

54. रावरे रूप की रीति अनूप (सवैया)

रावरे रूप की रीति अनूप, नयो नयो लागत ज्यौं ज्यौं निहारियै।
त्यौं इन आँखिन वानि अनोखी, अघानि कहूँ नहिं आनि तिहारियै।।
एक ही जीव हुतौ सुतौ वारयौ, सुजान, सकोच और सोच सहारियै।
रोकी रहै न दहै, घनआनंद बावरी रीझ के हाथनि हारियै।।

55. लै ही रहे हो सदा मन और को दैबो न

लै ही रहे हो सदा मन और को दैबो न जानत जान दुलारे।
देख्यौं न है सपनेहू कहूं दुख त्यागो संकोच औ सोच सुखारे।
कैसो संजोग वियोग धौं आहि फिरौ घन आनंद है मतवारे।
मो गति बूझि परैं तब ही जब होहु घरीक लौ आपु ते न्यारे।

56. जीवन ही जिय की सब जानत जान (सवैया)

जीवन हौ जिय की सब जानत जान, कहा कहि बात जतैये।
जो कछु है सुख संपति सौंज सु नैसिक ही हँसि दैन मैं पैये।।
आनंद के घन, लागै अचंभो पपीहा-पुकार ते क्यों अरसैये।
प्रीतिपगी आँखियानि दिखाय कै हाय अनीति सुदीठि छिपैये।।

57. अंतर उदेग दाह, आंखिन प्रवाह आँसू

अंतर उदेग दाह, आंखिन प्रवाह आँसू
देखी अट पटी चाह भी जनि दहनि है।
खोय खोय आपुही में चेटक लहनि है।
जान प्यारे प्राननिबसत पै अनंद धन,
बिरह बिसम दसा मूक लौं कहनि है।
जीवन-मरन, जीवन-मीच बिना बन्यौं आय,
हाय कौंन विधि रची नेही की रहनि है।

58. हिय में जु आरति सु जारति उजारति है

हिय में जु आरति सु जारति उजारति है,
मारत मरोरे जियं डारति कहा करौं।
रसना पुकारि कै विचारी पचि हारि रहै,
कहै कैसे अकह, उदेग रुधि कैं मरौ।
हाय कौंन वेदनि विरंचि मेरे बांट कीनी,
विघटि परों न क्यों हू, ऐसी विधि हौं गरौं।
आनंद के घन हौ सजीवन सुजान देखौ,
सीरी परि सोचनि, अचंभे सों जरों मरों।

59. मरिबो बिसराम गनै

मरिबो बिसराम गनै वह तो बापुरो मीट तज्यौ तरसै।
वह रूप छठा न सहारि सकै यह तेज तवै चितवै बरसे।
घनआनंद कौन अनोखी दसा मतिआवरी बावरी ह्वै थरसै।
बिछुरे-मिले मीन-पतंग-दसा खा जो जिय की गति को परसै।।

60. मन जैसे कछू तुम्हें चाहत है

मन जैसे कछू तुम्हें चाहत है सुबखानिये कैसे सुजान ही हौं।
इन प्राननि एक सदा गति रावरे, वावरे लौं लगियै नित लौ।
बुधि औरै सुधि नैननि बैननि में करिबास निरंतर अंतर गौ।
उधरौ जग छाय रहे घन आनंद चातिक त्यौं तकियै अब तौ।

61. मारति मरोरै जिय डारति कहा कहौं

मारति मरोरै जिय डारति कहा कहौं।
रसना पुकारिकैं विचारी पचि हारि रहै,
कहै कैसे अकह उदेग रूधि कै मरों।
हाय कौन वेदनि विरंचि मेरे बांट कीनी
विघटित परौ न क्यों हूं, ऐसी विधि हौं भरौं।
आनंद के धन हौ सजीवन सुजान देखौं
सीरी परि सोचनि अचंमें सौं जरौं मरौं।

62. चेटक रूप-रसीले सुजान

चेटक रूप-रसीले सुजान,
दर्इ बहुतै दिन नेकु दिखार्इ।
कौंध मैं चौंधमर्इ चख हाय,
कहा कहौं हेरनि ऐसे हिरार्इ।
बातैं बिलाय रर्इ रसना पै,
हियौं उमग्यौं कहि एकौन आर्इ।
सौंध कि संभ्रम हों घन आनंद।
सोचनि ही मति जाति हिरार्इ।

63. अच्छर मन कों छरै बहुरि अच्छर ही भावै

अच्छर मन कों छरै बहुरि अच्छर ही भावै।
रूप अच्छरातीत ताहि अच्छरहि बतावै।
अच्छर कौ यह भेद-कौंन जानै बिन मानै।
अच्छर हूं मैं मौन मिलै सारदा सुठानै।
अच्छर-मौन-सवाद-रस आनंद घन बरसत रहै।
तत्त्वज्ञान बौरानि में अच्छरगति अच्छर लहै।

64. उर भौन में मौन को घूंघट कै

उर भौन में मौन को घूंघट कै दुरि बैठी बिराजति बात बनी।
मृदु मंजु पदारथ भूषन सों सुलसै दुलसै रस-रूप मनी।
रसना अली कान गली मधि ह्वै पधरावति लै चित सेज सनी।
घनआँनद बूझनि अंक बसै बिलसै रिझवार सुजान धनी।

65. ढिग बैठे हू पैठि रहै उर में

ढिग बैठे हू पैठि रहै उर में धर कै खरकै दुख दोहतु है।
दृग आगे ते बैरी कहूं न टरै जग-जोहनि अंतर जोहतु है।
घन आनंद, मीत सुजान मिलें बसि बीच तऊ मति मोहतु है।
यह कैसो संजोग न बूझि परै जु वियोग न क्यों हू विछोहतु है।

66. तरसि-तरसि प्रान जानमनि दरस कों

तरसि-तरसि प्रान जानमनि दरस कों
उमहि-उमहि आनि आंखिन बसत हैं।
विषम विरह के विसिष हियें घायल हवै,
गहवर घूमि-घूमि सोचनि ससत हैं।
निसदिन लालसा लपेटे ही रहत लोभी,
मुरझि अनौखी उनझनि में गसत हैं।
सुमिर-सुमिरि घन आनंद मिलन सुख,
कटनि सों आसा-पट कटि लै कसत हैं।

67. अंग अंग स्याम-रस-रंग की तरंग उठै

अंग अंग स्याम-रस-रंग की तरंग उठै,
अति गहरार्इ हिय प्रेम उफनानि की।
उमगानि भरी पूर-पानिप सुढार ढारी,
मीठी धुनि करै ताप हरै अंखियानि की।
माहा छवि-नीर तीर गढ़ते न टरयौ जाय,
मोहनता निधि विधि पुहमी पै अनिकी।
भान की दुलारी घनआनंद जीवन ज्यारी,
वृंदावन-सोभा सींव सुख सरसानि की।

68. पीर की भीर अधीर भर्इ अँखियां

पीर की भीर अधीर भर्इ अँखियां दुखिया उमंगीं झरना लौं।
रोकि रही उर मैड़ बही इन टेक यही जु गही सु दही हौं।
भीजि बरैं घियधार परें हिय आँसुन यौं पजरै विरहा दौं।
आनंद के घन मीत सुजान हवै प्रीति में कीनी अनीति कहा गौ।

69. उर गति ब्यौरिवे कौं सुंदर सुजान जू को

उर गति ब्यौरिवे कौं सुंदर सुजान जू को,
लाख लाख विधि सों मिलन अभिलाखियै।
बातें रिस-रस भीनी कसि गति गांस झीनी,
बीनि बीनि आछी भांति पांति रवि राखिवै।
भाग जागैं जौ कहूँ बिलोकैं घन आनंद तौ,
ता छिन की छाकनि के लोचन ही साखियै।
भूलै सुधि सातौं दसा-बिबस गिरत गातौ।
रीझि बावरे दवै तब औरै कछू भाखियै।

70. तुम ही गति हौ तुम ही माटी हौ

तुम ही गति हौ तुम ही मति हौ तुमहि पति हौ अति दीनन की।
नित प्रीति करौ गुन-हीनन सौ यह रीती सुजान प्रवीनन की।
बरसौ घनआनंद जीवन को सरसौ सुधि चातक छीनन की।
मृदुतौ चित के पण पै द्रित के निधि हौ हित कै रचि मीनन की ।

71. घननंद के प्यारे सुजान सुनौ

घननंद के प्यारे सुजान सुनौ, जेहिं भाँतिन हौं दुख-शूल सहौं
नहिं आवन औधि, न रावरि आस, इते पर एक सा बात चहौं
यह देखि अकारन मेरि दसा, कोइ बूझइ ऊतर कौन कहौं
जिय नेकु बिचारि कै देहु बताय, हहा प्रिय दूरि ते पाँय गहौं

72. आसही अकास मधि अवधि गुनै बढ़ाय (कवित्त)

आसही अकास मधि अवधि गुनै बढ़ाय
चोपनि चढ़ाय दीनौ कीनो खेल सो यहै।
निपट कठोर एहौ ऐंचत न आप ओर
लाड़ले सुजान सौं दुहेली दसा को कहै।।
अचिरजमई मोहि भई घनआनंद यों
हाथ साथ लाग्यो पै समीप न कहूँ लहै।
बिरह समीर की झकोरनि अधीर नेह
नीर भीज्यो जीव तऊ गुड़ी लों उड्यो रहै।।

73. केती घट सोधौं पै न पाऊँ कहाँ आहि सो धौं (कवित्त)

केती घट सोधौं पै न पाऊँ कहाँ आहि सो धौं
को धौं जीव जारै अटपटी गति दाह की।
धूम कों न धरै गात सीरो परै ज्यों ज्यों जरै
ढरै नैन नीर बीर हरै मति आह की।।
जतन बुझेहै सब जाकी झर आगें अब
कबहूँ न दबै भरी भभक उमाह की।
जब तें निहारे घनआनंद सुजान प्यारे
तब तें अनोखी आगि लागि रही चाह की।।

74. आँखैं जो न देखैं तो कहा हैं कछु देखति ये (कवित्त)

आँखैं जो न देखैं तो कहा हैं कछु देखति ये
ऐसी दुखहाइनि की दसा आय देखिए ।
प्रानन के प्यारे जान रूप उँजियरे बिना
तिहारे मिलन इन्हैं कौन लेखे लेखिए।।
नीर न्यारे मीन औ चकोर चन्दहीन हूं तैं
अतिही अधीन दीन गति मति पेखिए ।
हौ जू घनआनंद ढरारे रसभरे मारे
चातिक बिचारे सों न चूकनि परेखिए।।

75. जहाँ तैं पधारै मेरे नैननि हों पाँव धारे (कवित्त)

जहाँ तैं पधारै मेरे नैननि हों पाँव धारे
वारै ये बिचारे प्रान पैंड़ पैंड़ पैं मनौ ।
आतुर न होई हाहा नेकु फैंट छोरि बैठो
मोहि वा बिसासी को है ब्येरो बूझिबो घनौ।।
हाय निरदई कों हमारी सुधि कैसें आई
कौन बिधि दीनी पाती दीन जानि कै भनौ।
झूठ की सचाई छाक्यो त्यों हित कचाई पाक्यो
ताके गुन गन घनआनंद कहा गनौ।।

76. सोरठा

1
घनआनंद रस ऐन, कहौ कृपानिधि कौन हित ।
मरत पपीहा नैन, दरसौ पै बरसौ नहीं।।

2
पहचानै हरि कौन, मौसे अनपहचान को ।
त्यों पुकार मधिमौन, कृपा कान मधि नैन ज्यों।।

77. आसा गुन बाँधिकैं भरोसो सिल धरि छाती (कवित्त)

आसा गुन बाँधिकैं भरोसो सिल धरि छाती
पूरे पन सिंधु मैं न बूड़त सकायहौं।
दुख दव हिय जारि अन्तर उदेग आंच
निरन्तर रोम रोम त्रासनि तचायहौं।।
लाख लाख भांतिन की दुसह दसानि जानि
साहस सहारि सिर आरे लौं चलायहौं ।
ऐसें घनआनंद गही है टेक मन साहिं
एरे निरदई तोहिं दया उपजायहौं।।

78. अन्तर आँच उसास तचै अति (सवैया)

अन्तर आँच उसास तचै अति अंग उसीजै उदेग की आवस ।
ज्यौ कहलाय मसोसनि ऊमस क्यौं हूँ कहूँ सु धरै नहिं ध्यावस।
नैन उधारि हिये बरसै धनआनंद छाई अनोखिए पावस ।
जीवनमूरति जान को आनन है बिन हेरें सदाई अमावसा।

79. जान के रूप लुभायकै नैननि (सवैया)

जान के रूप लुभायकै नैननि बेचि करी अधबीच ही लौंड़ी।
फैलि गयी घर बाहिर बात सु नीकें भई इन काज कनौंड़ी।।
क्योंकरि थाह लहे घनआनंद चाह नदी तट ही अति औंड़ी ।
हाय दई न बिसासी सुनै कछु है जग बाजति नेह की डौंड़ी ।।

80. जानराय जानत सबै (दोहा)

जानराय जानत सबै, अंतरगत की बात।
क्यों अजान लों करत फिर, मो घायल पर घात।।

81. खोय दई बुधि सोय गयी सुधि (सवैया)

खोय दई बुधि सोय गयी सुधि रोय हँसै उन्माद जग्यो है ।
भौन गहै चकि चाक रहै चलि बात कहै तन दाह दग्यो है।।
जानि परै नहि जान तुम्हें लखि ताहि कहा कछु आहि खग्यो है।
सोचनिहीं पचिए घनआनंद हेत पग्यो किधौं प्रेत लग्यो हे।।

82. घेरि घबरानी उबरानिही रहति घन (कवित्त)

घेरि घबरानी उबरानिही रहति घन
आनन्द आरत राती साधनि मरति हैं ।
जीवन अधार जान रूप के अधार बिन
व्याकुल बिकार भरी खरी सुजरति हैं।।
अतन जतन तें अनखि अरसानि वीर
परी पीर भीर क्योंहूँ धीर न धरति हैं।
देखिए दसा असाध अँखियां निपेटिनि की
भसमी बिथा पैं नित लंघन करति हैँ।।

83. बिकच नलिन लखैं सकुचि मलिन होति (कवित्त)

बिकच नलिन लखैं सकुचि मलिन होति
ऐसी कछू आँखिन अनोखी उरझनि है ।
सौरभ समीर आयें बहकि डहकि जाय
राग भरे हिय मैं बिराग मुरझनि है।।
जहां जान प्यारी रूप गुन को दीप न लहै
तहाँ मेरे ज्यौ परै विषाद गुरझनि है।
हाय अटपटी दसा निपट चपेटै टीसौ
क्यों हूँ घनआनंद न सूझै सुरझनि है।।

84. तब ह्वै सहाय हाय कैसे धौं सुहाई ऐसी (कवित्त)

तब ह्वै सहाय हाय कैसे धौं सुहाई ऐसी
सब सुख संग लै वियोग दुख दै चले।
सींचे रस रंग अंग अंगनि अनंग सौंपि
अंतर मैं विषम विषाद बेलि बै चले।।
क्यों धौं ये निगोड़े प्रान जान घनआनंद के
गौहन न लागे जब वे करि बिजै चले।
अतिही अधीर भई पीर भीर घेरि लई
हेली मनभावन जकेली मोहिं के चले।।

85. रोम रोम रसना ह्वै लहै जो गिरा के गुन (कवित्त)

रोम रोम रसना ह्वै लहै जो गिरा के गुन
तऊ जान प्यारी निबरैं न मैंन आरतैं ।
ऐसें दिनदीन दीन की दया न आई दई
तोहि विष भी यो विषम विगोगसर मार तैं।।
दरस सुरस प्यास भावरे भरत रहौं
फेरिए निरास मोहिं क्यों धों यों बछार तैं।
जीवन अधार घनआनंद उदार महा
कैसें अनसुनी करी चातक पुकार तैं।।

86. चातिक चुहल चहुं ओर चाहे स्वातिही कों (कवित्त)

चातिक चुहल चहुं ओर चाहे स्वातिही कों
सूरे पन पूरे जिन्हें बिष सम अमी है ।
प्रफुलित होत भान के उदोत कंज पुंज
ता बिन बिचार निहीं जोतिजाल तमी है।।
चाहौ अनचाहौ जान प्यारे पै आनंदघन
प्रीति रीति विषम सुरोम रोम रमी है ।
मोहि तुम एक तुम्हैं मो सम अनेक आहिं
कहा कछु चन्दहिं चकोरन की कमी है।।

87. चोप चाह चावनि चकोर भयो चाहतहीं (कवित्त)

चोप चाह चावनि चकोर भयो चाहतहीं
सुखमा प्रकाश मुख सुधाकर पूरे कौ।
कहा कहौं कौन विधि की बंधनि बंध्यो
सुकस्यो न उकस्यो बनाव लखि जूरे कौ।।
जाही जाही अंग पञ्यो ताही गरि गरि सञ्यो
हञ्यो बल बापुरे अनंग दल चूरे कौ।
अब बिन देखें जान प्यारी यों अनंदघन
मेरो मन भयो भटू पात है बघूरे कौ।।

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