अल्लामा इक़बाल की शायरी, Allama Iqbal Shayari in Hindi

Allama Iqbal Shayari in Hindi – इस पोस्ट में आपको अल्लामा इक़बाल की मशहूर शायरी का संग्रह दिया गया हैं. यह सभी Allama Iqbal ki Shayari उनके लोकप्रिय शायरियों में से हैं. आपको यह सभी Allama Iqbal Shayari बहुत ही पसंद आएगी.

अल्लामा इक़बाल का पूरा नाम मुहम्मद इक़बाल मसऊदी था. इनका जन्म 9 नवम्बर 1877 को सियालकोट पंजाब में हुआ था. अल्लामा इक़बाल एक बेहतरीन शायर के अलवा एक कवि, दार्शनिक और नेता भी थे. इनका निधन 21 अप्रेल 1938 को लाहौर पंजाब तत्कालीन भारत में हुआ था.

अब आइए कुछ Allama Iqbal Shayari in Hindi को पढ़ते हैं. हमें उम्मीद हैं की यह सभी Iqbal Shayari in Hindi में आपको पसंद आएगी. इस Allama Iqbal Best Shayari को अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें.

अल्लामा इक़बाल की शायरी, Allama Iqbal Shayari in Hindi

Allama Iqbal Shayari in Hindi

(1) ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

(2) माना कि तेरी दीद के क़ाबिल नहीं हूँ मैं
तू मेरा शौक़ देख मिरा इंतज़ार देख

(3) हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा

(4) दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूं या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो

(5) फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है

(6) सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसितां हमारा

(7) ढूंढ़ता फिरता हूं मैं ‘इक़बाल’ अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूं मैं

(8) मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
तन की दौलत छाँव है आता है धन जाता है धन

(9) नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी

(10) दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है

Allama Iqbal ki Shayari

Allama Iqbal Shayari in Hindi

(11) जब इश्क़ सिखाता है आदाब-ए-ख़ुद-आगाही
खुलते हैं ग़ुलामों पर असरार-ए-शहंशाही
jab ishq sikhaata hai aadaab-e-khud-aagaahi
khulate hain gulaamon par asaraar-e-shahanshahi

(12) मक़ाम-ए-शौक़ तिरे क़ुदसियों के बस का नहीं
उन्हीं का काम है ये जिन के हौसले हैं ज़ियाद
maqaam-e-shauq tire qudasiyon ke bas ka nahin
unhin ka kaam hai ye jin ke hausale hain ziyaad

(13) सौदा-गरी नहीं ये इबादत ख़ुदा की है
ऐ बे-ख़बर जज़ा की तमन्ना भी छोड़ दे

sauda-gari nahin ye ibaadat khuda ki hai
ai be-khabar jaza ki tamanna bhi chhod de

(14) उरूज-ए-आदम-ए-ख़ाकी से अंजुम सहमे जाते हैं
कि ये टूटा हुआ तारा मह-ए-कामिल न बन जाए
uruj-e-aadam-e-khaaki se anjum sahame jaate hain
ki ye tuta hua taara mah-e-kaamil na ban jae

(15) तू है मुहीत-ए-बे-कराँ मैं हूँ ज़रा सी आबजू
या मुझे हम-कनार कर या मुझे बे-कनार कर
tu hai muhit-e-be-karaan main hun zara si aabaju
ya mujhe ham-kanaar kar ya mujhe be-kanaar kar

(16) निगाह-ए-इश्क़ दिल-ए-ज़िंदा की तलाश में है
शिकार-ए-मुर्दा सज़ा-वार-ए-शाहबाज़ नहीं
nigaah-e-ishq dil-e-zinda ki talaash mein hai
shikaar-e-murda saza-vaar-e-shaahabaaz nahin

(17) मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्ताँ हमारा
mazahab nahin sikhaata aapas mein bair rakhana
hindi hain ham vatan hai hindostaan hamaara

(18) अंदाज़-ए-बयाँ गरचे बहुत शोख़ नहीं है
शायद कि उतर जाए तिरे दिल में मिरी बात
andaaz-e-bayaan garache bahut shokh nahin hai
shaayad ki utar jae tire dil mein miri baat

(19) आँख जो कुछ देखती है लब पे आ सकता नहीं
महव-ए-हैरत हूँ कि दुनिया क्या से क्या हो जाएगी
aankh jo kuchh dekhati hai lab pe aa sakata nahin
mahav-e-hairat hun ki duniya kya se kya ho jaegi

(20) गुलज़ार-ए-हस्त-ओ-बूद न बेगाना-वार देख
है देखने की चीज़ इसे बार बार देख
gulazaar-e-hast-o-bud na begaana-vaar dekh
hai dekhane ki chiz ise baar baar dekh

Allama Iqbal Best Shayari

Allama Iqbal ki Shayari

(21) है राम के वजूद पे हिन्दोस्ताँ को नाज़
अहल-ए-नज़र समझते हैं उस को इमाम-ए-हिंद
hai raam ke vajud pe hindostaan ko naaz
ahal-e-nazar samajhate hain us ko imaam-e-hind

(22) नहीं इस खुली फ़ज़ा में कोई गोशा-ए-फ़राग़त
ये जहाँ अजब जहाँ है न क़फ़स न आशियाना
nahin is khuli faza mein koi gosha-e-faraagat
ye jahaan ajab jahaan hai na qafas na aashiyaana

(23) मिलेगा मंज़िल-ए-मक़्सूद का उसी को सुराग़
अँधेरी शब में है चीते की आँख जिस का चराग़
milega manzil-e-maqsud ka usi ko suraag
andheri shab mein hai chite ki aankh jis ka charaag

(24) न पूछो मुझ से लज़्ज़त ख़ानमाँ-बर्बाद रहने की
नशेमन सैकड़ों मैं ने बना कर फूँक डाले हैं
na puchho mujh se lazzat khaanamaan-barbaad rahane ki
nasheman saikadon main ne bana kar phunk daale hain

(25) अगर हंगामा-हा-ए-शौक़ से है ला-मकाँ ख़ाली
ख़ता किस की है या रब ला-मकाँ तेरा है या मेरा
agar hangaama-ha-e-shauq se hai la-makaan khaali
khata kis ki hai ya rab la-makaan tera hai ya mera

(26) मुझे रोकेगा तू ऐ नाख़ुदा क्या ग़र्क़ होने से
कि जिन को डूबना है डूब जाते हैं सफ़ीनों में
mujhe rokega tu ai naakhuda kya garq hone se
ki jin ko dubana hai dub jaate hain safinon mein

(27) हर शय मुसाफ़िर हर चीज़ राही
क्या चाँद तारे क्या मुर्ग़ ओ माही
har shay musaafir har chiz raahi
kya chaand taare kya murg o maahi

(28) मिरी निगाह में वो रिंद ही नहीं साक़ी
जो होशियारी ओ मस्ती में इम्तियाज़ करे
miri nigaah mein vo rind hi nahin saaqi
jo hoshiyaari o masti mein imtiyaaz kare

(29) हवा हो ऐसी कि हिन्दोस्ताँ से ऐ ‘इक़बाल’
उड़ा के मुझ को ग़ुबार-ए-रह-ए-हिजाज़ करे
hava ho aisi ki hindostaan se ai iqabaal
uda ke mujh ko gubaar-e-rah-e-hijaaz kare

(30) निगह बुलंद सुख़न दिल-नवाज़ जाँ पुर-सोज़
यही है रख़्त-ए-सफ़र मीर-ए-कारवाँ के लिए
nigah buland sukhan dil-navaaz jaan pur-soz
yahi hai rakht-e-safar mir-e-kaaravaan ke lie

अल्लामा इक़बाल की शायरी

(31) कभी हम से कभी ग़ैरों से शनासाई है
बात कहने की नहीं तू भी तो हरजाई है
kabhi ham se kabhi gairon se shanaasai hai
baat kahane ki nahin tu bhi to harajai hai

(32) गुज़र जा अक़्ल से आगे कि ये नूर
चराग़-ए-राह है मंज़िल नहीं है!
guzar ja aql se aage ki ye nur
charaag-e-raah hai manzil nahin hai!

(33) सौ सौ उमीदें बंधती है इक इक निगाह पर
मुझ को न ऐसे प्यार से देखा करे कोई
sau sau umiden bandhati hai ik ik nigaah par
mujh ko na aise pyaar se dekha kare koi

(34) आईन-ए-जवाँ-मर्दां हक़-गोई ओ बे-बाकी
अल्लाह के शेरों को आती नहीं रूबाही
aain-e-javaan-mardaan haq-goi o be-baaki
allaah ke sheron ko aati nahin rubaahi

(35) ज़मीर-ए-लाला मय-ए-लाल से हुआ लबरेज़
इशारा पाते ही सूफ़ी ने तोड़ दी परहेज़
zamir-e-laala may-e-laal se hua labarez
ishaara paate hi sufi ne tod di parahez

(36) मैं तुझ को बताता हूँ तक़दीर-ए-उमम क्या है
शमशीर-ओ-सिनाँ अव्वल ताऊस-ओ-रुबाब आख़िर
main tujh ko bataata hun taqadir-e-umam kya hai
shamashir-o-sinaan avval taus-o-rubaab aakhir

(37) मोती समझ के शान-ए-करीमी ने चुन लिए
क़तरे जो थे मिरे अरक़-ए-इंफ़िआ’ल के
moti samajh ke shaan-e-karimi ne chun lie
qatare jo the mire araq-e-imfial ke

(38) भरी बज़्म में राज़ की बात कह दी
बड़ा बे-अदब हूँ सज़ा चाहता हूँ
bhari bazm mein raaz ki baat kah di
bada be-adab hun saza chaahata hun

(39) बुतों से तुझ को उमीदें ख़ुदा से नौमीदी
मुझे बता तो सही और काफ़िरी क्या है
buton se tujh ko umiden khuda se naumidi
mujhe bata to sahi aur kaafiri kya hai

Allama Iqbal Best Shayari

(40) समुंदर से मिले प्यासे को शबनम
बख़ीली है ये रज़्ज़ाक़ी नहीं है
samundar se mile pyaase ko shabanam
bakhili hai ye razzaaqi nahin hai

(41) तू ने ये क्या ग़ज़ब किया मुझ को भी फ़ाश कर दिया
मैं ही तो एक राज़ था सीना-ए-काएनात में
tu ne ye kya gazab kiya mujh ko bhi faash kar diya
main hi to ek raaz tha sina-e-kaenaat mein

(42) ढूँडता फिरता हूँ मैं ‘इक़बाल’ अपने आप को
आप ही गोया मुसाफ़िर आप ही मंज़िल हूँ मैं
dhundata phirata hun main iqabaal apane aap ko
aap hi goya musaafir aap hi manzil hun main

(43) हुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वाले
तमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकले
hue madafun-e-dariya zer-e-dariya tairane vaale
tamaanche mauj ke khaate the jo ban kar guhar nikale

(44) मस्जिद तो बना दी शब भर में ईमाँ की हरारत वालों ने
मन अपना पुराना पापी है बरसों में नमाज़ी बन न सका
masjid to bana di shab bhar mein imaan ki haraarat vaalon ne
man apana puraana paapi hai barason mein namaazi ban na saka

(45) ख़ुदी वो बहर है जिस का कोई किनारा नहीं
तू आबजू इसे समझा अगर तो चारा नहीं
khudi vo bahar hai jis ka koi kinaara nahin
tu aabaju ise samajha agar to chaara nahin

(46) सितारा क्या मिरी तक़दीर की ख़बर देगा
वो ख़ुद फ़राख़ी-ए-अफ़्लाक में है ख़्वार ओ ज़ुबूँ
sitaara kya miri taqadir ki khabar dega
vo khud faraakhi-e-aflaak mein hai khvaar o zubun

(47) सबक़ मिला है ये मेराज-ए-मुस्तफ़ा से मुझे
कि आलम-ए-बशरीयत की ज़द में है गर्दूं
sabaq mila hai ye meraaj-e-mustafa se mujhe
ki aalam-e-bashariyat ki zad mein hai gardun

(48) नहीं है ना-उमीद ‘इक़बाल’ अपनी किश्त-ए-वीराँ से
ज़रा नम हो तो ये मिट्टी बहुत ज़रख़ेज़ है साक़ी
nahin hai na-umid iqabaal apani kisht-e-viraan se
zara nam ho to ye mitti bahut zarakhez hai saaqi

(49) यक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
जिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरें
yaqin mohakam amal paiham mohabbat faateh-e-aalam
jihaad-e-zindagaani mein hain ye mardon ki shamashiren

(50) मन की दौलत हाथ आती है तो फिर जाती नहीं
तन की दौलत छाँव है आता है धन जाता है धन
man ki daulat haath aati hai to phir jaati nahin
tan ki daulat chhaanv hai aata hai dhan jaata hai dhan

Iqbal Shayari in Hindi

(51) ज़माना अक़्ल को समझा हुआ है मिशअल-ए-राह
किसे ख़बर कि जुनूँ भी है साहिब-ए-इदराक
zamaana aql ko samajha hua hai mishal-e-raah
kise khabar ki junun bhi hai saahib-e-idaraak

(52) यूँ तो सय्यद भी हो मिर्ज़ा भी हो अफ़्ग़ान भी हो
तुम सभी कुछ हो बताओ मुसलमान भी हो
yun to sayyad bhi ho mirza bhi ho afgaan bhi ho
tum sabhi kuchh ho batao musalamaan bhi ho

(53) वो हर्फ़-ए-राज़ कि मुझ को सिखा गया है जुनूँ
ख़ुदा मुझे नफ़स-ए-जिबरईल दे तो कहूँ
vo harf-e-raaz ki mujh ko sikha gaya hai junun
khuda mujhe nafas-e-jibaril de to kahun

(54) रोज़-ए-हिसाब जब मिरा पेश हो दफ़्तर-ए-अमल
आप भी शर्मसार हो मुझ को भी शर्मसार कर
roz-e-hisaab jab mira pesh ho daftar-e-amal
aap bhi sharmasaar ho mujh ko bhi sharmasaar kar

(55) तिरे आज़ाद बंदों की न ये दुनिया न वो दुनिया
यहाँ मरने की पाबंदी वहाँ जीने की पाबंदी
tire aazaad bandon ki na ye duniya na vo duniya
yahaan marane ki paabandi vahaan jine ki paabandi

(56) हुई न आम जहाँ में कभी हुकूमत-ए-इश्क़
सबब ये है कि मोहब्बत ज़माना-साज़ नहीं
hui na aam jahaan mein kabhi hukumat-e-ishq
sabab ye hai ki mohabbat zamaana-saaz nahin

(57) बाग़-ए-बहिश्त से मुझे हुक्म-ए-सफ़र दिया था क्यूँ
कार-ए-जहाँ दराज़ है अब मिरा इंतिज़ार कर
baag-e-bahisht se mujhe hukm-e-safar diya tha kyun
kaar-e-jahaan daraaz hai ab mira intizaar kar

(58) अक़्ल अय्यार है सौ भेस बदल लेती है
इश्क़ बेचारा न ज़ाहिद है न मुल्ला न हकीम
aql ayyaar hai sau bhes badal leti hai
ishq bechaara na zaahid hai na mulla na hakim

(59) वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है
तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में
vatan ki fikr kar naadaan musibat aane vaali hai
tiri barbaadiyon ke mashavare hain aasamaanon mein

(60) इश्क़ भी हो हिजाब में हुस्न भी हो हिजाब में
या तो ख़ुद आश्कार हो या मुझे आश्कार कर
ishq bhi ho hijaab mein husn bhi ho hijaab mein
ya to khud aashkaar ho ya mujhe aashkaar kar

Allama Iqbal Shayari

(61) हाँ दिखा दे ऐ तसव्वुर फिर वो सुब्ह ओ शाम तू
दौड़ पीछे की तरफ़ ऐ गर्दिश-ए-अय्याम तू
haan dikha de ai tasavvur phir vo subh o shaam tu
daud pichhe ki taraf ai gardish-e-ayyaam tu

(62) कुशादा दस्त-ए-करम जब वो बे-नियाज़ करे
नियाज़-मंद न क्यूँ आजिज़ी पे नाज़ करे
kushaada dast-e-karam jab vo be-niyaaz kare
niyaaz-mand na kyun aajizi pe naaz kare

(63) कभी छोड़ी हुई मंज़िल भी याद आती है राही को
खटक सी है जो सीने में ग़म-ए-मंज़िल न बन जाए
kabhi chhodi hui manzil bhi yaad aati hai raahi ko
khatak si hai jo sine mein gam-e-manzil na ban jae

(64) अक़्ल को तन्क़ीद से फ़ुर्सत नहीं
इश्क़ पर आमाल की बुनियाद रख
aql ko tanqid se fursat nahin
ishq par aamaal ki buniyaad rakh

(65) जलाल-ए-पादशाही हो कि जमहूरी तमाशा हो
जुदा हो दीं सियासत से तो रह जाती है चंगेज़ी
jalaal-e-paadashaahi ho ki jamahuri tamaasha ho
juda ho din siyaasat se to rah jaati hai changezi

(66) ये काएनात अभी ना-तमाम है शायद
कि आ रही है दमादम सदा-ए-कुन-फ़यकूँ
ye kaenaat abhi na-tamaam hai shaayad
ki aa rahi hai damaadam sada-e-kun-fayakun

(67) अनोखी वज़्अ’ है सारे ज़माने से निराले हैं
ये आशिक़ कौन सी बस्ती के या-रब रहने वाले हैं
anokhi vaz hai saare zamaane se niraale hain
ye aashiq kaun si basti ke ya-rab rahane vaale hain

(68) उक़ाबी रूह जब बेदार होती है जवानों में
नज़र आती है उन को अपनी मंज़िल आसमानों में
uqaabi ruh jab bedaar hoti hai javaanon mein
nazar aati hai un ko apani manzil aasamaanon mein

(69) ख़ुदावंदा ये तेरे सादा-दिल बंदे किधर जाएँ
कि दरवेशी भी अय्यारी है सुल्तानी भी अय्यारी
khudaavanda ye tere saada-dil bande kidhar jaen
ki daraveshi bhi ayyaari hai sultaani bhi ayyaari

(70) सारे जहाँ से अच्छा हिन्दोस्ताँ हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसिताँ हमारा
saare jahaan se achchha hindostaan hamaara
ham bulabulen hain is ki ye gulasitaan hamaara

Iqbal Shayari

(71) कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुंतज़र नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मिरी जबीन-ए-नियाज़ में
kabhi ai haqiqat-e-muntazar nazar aa libaas-e-majaaz mein
ki hazaaron sajde tadap rahe hain miri jabin-e-niyaaz mein

(72) तू क़ादिर ओ आदिल है मगर तेरे जहाँ में
हैं तल्ख़ बहुत बंदा-ए-मज़दूर के औक़ात
tu qaadir o aadil hai magar tere jahaan mein
hain talkh bahut banda-e-mazadur ke auqaat

(73) तमन्ना दर्द-ए-दिल की हो तो कर ख़िदमत फ़क़ीरों की
नहीं मिलता ये गौहर बादशाहों के ख़ज़ीनों में
tamanna dard-e-dil ki ho to kar khidamat faqiron ki
nahin milata ye gauhar baadashaahon ke khazinon mein

(74) बातिल से दबने वाले ऐ आसमाँ नहीं हम
सौ बार कर चुका है तू इम्तिहाँ हमारा
baatil se dabane vaale ai aasamaan nahin ham
sau baar kar chuka hai tu imtihaan hamaara

(75) इश्क़ तिरी इंतिहा इश्क़ मिरी इंतिहा
तू भी अभी ना-तमाम मैं भी अभी ना-तमाम
ishq tiri intiha ishq miri intiha
tu bhi abhi na-tamaam main bhi abhi na-tamaam

(76) तुझे किताब से मुमकिन नहीं फ़राग़ कि तू
किताब-ख़्वाँ है मगर साहिब-ए-किताब नहीं
tujhe kitaab se mumakin nahin faraag ki tu
kitaab-khvaan hai magar saahib-e-kitaab nahin

(77) अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भी
ये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
amal se zindagi banati hai jannat bhi jahannam bhi
ye khaaki apani fitarat mein na nuri hai na naari hai

(78) बे-ख़तर कूद पड़ा आतिश-ए-नमरूद में इश्क़
अक़्ल है महव-ए-तमाशा-ए-लब-ए-बाम अभी
be-khatar kud pada aatish-e-namarud mein ishq
aql hai mahav-e-tamaasha-e-lab-e-baam abhi

(79) फ़क़त निगाह से होता है फ़ैसला दिल का
न हो निगाह में शोख़ी तो दिलबरी क्या है
faqat nigaah se hota hai faisala dil ka
na ho nigaah mein shokhi to dilabari kya hai

(80) ‘अत्तार’ हो ‘रूमी’ हो ‘राज़ी’ हो ‘ग़ज़ाली’ हो
कुछ हाथ नहीं आता बे-आह-ए-सहर-गाही
attaar ho rumi ho raazi ho gazaali ho
kuchh haath nahin aata be-aah-e-sahar-gaahi

Iqbal ki Shayari

(81) ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें
gulaami mein na kaam aati hain shamashiren na tadabiren
jo ho zauq-e-yaqin paida to kat jaati hain zanjiren

(82) जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों में ज़मीनों में
वो निकले मेरे ज़ुल्मत-ख़ाना-ए-दिल के मकीनों में
jinhen main dhundhata tha aasamaanon mein zaminon mein
vo nikale mere zulmat-khaana-e-dil ke makinon mein

(83) जिस खेत से दहक़ाँ को मयस्सर नहीं रोज़ी
उस खेत के हर ख़ोशा-ए-गंदुम को जला दो
jis khet se dahaqaan ko mayassar nahin rozi
us khet ke har khosha-e-gandum ko jala do

(84) उमीद-ए-हूर ने सब कुछ सिखा रक्खा है वाइज़ को
ये हज़रत देखने में सीधे-सादे भोले-भाले हैं
umid-e-hur ne sab kuchh sikha rakkha hai vaiz ko
ye hazarat dekhane mein sidhe-saade bhole-bhaale hain

(85) हया नहीं है ज़माने की आँख में बाक़ी
ख़ुदा करे कि जवानी तिरी रहे बे-दाग़
haya nahin hai zamaane ki aankh mein baaqi
khuda kare ki javaani tiri rahe be-daag

(86) ज़ाहिर की आँख से न तमाशा करे कोई
हो देखना तो दीदा-ए-दिल वा करे कोई
zaahir ki aankh se na tamaasha kare koi
ho dekhana to dida-e-dil va kare koi

(87) ऐ ताइर-ए-लाहूती उस रिज़्क़ से मौत अच्छी
जिस रिज़्क़ से आती हो परवाज़ में कोताही
ai tair-e-laahuti us rizq se maut achchhi
jis rizq se aati ho paravaaz mein kotaahi

(88) जो मैं सर-ब-सज्दा हुआ कभी तो ज़मीं से आने लगी सदा
तिरा दिल तो है सनम-आश्ना तुझे क्या मिलेगा नमाज़ में
jo main sar-ba-sajda hua kabhi to zamin se aane lagi sada
tira dil to hai sanam-aashna tujhe kya milega namaaz mein

(89) इल्म में भी सुरूर है लेकिन
ये वो जन्नत है जिस में हूर नहीं
ilm mein bhi surur hai lekin
ye vo jannat hai jis mein hur nahin

(90) वजूद-ए-ज़न से है तस्वीर-ए-काएनात में रंग
इसी के साज़ से है ज़िंदगी का सोज़-ए-दरूँ
vajud-e-zan se hai tasvir-e-kaenaat mein rang
isi ke saaz se hai zindagi ka soz-e-darun

(91) दिल से जो बात निकलती है असर रखती है
पर नहीं ताक़त-ए-परवाज़ मगर रखती है
dil se jo baat nikalati hai asar rakhati hai
par nahin taaqat-e-paravaaz magar rakhati hai

(92) महीने वस्ल के घड़ियों की सूरत उड़ते जाते हैं
मगर घड़ियाँ जुदाई की गुज़रती हैं महीनों में
mahine vasl ke ghadiyon ki surat udate jaate hain
magar ghadiyaan judai ki guzarati hain mahinon mein

(93) दुनिया की महफ़िलों से उकता गया हूँ या रब
क्या लुत्फ़ अंजुमन का जब दिल ही बुझ गया हो
duniya ki mahafilon se ukata gaya hun ya rab
kya lutf anjuman ka jab dil hi bujh gaya ho

(94) गला तो घोंट दिया अहल-ए-मदरसा ने तिरा
कहाँ से आए सदा ला इलाह इल-लल्लाह
gala to ghont diya ahal-e-madarasa ne tira
kahaan se aae sada la ilaah il-lallaah

(95) नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में
nahin tera nasheman qasr-e-sultaani ke gumbad par
tu shaahin hai basera kar pahaadon ki chataanon mein

(96) दिल सोज़ से ख़ाली है निगह पाक नहीं है
फिर इस में अजब क्या कि तू बेबाक नहीं है
dil soz se khaali hai nigah paak nahin hai
phir is mein ajab kya ki tu bebaak nahin hai

(97) अपने मन में डूब कर पा जा सुराग़-ए-ज़ि़ंदगी
तू अगर मेरा नहीं बनता न बन अपना तो बन
apane man mein dub kar pa ja suraag-e-zindagi
tu agar mera nahin banata na ban apana to ban

(98) फ़िर्क़ा-बंदी है कहीं और कहीं ज़ातें हैं
क्या ज़माने में पनपने की यही बातें हैं
firqa-bandi hai kahin aur kahin zaaten hain
kya zamaane mein panapane ki yahi baaten hain

(99) अच्छा है दिल के साथ रहे पासबान-ए-अक़्ल
लेकिन कभी कभी इसे तन्हा भी छोड़ दे
achchha hai dil ke saath rahe paasabaan-e-aql
lekin kabhi kabhi ise tanha bhi chhod de

(100) ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ
ye jannat mubaarak rahe zaahidon ko
ki main aap ka saamana chaahata hun

(101) हज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदा
hazaaron saal nargis apani be-nuri pe roti hai
badi mushkil se hota hai chaman mein dida-var paida

(102) तेरा इमाम बे-हुज़ूर तेरी नमाज़ बे-सुरूर
ऐसी नमाज़ से गुज़र ऐसे इमाम से गुज़र
tera imaam be-huzur teri namaaz be-surur
aisi namaaz se guzar aise imaam se guzar

(103) नशा पिला के गिराना तो सब को आता है
मज़ा तो तब है कि गिरतों को थाम ले साक़ी
nasha pila ke giraana to sab ko aata hai
maza to tab hai ki giraton ko thaam le saaqi

(104) तिरे इश्क़ की इंतिहा चाहता हूँ
मिरी सादगी देख क्या चाहता हूँ
ये जन्नत मुबारक रहे ज़ाहिदों को
कि मैं आप का सामना चाहता हूँ
tire ishq ki intiha chaahata hun
miri saadagi dekh kya chaahata hun
ye jannat mubaarak rahe zaahidon ko
ki main aap ka saamana chaahata hun

(105) ख़िर्द-मंदों से क्या पूछूँ कि मेरी इब्तिदा क्या है
कि मैं इस फ़िक्र में रहता हूँ मेरी इंतिहा क्या है
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे बता तेरी रज़ा क्या है

khird-mandon se kya puchhun ki meri ibtida kya hai
ki main is fikr mein rahata hun meri intiha kya hai
khudi ko kar buland itana ki har taqadir se pahale
khuda bande se khud puchhe bata teri raza kya hai

(106) सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं
तही ज़िंदगी से नहीं ये फ़ज़ाएँ
यहाँ सैकड़ों कारवाँ और भी हैं
sitaaron se aage jahaan aur bhi hain
abhi ishq ke imtihaan aur bhi hain
tahi zindagi se nahin ye fazaen
yahaan saikadon kaaravaan aur bhi hain

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1 thought on “अल्लामा इक़बाल की शायरी, Allama Iqbal Shayari in Hindi”

  1. दुखयारी माँ

    खुश होती है जब सुनती है बच्चों की किलकारी माँ।
    शुक्र है रब का रब ने बखशी हमको ऐसी प्यारी माँ।

    नींद से उठ कर मैंने देखा इतना प्यार खुदा के बाद।
    सो जाते हैं बच्चे तो करती है पहरेदारी माँ ।

    दूध की सूरत खून पिलाकर तूने मुझ को पाला है।
    सच कहता हूँ मुझ से न होगी तेरी दिल आज़ारी माँ ।

    भाई बहन सब फूल के जैसे कल भी थे और आज भी हैं।
    उनके बीच नज़र आती है इक महकी फुलवारी माँ ।

    जिसका बेटा नालायक है, देखा है इन आखों ने।
    शहर की गलियों में फिरती है उसकी भारी मारी माँ ।

    हाए मेरी किस्मत के लम्हे जब फाके से गुज़रे थे ।
    मेरे साथ रही दुख-सुख में पर नहीं हिम्मत हारी माँ ।

    बेटे और बहू ने अंजुम उसपर कितना जुल्म किया ।
    कौन सुनेगा किससे बोले आख़िर इक दुखियारी माँ।

    अंजुम लखनवी
    Poet : Anjum Lucknowi

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