आंधी तूफान पर कविता, Poem on Aandhi Toofan in Hindi

Poem on Aandhi Toofan in Hindi : दोस्तों इस पोस्ट में कुछ बेहतरीन और लोकप्रिय आंधी तूफान पर कविता का संग्रह दिया गया हैं. हिंदी साहित्य में आंधी तूफान को अधार मानकर कई रचनाएँ लिखी गई हैं.

अब आइए नीचे कुछ Poem on Aandhi Toofan in Hindi में दिए गए हैं. इसे पढ़ते हैं. हमें उम्मीद हैं की यह सभी आंधी तूफान पर कविता आपको पसंद आएगी. इसे अपने दोस्तों के साथ भी शेयर करें.

आंधी तूफान पर कविता

Poem on Aandhi Toofan in Hindi

1. आंधी

छप्पर उड़ कर गिरा भूमि पर,
धूल गगन -तल पर जा छाई।
चौखट से लड़ गये किवाड़े,
हर हर करके आँधी आई।
गोफन से बन बाग उठे हिल,
छूटे चमगादड़ ज्यों ढेला।
पट पट आम गिरे गोली से,
हुआ हवा का बेहद रेला।
कंघी करने लगीं झाड़ियाँ,
निकले उनसे खरहे तीतर।
नदियों ने उड़ने की ठानी,
नावें उलटीं उनके भीतर।
टूटे पेड़ रुकीं सब राहें,
और कुओं का झलका पानी।
आँख बंद की सूरज ने भी,
हार हवा से सब ने मानी।
छाई छटा अजीब धरा पर,
घिरी घटा फिर काली काली।
वर्षा ने धो दिया जगत को,
हुई नई उसकी हरियाली।
आँधी से भी जादा ताकत,
बसती है मनुष्य के मन में।
वह चाहे तो कर सकता है,
कुछ का कुछ दुनियाँ को छन में।
श्रीनाथ सिंह

2. आँधी

मुखिया का गमछा उड़ करके
जा बबूल पर लटका
सुखिया की उड़ गई टीन
आँधी ने मारा झटका

पेड़ उखड़कर गिरे सड़क पर
लगा सब जगह जाम
आसमान में धूल छा गई
काली आँधी नाम

आम टूट कर गिरे पेड़ से
बिना पके ही भईया
चलते चलते गिरे मुसाफिर
भगी रंभाती गइया

बाराती गुस्से में बैठे
इसने काम बिगाड़ा
आँधी ने आकर शादी का
भईया किया कबाड़ा

3. तुम तूफान समझ पाओगे

गीले बादल, पीले रजकण,
सूखे पत्ते, रूखे तृण घन
लेकर चलता करता ‘हरहर’–इसका गान समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे?

गंध-भरा यह मंद पवन था,
लहराता इससे मधुवन था,
सहसा इसका टूट गया जो स्वप्न महान, समझ पाओगे?
तुम तूफान समझ पाओगे?

तोड़-मरोड़ विटप-लतिकाएँ,
नोच-खसोट कुसुम-कलिकाएँ,
जाता है अज्ञात दिशा को! हटो विहंगम, उड़ जाओगे!
तुम तूफान समझ पाओगे?
हरिवंशराय बच्चन

4. तूफ़ान

उठा तूफ़ान
गरजते बादलों ने आसमाँ पर कर लिया कब्ज़ा,
चमकती बिजलियों में छुप गया जलवा सितारों का,
नज़र आता नहीं महताब का ताबिंदा चहरा भी,
क़रीब ओ दूर हर जानिब अन्धेरा ही अन्धेरा है

बहुत तारीक है माहौल गिरदाब ए हवादिस का
हवाएँ चींख़ती हैं और मौजें तिलमिलाती हैं
सुकूँ धोका है, हस्ती इक मुसलसल कश्मकश का नाम-ए सानी है

कहाँ है नाख़ुदा इसका ?
बही जाती है किश्ती ख़ुद-ब-ख़ुद मौजों के दामन में
कभी पानी की चादर में ये छुप जाती है नज़रों से
कभी ये फिर उभर आती है सतह-ए आब पर गोया
असर इस पर नहीं होता है तूफ़ानी थपेड़ों का,
बही जाती है किश्ती ख़ुद-ब-ख़ुद मौजों के दामन में

कहीं साहिल भी है यारब ?
लिए जाती है किश्ती को बहा कर किस तरफ़ मौजें
शब-ए तारीक में – ज़ालिम अँधेरे में,
कभी वो वक़्त आ जाएगा जब ख़ुरशीद भी मशरिक़ से उभरेगा
नवीद-ए दौर-ए नौ लेकर
कटेंगे बन्द-ए मजबूरी
ज़िया फतेहाबादी

5. अपनी तो हर आह एक तूफ़ान है

अपनी तो हर आह इक तूफ़ान है
क्या करे वो जान कर अंजान है
ऊपर वाला जान कर अंजान है

अपनी तो हर आह इक तूफ़ान है
ऊपर वाला जानकर अंजान है
अपनी तो हर आह इक तूफ़ान है

अब तो हँसके अपनी भी क़िस्मत को चमका दे
कानों में कुछ कह दे जो इस दिल को बहला दे
ये भी मुशकिल है तो क्या आसान है
ऊपर वाला जान कर अंजान है …

सर पे मेरे तू जो अपना हाथ ही रख दे
फिर तो भटके राही को मिल जाएँगे रस्ते
दिल की बस्ती बिन तेरे वीरान है
ऊपर वाला जानकर अंजान है …

दिल ही तो है इस ने शायद भूल भी की है
ज़िन्दगी है भूल कर ही राह मिलती है
माफ़ कर बन्दा भी इक इंसान है
ऊपर वाला जान कर अंजान है
अपनी तो हर आह इक तूफ़ान है
शैलेन्द्र

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